Middle East Crisis: पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में हलचल पैदा कर दी है, जिसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए भारत के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक व्यापक समीक्षा की है और देश में ईंधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कमर कस ली है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता देखी जा रही है, लेकिन भारत के पास पर्याप्त रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग मौजूद हैं, जिससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। सरकार का मुख्य ध्यान इस समय समुद्री मार्गों की सुरक्षा और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर है।
हॉर्मुज और समुद्री व्यापार की सुरक्षा
मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में पैदा होने वाला अवरोध है, क्योंकि भारत का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और एलपीजी का आयात इसी मार्ग से करता है।
हालिया तनाव के कारण जहाजों के बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत में वृद्धि हुई है, जिसका बोझ अंततः घरेलू बाजार पर पड़ सकता है। सरकार इस समय नौसेना और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित कर रही है कि भारतीय टैंकरों को सुरक्षित रास्ता मिले। इसके अलावा, मंत्रालय उन जहाजों की लगातार मॉनिटरिंग कर रहा है जो वर्तमान में होर्मुज के रास्ते भारत की ओर बढ़ रहे हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का $90 प्रति बैरल के पार जाना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और कीमतें और बढ़ती हैं, तो इससे देश में मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा पैदा हो जाएगा।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए सरकार तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के साथ लगातार संपर्क में है। मंत्रालय का प्रयास है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों का बोझ सीधे आम जनता पर न पड़े, इसके लिए कर संरचना में बदलाव या सब्सिडी के विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।
रणनीतिक तेल भंडार और आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत
भारत ने आपातकालीन स्थितियों के लिए अपने 'रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार' (SPR) का उपयोग करने की योजना भी तैयार रखी है। मंत्रालय ने संकेत दिया है कि यदि खाड़ी देशों से आपूर्ति में कोई बड़ा व्यवधान आता है, तो भारत अपने सुरक्षित भंडारों से तेल की कमी को पूरा करेगा।
इसके साथ ही, भारत अब खाड़ी देशों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से कच्चे तेल के आयात को और अधिक बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। यह विविधतापूर्ण आपूर्ति रणनीति भारत को किसी भी क्षेत्रीय युद्ध के प्रभाव से बचाने में ढाल का काम करेगी।
घरेलू उत्पादन और एलपीजी की आत्मनिर्भरता पर जोर
ऊर्जा संकट के इस दौर में सरकार ने घरेलू स्तर पर तेल और गैस के उत्पादन को बढ़ाने के लिए तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) और अन्य कंपनियों को निर्देश जारी किए हैं। विशेष रूप से रसोई गैस के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है ताकि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधित होने पर भी भारतीय रसोई का बजट न बिगड़े।
प्रधानमंत्री के विजन के अनुरूप, मंत्रालय अब हरित ऊर्जा और नवीकरणीय स्रोतों की ओर बदलाव की गति को भी तेज कर रहा है, ताकि भविष्य में इस प्रकार के भू-राजनीतिक संकटों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
बता दें कि भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है, ऐसे में मिडिल ईस्ट में किसी भी अस्थिरता का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर होर्मुज मार्ग बाधित होता है तो वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ सकता है।
FAQ
Q1. क्या भारत में तेल की कमी हो सकती है?
नहीं, सरकार के पास पर्याप्त रणनीतिक भंडार मौजूद हैं।
Q2. होर्मुज संकट का भारत पर क्या असर होगा?
आयात लागत बढ़ सकती है और तेल कीमतों में उछाल आ सकता है।
Q3. भारत वैकल्पिक तेल कहाँ से ला रहा है?
रूस, अमेरिका और अफ्रीका से आयात बढ़ाया जा रहा है।