अजित पवार: बारामती के 'अजेय योद्धा' का 44 साल का सफर, रिकॉर्ड 8 बार विधायक और 6 बार बने डिप्टी सीएम, पढ़िए उनके अनसुने किस्से!

बारामती के अजेय योद्धा का 44 साल का सफर, रिकॉर्ड 8 बार विधायक और 6 बार बने डिप्टी सीएम, पढ़िए उनके अनसुने किस्से!
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1982 में एक चीनी मिल के बोर्ड मेंबर से शुरू हुआ उनका सफर, राज्य के सबसे शक्तिशाली पदों तक पहुंचा।

1991 से बारामती का नेतृत्व करने वाले पवार अपनी कड़क कार्यशैली और सुबह 6 बजे की बैठकों के लिए मशहूर थे। वे अपने पीछे पत्नी सुनेत्रा पवार और दो बेटों को छोड़ गए हैं।

​मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में 'प्रशासन के मास्टर' और 'दादा' के नाम से मशहूर उपमुख्यमंत्री अजित पवार का आज बुधवार, 28 जनवरी 2026 की सुबह एक दर्दनाक विमान हादसे में निधन हो गया।

बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिंग के दौरान उनका चार्टर्ड विमान तकनीकी खराबी के चलते क्रैश हो गया, जिसमें पवार समेत 5 लोगों की जान चली गई। 66 वर्षीय अजित पवार न केवल एक राजनेता थे, बल्कि बारामती के विकास के पर्याय भी थे।


उनके आकस्मिक निधन से पूरे देश में शोक की लहर है और महाराष्ट्र ने अपना एक सबसे प्रभावशाली और दबंग जननेता खो दिया है।

राजनीतिक करियर: पहली बार चुनाव और जीत-हार का रिकॉर्ड

​अजित पवार का चुनावी सफर बेमिसाल रहा है। उन्होंने अपने पूरे जीवन में विधानसभा का कोई चुनाव नहीं हारा।


​पहला चुनाव (1991): अजित पवार ने अपना पहला बड़ा चुनाव 1991 में बारामती लोकसभा सीट से लड़ा और जीता।

हालांकि, जब शरद पवार पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में रक्षा मंत्री बने, तो अजित ने उनके लिए सीट खाली कर दी और राज्य की राजनीति में लौट आए।

​विधानसभा का रिकॉर्ड (1991-2026): वे 1991 के उपचुनाव में पहली बार बारामती से विधायक बने। इसके बाद 1995, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और हाल ही में नवंबर 2024 में उन्होंने आठवीं बार बारामती सीट से जीत दर्ज की।

2024 के चुनाव में उन्होंने अपने सगे भतीजे युगेंद्र पवार को 1 लाख से अधिक वोटों के अंतर से हराया था।

​प्रमुख पद: वे महाराष्ट्र के सबसे लंबे समय तक रहने वाले उपमुख्यमंत्री (कुल 6 बार) रहे। उन्होंने सिंचाई, जल संसाधन, बिजली, योजना और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभाला। वे 2022-23 में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे।


​पारिवारिक पृष्ठभूमि: पत्नी सुनेत्रा पवार और उनका राजनीतिक रसूख

​अजित पवार का विवाह 1985 में सुनेत्रा पवार से हुआ था। सुनेत्रा पवार केवल एक 'गृहणी' नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के एक बेहद शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से आती हैं।

​ससुराल पक्ष: सुनेत्रा पवार, महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री और दिग्गज नेता पदमसिंह पाटिल की बहन हैं। पदमसिंह पाटिल शरद पवार के बेहद करीबी और महाराष्ट्र की राजनीति के पुराने खिलाड़ी रहे हैं। इस तरह सुनेत्रा का मायका और ससुराल दोनों ही सत्ता के केंद्र रहे हैं।

​वर्तमान पद: सुनेत्रा पवार वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं। इससे पहले उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव बारामती से अपनी ननद सुप्रिया सुले के खिलाफ लड़ा था, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। बाद में जून 2024 में वे निर्विरोध राज्यसभा चुनी गईं।

​बेटे: पार्थ और जय पवार का राजनीतिक और व्यावसायिक जीवन

​अजित पवार के दो बेटे हैं, जो अपनी-अपनी तरह से पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं:

​पार्थ पवार (बड़ा बेटा): पार्थ ने राजनीति में कदम रखा है। उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव मावल सीट से लड़ा था। हालांकि, यह चुनाव उनके लिए सुखद नहीं रहा और वे शिवसेना के श्रीरंग बारणे से 2,15,913 वोटों के भारी अंतर से हार गए थे। यह पवार परिवार के इतिहास में किसी सदस्य की पहली बड़ी चुनावी हार थी। वर्तमान में वे व्यापार और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।

​जय पवार (छोटा बेटा): जय पवार मुख्य रूप से लाइमलाइट से दूर रहते हैं और परिवार के बिजनेस व कृषि क्षेत्र को संभालते हैं। वे बारामती में पिता के चुनाव प्रबंधन का काम देखते रहे हैं। जय पवार का विवाह दिसंबर 2025 में प्रभावशाली पाटिल परिवार की बेटी ऋतुजा पाटिल से हुआ था।

​सत्ता का केंद्र और बारामती का 'दादा'

