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डॉ सुनील कुमार का लेख: जैव विविधता पर निर्भर मानव जाति की समृद्धि

ये जैव विविधता (Biodiversity) क्या होती है। सामान्य शब्दों में इसका अर्थ किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों एवं वनस्पतियों की संख्या से हैं। इसका संबंध पौधों के प्रकारों प्राणियों एवं सूक्ष्म जीवों से भी है। जैव विविधता से मानव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभ प्राप्त करता है जैसे कि जीव जन्तुओं वनस्पतियों से भोजन, आवास के लिए ज़रूरी संसाधन, औषधियां, इमारती लकड़ी और कपड़े आदि। साथ ही प्रकृति से मानव जाती को वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचार के लिए आवश्यक संसाधनों की भी प्राप्ति होती है। इन सभी को सम्मिलित रूप से ईकोसिस्टम सर्विसेस के नाम से जाना जाता है। समुद्री शैवाल, मछली, घोंगे आदि दुनिया के अरबों लोगों के लिए भोजन है। विकासशील देशों के कई लोग कृषि, पशुपालन और वानिकी पर भी आश्रित है। इस प्रकार जैव विविधता आजीविका के आधार के रूप में भी कार्य करती है।

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संयुक्त राष्ट्र प्रत्येक वर्ष 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (International Biodiversity Day) मनाता है ताकि वन्यजीवों के घटते आवास स्थल, जलीय प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे विभिन्न मुद्दों पर वैश्विक समुदाय को जागरूक किया जा सके। वर्ष 2020 के बायोडायवर्सिटी डे की थीम है-प्रकृति में हमारा समाधान। कथित विकास के दौर में हुआ ये है कि हम प्रकृति से दूर हुए हैं और एक कृत्रिम जीवन जी रहे हैं। कोविड 19 के कारण यातायात और औद्योगिक उत्पादन जैसी मानवजनित गतिविधियों में आये ठहराव ने हमें यह दिख दिया है कि हमारे कार्यों से प्रकृति को किस हद तक नुकसान पहुंच चुका है। लॉकडाउन के कारण नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड और कार्बन डाई ऑक्साइड के स्तर में बड़ी तेजी से गिरावट आई है और शहरी क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। अनेक नदियों के जल की गुणवत्ता में भी यही सकारात्मक बदलाव दिखाई दिया है।

भारत विश्व के जैव विविधता जैव विविधता (Biodiversity) बाहुल्य क्षेत्रों में से एक है और विश्व के 17 मेगा बाइओ डायवर्सिटी प्रदेशों में भारत को भी शामिल किया गया है। भारत में विश्व के 8 प्रतिशत से अधिक जैव विविधता (Biodiversity) पाई जाती है। हिमालय क्षेत्र, इंडो बर्मा क्षेत्र, पश्चिमी घाट और ग्रेट निकोबार द्वीप समूह है भारत के चार हॉट स्पॉट क्षेत्र का हिस्सा है। इस तरह के हॉट स्पॉट पर्यावरणीय पर्यटन के केंद्र के रूप मे विकसित किए जा रहे हैं ताकि वहां आवास करने वाले समुदायों के लिए रोजगार उपलब्ध हो सके और वे संरक्षण मे भागीदार बन सके ।

आज मानव द्वारा विभिन्न जीव जन्तुओं एवं वनस्पतियों के आवास क्षेत्र में अत्यधिक हस्तक्षेप से प्रजातियों के विलुप्त होने की गति बढ़ गई है। लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट जो के बायोडायवर्सिटी और हेल्थ ऑफ़ का प्लेनेट के बारे में व्यापक अध्ययन करती है, के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में यह तीव्रतम विलोपन की प्रक्रिया जारी है। विभिन्न स्पीशीज वर्तमान विलोपन की दर एतिहासिक दरों की तुलना में 100 से 1000 गुना अधिक है। आगामी कुछ दशकों में 10 लाख से अधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का ख़तरा है। मनुष्यों में होने वाले सभी संक्रामक रोगों में से लगभग 60 प्रतिशत जूनोटिक हैं- जानवरों से मनुष्य मे फैलने वाले। ज़ूनोटिक रोगों के उदभव का प्रमुख कारण है मानव गतिविधियों के फलस्वरूपहोने वाला भूमि उपयोग परिवर्तन। उदाहरण स्वरूप पश्चिम अफ्रीका में जंगलों के नुकसान के कारण वन्यजीवों और मानव बस्तियों के बीच संपर्क बढ़ा और परिणामस्वरूपका इबोला महामारी फैली। मानव-प्रेरित पर्यावरणीय परिवर्तन वन्यजीव आबादी संरचना को संशोधित करते हैं और जैव विविधता को कम करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप नई पर्यावरणीय परिस्थितियां जो विशेष रोगजनकों का पक्ष लेती हैं। कोरोना जैसी महामारी को भविष्य में रोकने के लिए बढ़ते हुए वैश्विक तापमान और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन को रोकना होगा।

पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता विभिन्न प्रकार की प्रजातियों का समर्थन करके रोगों को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है ताकि एक रोगजनक के लिए अधिक से अधिक फैलना, बढ़ना या हावी होना मुश्किल हो। जैसे की सभी को विदित है कि भारत के बढ़ते आर्थिक समृद्धि के कारण वन, खाद्य,शुद्ध पानी और शुद्ध हवा जैसे प्राकृतिक पूंजी को नुक़सान हुआ है। नेचुरल कैपिटल ओर जैव विविधता का संरक्षण भारत जैसे विकासशील देश के लिए बहुत ज़रूरी है क्योंकि जीवन निर्वाह गतिविधियों में सलंगित कई समुदायों की आजीविका प्रत्यक्ष रूप से स्वच्छ पर्यावरण पर निर्भर करती है। जैव विविधता के अपरदन के कारण मानव-वन्य जीवन संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ती जा रही है। देश भर में यह संघर्ष विभिन्न रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है जैसे की शहरों में बंदरों का ख़तरा, जंगली सुअर और हाथी जैसे शाकाहारी जंगली जानवरों द्वारा फसलों की हानि, तेंदुए एवं बाघ जैसे जंगली जानवरों द्वारा मवेशियों और मनुष्य पर आक्रमण। इन सभी का मुख्य कारण है, वन्य जीवों के प्राकृतिक पर्यावास का दिन प्रतिदिन संकुचित होना। आज युवाओं को जैव विविधता के मूल्य के बारे में और उनके द्वारा इन्हें संरक्षित करने के लिए जागरूक करना जरूरी है। जैव विविधता से संबंधित वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान को साझा करना और आने वाले भविष्य में जैव विविधता संरक्षण सुनिश्चित करते हुए कृषि और वानिकी को सतत रूप से प्रबंधित हमारे समाज की प्राथमिकता है। भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों की जैविक सीमा को ध्यान में रखते हुए सतत उत्पादन उपभोग को सुनिश्चित करना होगा। पर्यावरण संरक्षण करना होगा। इस अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के उपलक्ष्य में हमें यह प्रण लेना होगा कि हम प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का श्रद्धा से पालन करें और हम एक योद्धा की तरह प्रकृति की रक्षा करेंगे।

(लेखक भारतीय वन सेवा, हरियाणा कैडर के अधिकारी हैं। )

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