भाजपा में 'नितिन' उदय: ABVP के संघर्ष से लेकर 'नबीन' नेतृत्व तक का सफरनामा; क्या 45 साल का युवा सारथी बदल देगा सियासत की दिशा?

ABVP के संघर्ष से लेकर नबीन नेतृत्व तक का सफरनामा; क्या 45 साल का युवा सारथी बदल देगा सियासत की दिशा?
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भाजपा के इतिहास में आज तक अध्यक्ष पद के लिए कभी भी मतदान की नौबत नहीं आई है।

संघ के समर्थन और अपनी सांगठनिक क्षमता के दम पर वे अब 2027 के यूपी चुनाव और पांच राज्यों के आगामी चुनावों में भाजपा का नेतृत्व करेंगे।

नई दिल्ली : ​भारतीय जनता पार्टी के सांगठनिक इतिहास में आज 20 जनवरी 2026 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने जा रहा है।

दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित पार्टी मुख्यालय में जब नितिन नवीन के नाम की घोषणा राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में होगी, तो यह केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं, बल्कि भाजपा की 'जेनरेशनल शिफ्ट' की मुहर होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और अमित शाह की रणनीतिक छत्रछाया में, 45 वर्षीय नितिन नवीन अब उस कुर्सी पर बैठने जा रहे हैं जिसे कभी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गजों ने सुशोभित किया था।

बिहार की मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय फलक पर छाने वाले नितिन नवीन के सामने चुनौतियों का हिमालय है, लेकिन उनके पास संघ का अनुशासन और संगठन का लंबा अनुभव भी है।

​जनसंघ की स्थापना: अखंड भारत और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव

​भारतीय जनता पार्टी की जड़ें 'भारतीय जनसंघ' में निहित हैं, जिसकी स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। उस समय कांग्रेस के वर्चस्व के खिलाफ एक वैचारिक विकल्प की आवश्यकता थी।

डॉ. मुखर्जी ने 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे' का नारा देकर कश्मीर मुद्दे पर अपना बलिदान दिया। जनसंघ का मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अंत्योदय था।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'एकात्म मानववाद' के दर्शन ने इस संगठन को एक बौद्धिक आधार प्रदान किया, जो आज भी भाजपा का मार्गदर्शक सिद्धांत है।

भाजपा के सारथी: अब तक के राष्ट्रीय अध्यक्षों की गौरवशाली सूची

​भाजपा के इतिहास में अब तक कुल 11 पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं, और नितिन नवीन 12वें अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। प्रमुख नामों में शामिल हैं:

अटल बिहारी वाजपेयी (1980 – 1986)

​अटल जी भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष थे। उन्होंने पार्टी की वैचारिक नींव रखी और 'गांधीवादी समाजवाद' का नारा दिया। उनके 6 साल के कार्यकाल के दौरान पार्टी ने भारतीय राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू की।

​लालकृष्ण आडवाणी (1986 – 1991)

​आडवाणी जी के इस पहले कार्यकाल में भाजपा ने 'राम जन्मभूमि आंदोलन' के जरिए अपनी एक प्रखर राष्ट्रवादी छवि बनाई। उनके नेतृत्व में पार्टी की सीटें लोकसभा में 2 से बढ़कर 85 तक पहुँच गई थीं।

​डॉ. मुरली मनोहर जोशी (1991 – 1993)

​डॉ. जोशी के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि 'ekta yatra' (कन्याकुमारी से कश्मीर तक) थी। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और अखंडता के मुद्दे को केंद्र में रखा।

​लालकृष्ण आडवाणी (1993 – 1998)

​यह आडवाणी जी का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्यकाल था। इसी दौरान भाजपा पहली बार केंद्र की सत्ता में आई और सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।

​कुशाभाऊ ठाकरे (1998 – 2000)

​ठाकरे जी ने संगठन को निचले स्तर तक मजबूत करने का कार्य किया। उनके समय में केंद्र में एनडीए (NDA) की गठबंधन सरकार और मजबूत हुई।

