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भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को शहीद का दर्जा नहीं, 20 साल तक पढ़ाते रहे ''आतंकी''

जम्मू के एक्टिविस्ट रोहित चौधरी ने पूछा था कि क्या तीनों शहीदों को शहीद का दर्जा दिया गया है?

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को शहीद का दर्जा नहीं, 20 साल तक पढ़ाते रहे

स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को भारत सरकार ने अभी तक शहीद ही नहीं माना। एक आरटीआई में इस बात का खुलासा हुआ है। यह आरटीआई इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) में दाखिल की गई थी।

आरटीआई से यह बात भी सामने आई है कि आईसीएचआर की ओर से नवंबर में रिलीज की गई किताब में भगत सिंह और बाकी दो शहीदों को कट्टर युवा और आतंकी करार दिया गया है। बता दें कि आईसीएचआर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला संगठन है।

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आईसीएचआर का चेयरमैन भारत सरकार की ओर से नियुक्त किया जाता है। मीडिया रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। पिछली सरकारें लगातार इन तीनों क्रांतिकारियों की शहादत को नजरअंदाज करती आई हैं।

ये वे शहीद हैं, जिन्होंने कई पीढ़ियों को प्रेरणा दी है। आरटीआई के जरिए जम्मू के एक्टिविस्ट रोहित चौधरी ने पूछा था कि क्या तीनों शहीदों को शहीद का दर्जा दिया गया है?

आतंकी लिखने पर रोका था प्रकाशन

भगत सिंह को आतंकी बताने का यह पहला मामला नहीं। पिछले साल दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल एक किताब, जिसमें भगत सिंह को क्रांतिकारी-आतंकवादी (रिवाल्यूशनरी टेररिस्ट) करार दिया गया था,

इसके बोद किताब के हिंदी अनुवाद की बिक्री और वितरण को रोकने का फैसला किया गया था। बिपन चंद्रा, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, सुचेता महाजन और केएन पणिकर की ओर से लिखी गई और डीयू की ओर से प्रकाशित किताब ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ के बिक्री और वितरण को रोक दिया गया था।

20 साल तक डीयू में पढ़ाते रहे आतंकी

अंग्रेजी में 'इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस' नाम की यह किताब पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से डीयू के पाठ्यक्रम का हिस्सा रही है। इस किताब के 20वें अध्याय में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सूर्य सेन और अन्य को क्रांतिकारी ‘रिवाल्यूशनरी टेररिस्ट’ बताया गया है।

इस किताब में चटगांव आंदोलन को भी आतंकवादी कृत्य कहा गया है, जबकि ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सैंडर्स की हत्या को भी आतंकवादी कृत्य करार दिया गया है। इस किताब का हिंदी संस्करण भारत का स्वतंत्रता संघर्ष 1990 में डीयू के हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय की ओर से प्रकाशित किया गया था।

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