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भाषा और प्रांत के नाम पर बंद हो राजनीति

तमिलनाडु तो ऐसा राज्य बन गया हैं जो हर छोटे-बड़े मुद्दे को बेवजह तूल दे कर देश में अपनी उपस्थिति सिद्ध करना चाहता है।

भाषा और प्रांत के नाम पर बंद हो राजनीति

नई दिल्‍ली. केंद्र सरकार ने राजभाषा को सम्मान देने की खातिर सभी सरकारी विभागों और सोशल साइट्स पर सरकारी कामकाज में हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के आदेश दिए हैं। अपने ही देश में भारी उपेक्षा का सामना कर रही हिंदी के उत्थान की दिशा में यह सराहनीय कदम है। केंद्र में बनने वाली भाजपा की अगुआई वाली नई सरकार में हिंदी एक सम्मानजनक स्थान पाएगी इसका अंदाजा उसी दिन हो गया था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित अधिकांश मंत्रियों ने हिंदी में ही शपथ ग्रहण किया था। उसके बाद नरेंद्र मोदी ने यह कह कर सारी शंकाओं को दूर कर दिया था कि वे देश के अंदर और बाहर हिंदी में ही बात करेंगे।

केंद्र सरकार के इस कदम पर राजनीति भी शुरू हो गईहै। 1960 के दशक में तमिलनाडु में हिंदी के खिलाफ आंदोलन चला चुके करुणानिधि ने इसे हिंदी थोपे जाने की शुरुआत करार दिया है। वहीं जयललिता ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर गृह मंत्रालय के हिंदी इस्तेमाल करने के आदेश पर आपत्ति जताई है। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी केंद्र सरकार की ऐसी कोशिशों का विरोध किया है। हालांकि केंद्र सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया हैकि हिंदी को कामकाज में प्राथमिकता देने को अन्य भाषाओं को कमतर किए जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

चूंकि हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है और जिस तरह से अंग्रेजी की तुलना में इसके साथ भेदभाव किया गया है उसे देखते हुए इसको बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही थी। हालांकि इसके लिए कई कमेटियां बनी हैं, हिंदी पखवाड़ा इसीलिए मनाया जाता है, लेकिन इसके बावजूद हिंदी कहां है? नए कदमों से हिंदी बोलने वाले लोगों का निश्चित रूप से आत्मविश्वास बढ़ेगा। वहीं कुछ लोगों को राजनीति करने के लिए हिंदी सबसे माकूल रही है।

तमिलनाडु तो ऐसा राज्य बन गया हैं जो हर छोटे-बड़े मुद्दे को बेवजह तूल दे कर देश में अपनी उपस्थिति सिद्ध करना चाहता है। यह गैर जरूरी राजनीति है जो नहीं होनी चाहिए। हिंदी को कभी का राष्टÑभाषा का दर्जा मिल जाना चाहिए था परंतु इन्हीं कारणों से नहीं मिल सका है। भाषा, प्रांत और जल बंटवारे के नाम पर होने वाली तुच्छ राजनीति से देश में कई बार टकराव के हालात पैदा हुए हैं। एक जमाना था जब हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान का नारा लगता था परंतु छद्म धर्म-निरपेक्षतावादियों ने इस पर सवाल किए कि भारत सिर्फ हिंदुस्तान नहीं है और यहां केवल हिंदू नहीं रहते हैं।

यहां कई सांप्रदायों के लोग निवास करते हैं। हिंदू को भी गलत ढंग से परिभाषित किया जाता है। हम जानते हैं हिंद से हिंदू शब्द का जन्म हुआ है। हिंदू किसी भी प्रकार से सांप्रदायिकता का पुट नहीं देता है। यह एक जीवन पद्धति है, जीवन शैली है, जिसकी व्याख्या सुप्रीम कोर्टतक ने की है। देश में हिंदी सबसे ज्यादा बोली, समझी और पढ़ी जाने वाली भाषा है। वहीं यह चीनी के बाद दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता सबको मालूम है। हिंदी फिल्में गैर-हिंदी प्रदेशों में भी खूब देखी जाती हैं। इसमें किसी को आपत्ति नहीं है पर केंद्र सरकार हिंदी को सम्मान देने की कोशिश कर रही है तो इसमें अड़ंगा किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है।

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