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सावधान! विश्वसनीय नहीं फेसबुक, ये है सबूत

फेसबुक की पूरी दुनिया में धाक थी। सरकारें अपनी जीत के लिए और अपनी उपलब्धियों के प्रसार के लिए फेसबुक का सहारा लेने के लिए बाध्य होती रही हैं। लेकिन जब डेटा लीक होने लगे तब समझ लेना चाहिए फेसबुक विश्वसनीय नहीं है।

सावधान! विश्वसनीय नहीं फेसबुक, ये है सबूत

फेसबुक की पूरी दुनिया में धाक थी। सरकारें अपनी जीत के लिए और अपनी उपलब्धियों के प्रसार के लिए फेसबुक का सहारा लेने के लिए बाध्य होती रही हैं। कारपोरेट जगत हो, राजनीति या फिर अन्य सामाजिक सरोकार वाले संगठन सभी फेसबुक के सामने नतमस्तक थे। मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक यूजर्स की निजी जानकारियां बेचकर अरबों रुपये कमा लिए हैं, लेकिन अब उन्होंने भरोसा खो दिया है।

फेसबुक और मार्क जकरबर्ग को अपनी करनी की सजा भुगतनी ही होगी। श्वसनीयता वह पूंजी है जिसके सहारे लोग प्रेरक और ख्याति पूर्ण उंचाइयां प्राप्त करते हैं। अगर विश्वसनीयता गई तो ख्याति और उपलब्धियां विध्वंस हो जाती है। फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरवर्ग फेसबुक की स्थापना कर और दुनिया को मेलजोल बढ़ाने का एक सुनहरा मंच देकर प्रेरक बन गये थे।

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दुनिया भर में फेसबुक के अरबों फलोवर है। इन्हीं के बल पर मार्क जकरबर्ग कई साल तक दुनिया के सबसे अमीर आदमी बने रहे हैं, उनकी आमदनी दिनों-दिन बढ़ती चली गई, फेसबुक के शेयर उंचाइयां नापते रहे। अवधारणा यह थी कि फेसबुक के शेयर खरीदने से पैसे डूबेंगे नहीं बल्कि अन्य कंपनियों के शेयर से कई गुणा अधिक बढेंगे।

इसलिए फायदे का सौदा है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि यह सोच काम करती थी कि फेसबुक की विश्वसनीयता कभी भी गिर ही नहीं सकती। फेसबुक कभी भी अनैतिकता को गले लगा ही नहीं सकती है, जब विश्वसनीयता रहेगी, अनैतिकता और बईमानी उसको ग्रसित करेगी ही नहीं तो शेयर गिरेंगे नहीं। दुनिया में फेसबुक की धाक तो चलती ही रहेगा।

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सही भी था कि दुनिया की सरकारें अपनी जीत के लिए और अपनी सरकार की उपलब्धियों के प्रसार के लिए फेसबुक का सहारा लेने के लिए बाध्य होती रही हैं। कारपोरेट जगत हो, राजनीतिए या फिर अन्य सामाजिक सरोकार वाले संगठन सभी फेसबुक के सामने नतमस्तक थे। युवा और युवतियां फेसबुक और मार्क जकरबर्ग के साथ आन बान शान समझते थे।

मार्क जकरबर्ग जिस देश में जाता था उस देश की पत्रकारिता और राजनीति की सूर्खिया बन जाते थे। पूंजी के दौर में अनैतिकता और लालच से दूर रहना मुश्किल है। यह खेल बड़ा क्रूर होता है, संहारक, अनैतिक और बेईमान होता है। बड़े से बड़े लाभार्थी बनने के लिए अनैतिकता, अविश्वसनीयता, बेईमानी और लालच का मार्ग अपनाने में भी शर्मसार नहीं होते है।

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मार्क जकरबर्ग कोई भगवान तो नहीं थे कि पंूजी की काली कोठरी में रहकर बेदाग भी निकलते। वे भी पूंजी की काली कोठरी में बेदाग नहीं हो सके, वे लालच, बेईमानी, अनैतिकता और अविश्वसनीयता पर सवार हो गए। विश्वसनीयता खंडित करने के गुनाहगार हो गये। ऐसी खंडित विश्वसनीयता, अनैतिकता, लालच और बेईमानी की उम्मीद उस मार्क जकरबर्ग से नहीं थी जिस मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक की स्थापना कर दुनिया को सोशल मीडिया का बेहतरीन मंच दिया था।

जब उनकी खंडित विश्वसनीयता, अनैतिकता, बेईमानी, लालच सामने आया तब दुनिया दंग रह गई। पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ पर सच्चाई खुलती गयी तो फिर मार्क जकरबर्ग प्रेरणा और क्रांति के धोतक नही रहे। वे ईमानदारी के नायक नहीं बल्कि एक बदनुमा शख्सियत के तौर पर खड़े हो गए। युवा अब मार्क जकरबर्ग से प्रेरणा नहीं ले रहे बल्कि घृणा कर रहे हैं।

