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राहुल गांधी के इंटरव्यू से उपजे कुछ सवाल

विशेषज्ञों की नजर में दरअसल आज कांग्रेस अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रही है।

राहुल गांधी के इंटरव्यू से उपजे कुछ सवाल
नई दिल्ली. राहुल गांधी को सांसद बने दस वर्षहोने को हैं। कुछ वर्षों से वे पार्टी के उपाध्यक्ष भी हैं। फिलहाल कांग्रेस में उनकी हैसियत दूसरे नंबर की है और यूपीए सरकार में भी उनके महत्वपूर्ण प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। इतने लंबे सार्वजनिक जीवन के बाद पहली बार किसी टीवी इंटरव्यू में भाग लेना थोड़ा कौतुहल पैदा करता है। हालांकि बीते दिनों एक दैनिक अखबर को भी उन्होंने साक्षात्कार दिया था। लिहाजा यहां एक सवाल उठता है कि एकाएक इतनी अधिक सक्रियता क्यों?
विशेषज्ञों की नजर में दरअसल आज कांग्रेस अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। आज देश 21वीं सदी में खड़ा है जबकि पार्टी अभी भी घिसीपिटी सोच के सहारे आगे बढ़ रही है। वह लोगों को अपने साथ जोड़ने में नाकाम हो रही है। वहीं आम आदमी पार्टी ने देश में राजनीति की नई बयार बहाई है। उसकी सफलता ने सभी को चौंकाया है। कांग्रेस की अगुआई में यूपीए सरकार का प्रदर्शन भी दयनीय रहा है। उसके काम काज से लोगों में एक ऊब स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है।
हाल के विधानसभा चुनावों के नतीजे इसकी बनगी पेश करते हैं। अब 2014 के आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं। हर सर्वे और ओपिनियन पोल में भारतीय जनता पार्टी को बढ़त मिल रही है और पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस को अपनी जमीन खिसकती प्रतीत हो रही है। इन्हीं सब कारणों से लगता है कि कांग्रेस बेचैनी महसूस कर रही है कि वह इस सियासी जंग में कहीं पिछड़ न जाए। लिहाजा चर्चा में बने रहना रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
खैर, राहुल गांधी मीडिया के जरिये मुद्दों पर राय रखते हैं तो अच्छी बात हो सकती है, परंतु लगता है वे चर्चा को कहीं और मोड़ना चाहते हैं। सोमवार को साक्षात्कार में पूछे गए सभी सवाल मौजूं थे, परंतु जवाब उतने प्रखर और बेहतर नहीं थे, जितना की देश उम्मीद कर रहा था। निश्चित ही आज देश महंगाई, भ्रष्टाचार, नीतिगत अपंगता, लचर विदेश नीति पर उनके विचार जानना चाहता है। वे भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते हैं, जबकि वे चारा घोटाला में दोषी लालू यादव की पार्टी राजद से बिहार में गठबंधन करते हैं। वहीं महाराष्ट्र में आदर्श सोसाइटी घोटाले में क्या कार्रवाई करेंगे, स्पष्ट नहीं कर पाते हैं। यह दोहरा मापदंड क्यों है? महंगाई से आज जनता त्रस्त है पर इस पर बात क्यों नहीं करते।
राहुल इस सवाल से बचते नजर आए कि क्या वे मोदी से सीधा आमना-सामना करेंगे। उनके पास इस सवाल का कोईजवाब नहीं है कि मोदी को 2002 के दंगों के लिए कैसे जिम्मेदार ठहरा सकते हैं जबकि कोर्ट व एसआईटी ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है। इसके बावजूद भी गुजरात दंगों का उल्लेख करना दिखाता हैकि उनके पास कोई मुद्दा नहीं है। यह हैरानी की बात है वे 84 के सिख विरोधी दंगे से कांग्रेस और उसकी सरकार को बाहर रखते हैं, जबकि उस दंगे का सच देश बखूबी जानता है। साथ ही उन्हें कांग्रेस के कार्यकाल में हुए तमाम दंगे क्यों याद नहीं आते हैं? राहुल गांधी को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गुजरात की जनता ने मोदी को तीसरी बार लोकतांत्रिक तरीके से चुना है। बेहतर तो यही होता कि राहुल मुद्दों पर खुलकर चर्चाकरते कि वे कैसे बेहतर शासन दे सकते हैं।
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