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वल्लभ भाई के आगे बौना हुआ अमेरिका-चीन, विश्व के सिरमौर बने सरदार पटेल

हर भारतीय के लिए यह गौरव का विषय है कि देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जितनी ऊंची प्रतिमा नर्मदा के किनारे पर स्थापित हुई है, उससे ऊंची प्रतिमा अब किसी भी देश में नहीं है। सबसे ऊंची प्रतिमाओं का रिकार्ड अब से पहले अमेरिका और चीन का था, जो सरदार पटेल की प्रतिमा के बाद बहुत बौना सा होकर रह गया है।

वल्लभ भाई के आगे बौना हुआ अमेरिका-चीन, विश्व के सिरमौर बने सरदार पटेल
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हर भारतीय के लिए यह गौरव का विषय है कि देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जितनी ऊंची प्रतिमा नर्मदा के किनारे पर स्थापित हुई है, उससे ऊंची प्रतिमा अब किसी भी देश में नहीं है। सबसे ऊंची प्रतिमाओं का रिकार्ड अब से पहले अमेरिका और चीन का था, जो सरदार पटेल की प्रतिमा के बाद बहुत बौना सा होकर रह गया है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आजादी मिलने के उपरांत 562 देसी रियासतों का भारतीय संघ के साथ एकीकरण करने में बेहद अहम भूमिका निभाने वाले सरदार पटेल की प्रतिमा को स्टैचू आफ यूनिटी के नाम से ही जाना जाएगा। चूकि वह विश्व में सर्वाधिक ऊंची प्रतिमा है, इसलिए इसे देखने के लिए आने वाले देसी-विदेशी पर्यटकों के लिए वहां आने-जाने और रहने आदि की भी समुचित व्यवस्था की गई है।

कुछ लोग इसे राजनीतिक चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं परंतु यह उसी संकुचित सोच के हैं, जिसके चलते आजादी के इतने वर्षों उपरांत भी सरदार पटेल को वह गौरवशाली स्थान नहीं मिल सका, जिसके वह सही में हकदार थे। स्वाधीनता आंदोलन को खेड़ा और बारदौली किसान आंदोलनों के जरिए नए तेवर और आक्रामकता देने वाले वल्लभ भाई पटेल को इसका अफसोस रहा कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के चलते वह अन्य 562 रियासतों की तरह जम्मू-कश्मीर का भारत में उस तरह विलय नहीं कर सके,

जो आज भी एक समस्या बना हुआ है। यह ऐसा मुद्दा था, जिसे लेकर नेहरू और पटेल में तीखे मतभेद थे। पटेल इस मुद्दे पर कश्मीर में जनमत संग्रह कराने और संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने के नेहरू के फैसले से काफी नाराज थे। इसी प्रकार उन्होंने चीन की आक्रामकता और नेपाल के रवैये को लेकर भी नेहरू को सचेत किया था, जिसके दुष्परिणाम बाद में चीन के साथ 1962 के युद्ध के रूप में देश को भुगतने भी पड़े।

नेहरू के साथ पटेल के तनावपूर्ण रिश्तों की नींव में दरअसल, नेहरू की सोच और कार्यशैली थी। जानकारों का मानना है कि हैदराबाद, जूनागढ़ रियासतों का भारत में विलय संभव नहीं हो पाता, यदि पटेल सख्त रवैया न अपनाते। वो गोवा को भी उसी वक्त मिलाने के पक्ष में थे परंतु नेहरू तैयार नहीं हुए। नतीजतन यह विलय 1961 में जाकर हो पाया।

बहुतों का मानना है कि नेहरू के बजाय पटेल प्रधानमंत्री बनते तो हालात दूसरे ही होते। जब पहला प्रधानमंत्री कौन हो, यह तय होने की बात शुरू हुई तो अधिकांश प्रदेश कांग्रेस समितियां पटेल के पक्ष में थी परंतु गांधी के आग्रह पर पटेल ने नेहरू के लिए पीछे हटने का फैसला ले लिया। इसके बावजूद नेहरू हमेशा पटेल को लेकर असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहे।

आजादी के मात्र सवा तीन साल बाद दिसंबर 1950 में पटेल चल बसे, जिस कारण देश उनकी बहुमूल्य दीर्घावधि सेवाओं से वंचित रह गया परंतु गृहमंत्री के तौर पर उन्होंने अल्पावधि में ही देश को एकजुट करने के लिए जो भूमिका अदा की, उसे कभी विस्मृत नहीं किया जा सकेगा। यह अफसोस की बात रही कि सरदार पटेल को मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न 1991 में दो अन्य लोगों के साथ दिया गया,

जबकि यह सम्मान उन्हें पचास के दशक में ही दे दिया जाना चाहिए था। इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि स्वयं पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भारत रत्न स्वीकार कर लिए थे, जबकि राजीव गांधी को मरणोपरांत 1991 में दिया गया। बहुतों के मन में यह टीस है कि एक परिवार से तीन-तीन लोगों को भारत रत्न दे दिए गए

और देश को एकजुट करने वाले सरदार पटेल को उनकी मृत्यु के 41 साल बाद दिया जा सका। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सराहना की जानी चाहिए कि कम से कम उनके नेतृत्व वाली सरकार ने सरदार पटेल को उनकी सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित कर वह वाजिब सम्मान देने में अहम भूमिका अदा की, जिसके वह सही मायने में हकदार थे।

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