​अजित पवार को महाराष्ट्र में 'प्रशासन का मास्टर' कहा जाता था। सुबह 6 बजे से काम शुरू करने की उनकी शैली और अधिकारियों पर उनकी पकड़ बेमिसाल थी। 2023 में उन्होंने शरद पवार से अलग होकर एनसीपी (अजित गुट) बनाया और बीजेपी-शिवसेना गठबंधन में शामिल हुए।


चुनाव आयोग ने उनके गुट को ही 'असली एनसीपी' और 'घड़ी' चुनाव चिन्ह प्रदान किया था। आज उनके निधन से बारामती ने अपना सबसे भरोसेमंद अभिभावक खो दिया है।

अंधविश्वास से कोसों दूर: न अंगूठी, न कलावा, न ज्योतिष पर भरोसा

​अजित पवार महाराष्ट्र के उन गिने-चुने राजनेताओं में से थे जो किसी भी तरह के अंधविश्वास या धार्मिक आडंबर में यकीन नहीं रखते थे। वे अपनी कलाई पर कभी कलावा नहीं बांधते थे और न ही उनके हाथों में कभी कोई कीमती रत्न या अंगूठी देखी गई।

जब उनसे एक इंटरव्यू में पूछा गया कि क्या वे ज्योतिष में विश्वास रखते हैं, तो उन्होंने दोटूक जवाब दिया था कि उन्हें सिर्फ अपनी काबिलियत और मेहनत पर भरोसा है। वे इसे 'कर्म ही पूजा' का सिद्धांत मानते थे।

फिल्म जगत से गहरा नाता: 'राजकमल स्टूडियो' और शुरुआती सपने

​बहुत कम लोग जानते हैं कि अजित पवार के पिता अनंतराव पवार फिल्म जगत के दिग्गज निर्देशक वी. शांताराम के साथ काम करते थे। वे मशहूर 'राजकमल स्टूडियो' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। अजित पवार का बचपन मुंबई के फिल्मी माहौल के करीब बीता था।

कहा जाता है कि अगर 18 साल की उम्र में उनके पिता का आकस्मिक निधन न हुआ होता, तो शायद वे आज राजनीति के बजाय फिल्म निर्माण या निर्देशन के क्षेत्र में अपना नाम बना रहे होते। पिता की मृत्यु के बाद वे वापस बारामती लौटे और खेती-किसानी संभालने लगे।

स्पोर्ट्स के प्रति दीवानगी: खो-खो और कबड्डी के थे पक्के खिलाड़ी

​अजित पवार केवल राजनीति के अखाड़े के ही माहिर नहीं थे, बल्कि वे खेल के मैदान पर भी उतने ही सक्रिय थे। उन्हें बचपन से ही स्वदेशी खेलों जैसे खो-खो, कबड्डी और क्रिकेट का बहुत शौक था।

वे न केवल इन खेलों के शौकीन थे, बल्कि शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर में अपनी पढ़ाई के दौरान वे कई खेल प्रतियोगिताओं का हिस्सा भी रहे। वे अक्सर कहते थे कि राजनीति में जो 'त्वरित निर्णय' लेने की उनकी क्षमता है, वह उन्होंने खेल के मैदान से ही सीखी है।

​काम का जुनून: 16-17 घंटे का वर्किंग शेड्यूल और 'नो फाइल पेंडिंग' नियम

​'दादा' का वर्किंग कल्चर महाराष्ट्र के मंत्रालय में एक मिसाल था। वे रोजाना 16 से 17 घंटे काम करते थे। उनका एक सख्त नियम था- "कोई भी फाइल अगले दिन के लिए टेबल पर नहीं रहनी चाहिए।

" वे अधिकारियों के बीच इसलिए खौफ में रहते थे क्योंकि वे फाइलों का बारीकी से अध्ययन करते थे और अगर कोई अधिकारी गलत जानकारी देता, तो वे उसे सबके सामने टोकने से नहीं कतराते थे।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक बार मजाकिया लहजे में कहा था, "शिफ्ट में काम करेंगे- सुबह की ड्यूटी अजित पवार की और रात की मेरी।"

सामाजिक जुड़ाव: 'विद्या प्रतिष्ठान' और शिक्षा के प्रति समर्पण

​अजित पवार का बारामती प्रेम सिर्फ वोट बैंक तक सीमित नहीं था। उन्होंने 'विद्या प्रतिष्ठान' जैसी शिक्षण संस्थाओं के जरिए बारामती को एक 'एजुकेशन हब' बना दिया।

वे अक्सर बिना सुरक्षा गार्ड के चुपचाप स्कूलों और कॉलेजों का दौरा करते थे ताकि देख सकें कि बच्चों को मिलने वाली सुविधाएं और खाने की गुणवत्ता कैसी है।

वे गरीब छात्रों की फीस अपनी जेब से भरने के लिए भी जाने जाते थे, जिसका वे कभी सार्वजनिक रूप से प्रचार नहीं करते थे।


​अजित पवार की विरासत और अंतिम विदाई

​अजित पवार अपने पीछे एक ऐसा राजनीतिक ढांचा छोड़ गए हैं, जो बारामती के विकास और सहकारिता मॉडल पर आधारित है।

उन्होंने पिंपरी-चिंचवाड़ और पुणे के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उनके निधन के बाद अब उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और बेटे पार्थ पवार पर इस विशाल राजनीतिक विरासत को संभालने की जिम्मेदारी होगी।


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