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युवाओं की अविश्वसनीयता जकरबर्ग को कहीं का नहीं छोडेंगी। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि जकरबर्ग ने ऐसा कौन सा कार्य किया है। उल्लेखनीय तौर पर उसने फेसबुक के यूजर्स की निजी जानकारियां बेची हैं, जिससे अरबों रुपये कमाये हैं। फेसबुक पहले दावा करता था कि यूजर्स उनकी संपत्ति है, उनके प्रेरणा स्रोत है, कामयाबी के नायक है, इसलिए उनके साथ विश्वसघात हो नहीं सकता है।

यूजर्स की सभी निजी जानकारियां सुरक्षित हैं। पर जकरबर्ग ने पैसे के लालच में यूजर्स की जानकारियां बेच डाली हैं। कैम्ब्रिज एनालिटिका को करोडों यूजर्स की जानकारियां बेची थी। मार्क जकरबर्ग को यह खुशफहमी थी कि उनका यह व्यापार कभी दुनिया के सामने आयेगा ही नहीं। इस अनैतिक और बेईमानी का गठजोड कभी नहीं खुलेगा।

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पर दुनिया भी अपनी नजरें तेज कर रखती हैं। मार्क जबरबर्ग और कैम्ब्रिज एनालिटिका के इस नापाक गठबंधन की पोल द गार्डियन ने खोल दी थी। ब्रिटेन के अखबार द गाडियन ने खबर दी थी कि जकरबर्ग ने कैम्ब्रिज एनालिटिका को यूजर्स की जानकारियां बेची है। पहले तो मार्क जकरबर्ग खंडन पर खंडन करते रहा। जैसे-जैसे हंगामा मचता गया वैसे-वैसे फेसबुक की परेशानियां बढ़ती चली गई।

लाचार होकर फेसबुक और मार्क जकरबर्ग को यह अनैतिकता और बईमानी की कहानी को स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने निजी जानकारियां क्यों खरीदी थी। कैम्ब्रिज एनालिअिका ने इसका क्या किया था। दरअसल ये जानकारियां चुनाव परिस्थितियों को प्रभावित करने के लिए खरीदी थी। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं ली थी।

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अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प का उदय एक आश्चर्यजनक घटना थी। पूरी दुनिया यह मानती थी कि ट्रम्प राष्ट्रपति का चुनाव जीत ही नहीं सकते। पर अमेरिका और शेष दुनिया की अवधारणा को तोड़कर ट्रम्प राष्ट्रपति का चुनाव जीते। अमेरिका की राजनीति का यह कहना है कि अगर बाहरी हस्तक्षेप नहीं होता तो निश्चित तौर डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव नही जीत पाते हैं।

अब अमेरिका में कैम्ब्रिज एनालिटिका के खिलाफ परिस्थितियां गर्म है और मार्क जकरबर्ग के खिलाफ भी कार्रवाई करने की मांग उठ रही है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि भारत में भी फेसबुक यूजर्स की जानकारियां कैम्ब्रिज एनालिटिका को बेची गई। कांग्रेस और राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ और 2019 का चुनाव जीतने के लिए कैम्बिज एनालिटिका की सेवाएं ली है।

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कैम्ब्रिज एनालिटिका आज कांग्रेस का चुनाव प्रचार संभाले हुए हैं। कई अन्य देशों की जनमत को भी फेसबुक और कैम्ब्रिज ने प्रभावित किया हैं। दुष्परिणाम आक्रोश के रूप में सामने आ रहे हैं। फेसबुक और कैम्ब्रिज एनालिटिका के खिलाफ दुनिया भर मे आक्रोश फैला हुआ है। बड़ी-बड़ी हस्तियां लगातार अपना एकाउंट डिलिट कर रही है।

अब तक छह करोड़ लोगों ने फेसबुक को अलविदा कह दिया है। फेसबुक के शेयर लगातार गिर रहे हैं। ब्रिटेन की जांच एजेंसियां लगातार मार्क जकरबर्ग और कैम्बिज एनालिटिका के खिलाफ जांच कर रही हैं। भारत सरकार ने भी फेसबुक पर कार्रवाई करने के लिए जवाब तलक किया है। मार्क जकरबर्ग पर इस्तीफा देने का लगातार दबाव पड़ रहा है।

लगता है कि मार्क जकरबर्ग जिस तरह से उंचाइयों पर पहुंचे थे उसी प्रकार फर्श पर गिर जाएंगे। निश्चित तौर मार्क जकरबर्ग ने बईमानी और लालच में अपनी विश्वसनीयता खोई हैं। अब मार्क जकरबर्ग का पतन कोई रोक नहीं सकता है। एक न एक दिन फेसबुक अविश्वसनीय हो जाएगी। फेसबुक और मार्क जकरबर्ग को अपनी करनी की सजा भुगतनी ही होगी।

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