​बंगारू लक्ष्मण (2000 – 2001)

​वह पार्टी के पहले दलित अध्यक्ष बने। उन्होंने दक्षिण भारत और पिछड़े वर्गों के बीच पार्टी का आधार बढ़ाने के प्रयास किए।

​जे. कृष्णमूर्ति (2001 – 2002)

​इन्होंने बंगारू लक्ष्मण के बाद कमान संभाली और संगठन के भीतर वैचारिक स्पष्टता और अनुशासन पर जोर दिया।

​एम. वेंकैया नायडू (2002 – 2004)

​नायडू जी ने संगठन में आधुनिकता का समावेश किया और "गांव चलो" जैसे अभियानों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया।

​लालकृष्ण आडवाणी (2004 – 2005)

​2004 के लोकसभा चुनाव के बाद आडवाणी जी ने एक बार फिर पार्टी की कमान संभाली और विपक्ष की भूमिका को धार दी।

​राजनाथ सिंह (2005 – 2009)

​राजनाथ सिंह का यह पहला कार्यकाल था। उन्होंने उत्तर भारत में पार्टी की पकड़ मजबूत की और संगठन में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया।

​नितिन गडकरी (2009 – 2013)

​गडकरी जी ने 'विकास' और 'अंत्योदय' को संगठन का मुख्य एजेंडा बनाया। उन्होंने सांगठनिक ढांचे को कॉर्पोरेट शैली में व्यवस्थित करने और आर्थिक नीतियों पर जोर दिया।

​राजनाथ सिंह (2013 – 2014)

​राजनाथ सिंह के इस दूसरे कार्यकाल में 2014 की ऐतिहासिक जीत मिली। उन्होंने ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।

​अमित शाह (2014 – 2020)

​अमित शाह के कार्यकाल में भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी। उन्होंने 'विस्तार' को प्राथमिकता दी और उन राज्यों (जैसे उत्तर-पूर्व और बंगाल) में भाजपा को खड़ा किया जहाँ पार्टी कमजोर थी।

​जे.पी. नड्डा (2020 – 2026)

​नड्डा जी ने सांगठनिक निरंतरता और सेवा कार्यों (जैसे कोविड के दौरान 'सेवा ही संगठन') पर ध्यान केंद्रित किया। उनके नेतृत्व में पार्टी ने कई महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव और 2024 का आम चुनाव लड़ा।


भाजपा के इतिहास में आज तक अध्यक्ष पद के लिए कभी भी मतदान की नौबत नहीं आई है।

संस्थापक और शुरुआती दौर

​अटल बिहारी वाजपेयी (1980): पार्टी के पहले अध्यक्ष के रूप में सर्वसम्मति से निर्विरोध चुने गए।

​लालकृष्ण आडवाणी (1986, 1993, 2004): अपने सभी कार्यकालों के लिए निर्विरोध चुने गए।

​डॉ. मुरली मनोहर जोशी (1991): इनके नाम पर भी सर्वसम्मति बनी थी।

​विस्तार का दौर (2000 - 2014)

​कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण, जे. कृष्णमूर्ति और वेंकैया नायडू: इन सभी नेताओं का चयन पार्टी के भीतर आम सहमति से हुआ था।

​राजनाथ सिंह (2005, 2013): दोनों ही बार निर्विरोध चुने गए।

​नितिन गडकरी (2009): जब इन्होंने कमान संभाली, तब भी कोई अन्य उम्मीदवार मुकाबले में नहीं था।

​आधुनिक दौर (2014 - 2026)

​अमित शाह (2014, 2016): 2014 में राजनाथ सिंह के मंत्री बनने के बाद उन्हें जिम्मेदारी दी गई और 2016 में वे विधिवत रूप से निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए।

​जे.पी. नड्डा (2020): 20 जनवरी 2020 को उन्हें निर्विरोध अध्यक्ष घोषित किया गया था।

​नितिन नबीन (2026): वर्तमान में 20 जनवरी 2026 को नितिन नबीन को भी निर्विरोध चुना गया है। उनके समर्थन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रस्तावक के रूप में हस्ताक्षर किए थे।

