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नोटिस की नौबत ही क्यों आने दी अजित सिंह ने

बतौर प्रधानमंत्री भी वे 12 तुगलक रोड पर ही रहते थे। इसी आवास पर उन्होंने अंतिम सांसें लीं।

नोटिस की नौबत ही क्यों आने दी अजित सिंह ने

पूर्व केन्द्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह भी उन नेताओं में शामिल हैं, जिनके सरकारी आवासों के बिजली और पानी के कनेक्शन काट दिए गए हैं। अजित सहित तीस पूर्व मंत्रियों और पूर्व सांसदों ने चुनाव हारने के बावजूद निर्धारित समयावधि में सरकारी आवास खाली नहीं किए। यही नहीं, उन्होंने दिल्ली नगरपालिका परिषद के नोटिसों को गंभीरता से नहीं लिया। कुछ समय पूर्व जब परिषद के अधिकारी पुलिस के साथ आवास खाली कराने के लिए पहुंचे तो अजित सिंह के आवास पर जमा उनके समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ा। अब कनेक्शन काटे जाने के बाद अजित का बयान आया है कि श्राद्ध पक्ष चल रहा है और उन्होंने नगरपालिका परिषद के अधिकारियों से कहा था कि पच्चीस सितंबर के बाद वे आवास खाली करके नए आवास में चले जाएंगे। यहां यह भी सवाल उठता है कि श्राद्ध शुरू होने से पहले ही उन्होंने आवास खाली क्यों नहीं कर दिया। हालत यह है कि कनेक्शन काटे जाने के बावजूद उन्होंने आवास खाली नहीं किया है। बिजली के विकल्प के तौर पर उन्होंने साउंड प्रूफ जनरेटर की व्यवस्था कर ली है, जिसका प्रतिदिन का खर्च पांच हजार से ऊपर है। अजित सिंह लंबे अरसे से 12 तुगलक रोड के इस आवास में रह रहे हैं। उनके पिता, पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह भी इसी आवास में रहे हैं। बतौर प्रधानमंत्री भी वे 12 तुगलक रोड पर ही रहते थे। इसी आवास पर उन्होंने अंतिम सांसें लीं। इसलिए हो सकता है कि अजित सिंह का इस आवास से एक भावनात्मक लगाव रहा हो परन्तु यह भी सत्य है कि जो भी विधान, नियम और व्यवस्था है, सबके लिए उसका पालन करना जरूरी है। स्वयं अजित सिंह भी इस सबसे अवगत हैं। उनका लंबा संसदीय अनुभव है। चार प्रधानमंत्रियों के साथ केन्द्र में मंत्री रह चुके हैं। यह दूसरी बार है, जब वे बागपत से लोकसभा का चुनाव हारे हैं। पहले 1998 में भाजपा प्रत्याशी सोमपाल शास्त्री ने उन्हें परास्त किया और 2014 में नरेन्द्र मोदी की आंधी में उन्हें मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह ने पराजित कर दिया। कम ही लोग जानते हैं कि सत्यपाल सिंह नब्बे के दशक में अजित सिंह की मिनिस्ट्री में उनके पीएस के तौर पर काम कर चुके हैं। बहरहाल, आज की हकीकत यही है कि अजित लोकसभा का चुनाव हारे हैं और भले ही वे एक पार्टी के अध्यक्ष हों और कई बार के सांसद व मंत्री रहे हों, परन्तु नियमों के अनुसार उन्हें सरकारी आवास खाली करना है। यहां यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि पूरा जीवन सिद्धांतों और मूल्यों की राजनीति करने वाले उनके पिता चौधरी चरण सिंह के समक्ष यदि ऐसी ही परिस्थितियां निर्मित हुई होती तो क्या वह ऐसी नौबत आने देते? कुछ का मानना है कि वे नोटिस का इंतजार तक नहीं करते और चुनाव हारने के तुरंत बाद आवास खाली करके रहने के लिए किसी दूसरी जगह चले जाते। अजित सिंह ने जिस तरह के हालात उत्पन्न होने दिए, वह दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इससे उनके समर्थकों में भी गहरी निराशा देखी जा रही है। एक समय था, जब चौधरी चरण सिंह की लंबी-चौड़ी राजनीतिक विरासत हुआ करती थी। उनका जादू अपनी बिरादरी तक सीमित नहीं था। पिछड़ों के भी वे नेता थे, लेकिन उनके स्वर्गवास के उपरांत अजित सिंह उस शानदार विरासत को संभालने में नाकाम सिद्ध हुए। और उन्होंने नौबत नोटिस तक पहुंचा दी।

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