​1980: कमल का उदय और अटल बिहारी वाजपेयी का युग

​आपातकाल के बाद जनता पार्टी के प्रयोग के विफल होने पर 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।

उस समय उन्होंने भविष्यवाणी की थी— "अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।" उनके नेतृत्व में भाजपा ने शून्य से शिखर तक का सफर शुरू किया। अटल जी के उदारवाद और आडवाणी जी के प्रखर राष्ट्रवाद ने मिलकर भाजपा को भारतीय राजनीति के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया।

​अध्यक्षों की गौरवशाली श्रृंखला: शून्य से पूर्ण बहुमत तक का सफर

​भाजपा के इतिहास में अब तक कुल 11 निर्वाचित अध्यक्ष रहे हैं। लालकृष्ण आडवाणी ने सर्वाधिक तीन कार्यकालों (1986-91, 1993-98, 2004-05) में पार्टी को राम मंदिर आंदोलन के जरिए जन-जन तक पहुँचाया। डॉ. मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में एकता यात्रा ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक जोश भरा। कुशाभाऊ ठाकरे और जे. कृष्णमूर्ति जैसे समर्पित संगठनकर्ताओं ने कैडर को मजबूत किया।

राजनाथ सिंह के कार्यकाल में 2014 की ऐतिहासिक जीत मिली, जबकि अमित शाह ने भाजपा को 'विश्व की सबसे बड़ी पार्टी' बनाने का कीर्तिमान स्थापित किया। जेपी नड्डा के कार्यकाल में पार्टी ने राज्यों में अपनी पकड़ और मजबूत की।

​किंगमेकर की भूमिका: भाजपा अध्यक्ष के चयन में RSS का दखल

​भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच मजबूत रिश्ता है। भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा, इसमें नागपुर की सहमति अनिवार्य मानी जाती है।

संघ यह सुनिश्चित करता है कि अध्यक्ष बनने वाला व्यक्ति वैचारिक रूप से परिपक्व हो और संगठन के भीतर सामंजस्य बिठाने में माहिर हो। नितिन नवीन के चयन में भी संघ की प्रमुख भूमिका रही है। उनके परिवार का संघ से पुराना जुड़ाव और उनका खुद का अनुशासित जीवन संघ की कसौटी पर खरा उतरा, जिसके कारण उन्हें इस सर्वोच्च पद के लिए 'ग्रीन सिग्नल' मिला।

विरासत के वारिस: नवीन किशोर सिन्हा का वह 'चिराग' जो अब देश रोशन करेगा

​नितिन नवीन की राजनीति उनके घर से शुरू हुई। उनके पिता स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा बिहार भाजपा के स्तंभ थे। नितिन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पटना के सेंट माइकल हाई स्कूल से और 12वीं की पढ़ाई दिल्ली के सीएसकेएम पब्लिक स्कूल से की।

2005 में उनके पिता के असामयिक निधन ने उन्हें महज 26 साल की उम्र में राजनीति के मैदान में उतार दिया। वे पटना पश्चिम से चार बार विधायक रहे और उन्हें संगठन का 'चाणक्य' माना जाता था।

नितिन अक्सर कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता से सीखा है कि "राजनीति पद के लिए नहीं, बल्कि परिवर्तन के लिए की जाती है।"

एबीवीपी से राष्ट्रीय मुख्यालय तक: संघर्ष की तपिश में निखरा व्यक्तित्व

​नितिन नवीन का राजनीतिक सफर किसी 'पैराशूट लैंडिंग' जैसा नहीं है। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में पोस्टर चिपकाने से लेकर रैलियां आयोजित करने तक का काम किया है।

2006 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने लगातार पांच बार जीत दर्ज की। भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में उन्होंने देशभर के युवाओं को जोड़ा। उनकी कार्यशैली 'लो-प्रोफाइल' है, लेकिन उनके नतीजे हमेशा हाई-इंपैक्ट रहे हैं।

​छत्तीसगढ़ मॉडल: वह चुनावी चमत्कार जिसने नितिन को 'राष्ट्रीय' बना दिया

​नितिन नवीन को अध्यक्ष पद की रेस में सबसे आगे खड़ा करने वाला मोड़ 'छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023' था। छत्तीसगढ़ के प्रभारी के रूप में उन्होंने वहां की हारी हुई बाजी को जीत में बदल दिया। उन्होंने बूथ स्तर पर जाकर पन्ना प्रमुखों को सक्रिय किया और 'महतारी वंदन योजना' जैसी रणनीतियों से महिलाओं को पार्टी से जोड़ा।

उनकी इस रणनीतिक जीत ने पीएम मोदी और अमित शाह को प्रभावित किया, जिससे उन्हें पहले कार्यकारी अध्यक्ष और अब पूर्णकालिक अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली।

​निर्विरोध निर्वाचन: भाजपा के लोकतांत्रिक अनुशासन का प्रमाण

​भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव आमतौर पर निर्विरोध ही होता है। यह पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन को दर्शाता है। नितिन नवीन का नामांकन भी इसी परंपरा का हिस्सा है।

जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उनके नाम पर मुहर लगा दी, तो पूरे देश से प्रस्तावक उनके समर्थन में आ गए। यह दिखाता है कि पार्टी के भीतर नितिन नवीन की स्वीकार्यता उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक एक समान है।

​सबसे युवा सारथी: 45 की उम्र

​महज 45 साल की उम्र में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना एक बड़ी चुनौती है। नितिन नवीन अब जेपी नड्डा की जगह लेंगे। उनकी युवा ऊर्जा का लाभ पार्टी को उन क्षेत्रों में मिलेगा जहा युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।

वे तकनीकी रूप से दक्ष हैं और सोशल मीडिया की ताकत को समझते हैं, जो आज के चुनावी दौर में अनिवार्य है। युवा नेतृत्व के जरिए भाजपा 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए अभी से एक नया आधार तैयार करना चाहती है।

​बंगाल और असम का रण: नेतृत्व की पहली अग्निपरीक्षा

​नितिन नवीन के पद संभालते ही 2026 के विधानसभा चुनाव उनके सामने होंगे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ पार्टी को एकजुट करना और असम में हिमंता बिस्वा सरमा के साथ तालमेल बिठाकर सत्ता बचाए रखना उनकी प्राथमिकता होगी।

तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में, जहाँ भाजपा अभी भी संघर्ष कर रही है, वहां 'नवीन' विचारधारा को पहुचाना उनके सांगठनिक कौशल की परीक्षा लेगा।

​यूपी 2027: क्या 'नवीन' नीति से बचेगा मुख्यमंत्री योगी का किला?

​सबसे बड़ी चुनौती 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव है। यूपी को सत्ता का रास्ता माना जाता है। वहां समाजवादी पार्टी की बढ़ती सक्रियता और 'PDA' फार्मूले को काटना नितिन नवीन के लिए सबसे बड़ा टास्क होगा।

उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मिलकर एक ऐसी रणनीति तैयार करनी होगी जो जातिगत समीकरणों को साधते हुए हिंदुत्व और विकास के एजेंडे को आगे बढ़ा सके। उत्तराखंड में भी सत्ता विरोधी लहर को रोकना उनके एजेंडे में टॉप पर होगा।

​'नवीन' नेतृत्व की 3 मुख्य चुनौतियां: गुटबाजी, विस्तार और वैचारिकता

​अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन के सामने तीन प्रमुख मोर्चे होंगे:-

​गुटबाजी खत्म करना: विभिन्न राज्यों में स्थानीय नेताओं के बीच चल रहे शीतयुद्ध को समाप्त करना।

​दक्षिण में विस्तार: कर्नाटक के अलावा अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में भाजपा की जड़ें जमाना।

​कार्यकर्ता संपर्क: सत्ता में आने के बाद अक्सर कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करते हैं, उन्हें फिर से ऊर्जावान बनाना और संगठन से जोड़ना।

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