भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़ा कूटनीतिक और संवैधानिक बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने 16 से 18 अप्रैल 2026 तक संसद का विशेष सत्र बुलाकर 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को 2029 तक लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। इस कानून को प्रभावी बनाने के लिए सरकार 'परिसीमन' का रास्ता चुन रही है, जिसके तहत लोकसभा की कुल सीटों को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है।
हालांकि, सीटों की इस भारी बढ़ोतरी ने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक बड़ी राजनीतिक लकीर खींच दी है। जहाँ उत्तर भारतीय राज्यों की ताकत दोगुनी होने वाली है, वहीं दक्षिण भारत इसे अपने साथ 'इंसाफ नहीं, बल्कि सजा' मान रहा है।
यूपी की छलांग और तमिलनाडु की चिंता: क्या कहते हैं आंकड़े?
प्रस्तावित परिसीमन 2011 की जनगणना और जनसंख्या वृद्धि के वर्तमान ट्रेंड पर आधारित है। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और कई विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, सीटों का बंटवारा कुछ इस तरह बदल सकता है:-
उत्तर प्रदेश: वर्तमान में 80 सांसद भेजने वाला यूपी, परिसीमन के बाद लोकसभा में 140 से 150 सांसदों वाला राज्य बन सकता है।
तमिलनाडु: 39 सीटों वाले इस राज्य की सीटें बढ़कर 58 तो दिखेंगी, लेकिन कुल अनुपात के हिसाब से यह घटकर 46 से 50 के बीच सिमट सकती हैं।
दक्षिण का घाटा: दक्षिण के पांच राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) का वर्तमान प्रतिनिधित्व 24.3% है, जो नए परिसीमन के बाद घटकर 20.7% रह जाने का अनुमान है।
महाराष्ट्र और बिहार: राजनीतिक रसूख की नई रेस
परिसीमन का असर केवल दक्षिण या यूपी तक सीमित नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों की ताकत भी काफी बढ़ने वाली है।
महाराष्ट्र: वर्तमान में 48 लोकसभा सीटों वाले महाराष्ट्र की सीटें बढ़कर 80 से 90 के बीच हो सकती हैं। इससे दिल्ली की सत्ता में मराठा राजनीति का वजन और बढ़ जाएगा।
बिहार: 40 सीटों वाले बिहार को आबादी के हिसाब से भारी फायदा होगा और यहाँ सांसदों की संख्या 70 के पार जा सकती है।
दक्षिण के राज्यों का डर यही है कि अगर यूपी, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्य मिलकर 300 से अधिक सीटें जीत लेते हैं, तो केंद्र सरकार बनाने में दक्षिण भारत की कोई भूमिका ही नहीं रह जाएगी।
दक्षिण भारत का तर्क: "अच्छे काम की सजा मिल रही है"
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि 1970 के दशक में केंद्र ने 'परिवार नियोजन' का नारा दिया था, जिसे दक्षिण भारतीय राज्यों ने पूरी निष्ठा से लागू किया और अपनी आबादी को स्थिर किया।
अब यदि सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर होता है, तो अधिक आबादी वाले राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी। दक्षिण के राज्यों का कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रित करके देश का भला किया, लेकिन अब उन्हें संसद में उनकी 'राजनीतिक ताकत' कम करके सजा दी जा रही है।
संवैधानिक समाधान: क्या 'राज्यसभा' बन सकती है संतुलन का रास्ता?
इस विवाद को सुलझाने के लिए कुछ विशेषज्ञों ने 'अमेरिकी मॉडल' का सुझाव दिया है। प्रस्ताव है कि भले ही लोकसभा में आबादी के आधार पर सीटें बढ़ें, लेकिन राज्यसभा में सभी राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व दिया जाए। वर्तमान में राज्यसभा की सीटें भी आबादी पर आधारित हैं।
विपक्षी दलों की मांग है कि दक्षिण के राज्यों का राजनीतिक वजन बनाए रखने के लिए राज्यसभा की संरचना में बदलाव किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी केंद्र सरकार दक्षिण के हितों को नजरअंदाज न कर सके।
स्टालिन की चेतावनी: "1960 जैसा होगा आंदोलन"
डीएमके (DMK) प्रमुख एम.के. स्टालिन ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी है कि यदि दक्षिण के हितों की अनदेखी हुई, तो देश 1950 और 60 के दशक जैसा 'हिंदी विरोधी आंदोलन' फिर से देखेगा। उन्होंने तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी के साथ मिलकर एक 'साउथ यूनाइटेड फ्रंट' बनाने का आह्वान किया है। विपक्ष का आरोप है कि यह परिसीमन नहीं, बल्कि एक 'राजनीतिक री-स्ट्रक्चरिंग' है, जिससे उन राज्यों को लाभ होगा जहाँ जनसंख्या विस्फोट जारी है, जबकि प्रगतिशील राज्य हाशिए पर चले जाएंगे।
सरकार की सफाई: "नारी शक्ति के लिए एकजुट हों दल"
इस बढ़ते विवाद के बीच केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि परिसीमन का उद्देश्य किसी राज्य को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को लागू करना है। सरकार का तर्क है कि 1973 के बाद से लोकसभा सीटों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, जबकि आबादी कई गुना बढ़ चुकी है।
किरेन रिजिजू के अनुसार, जब कुल सीटें 850 होंगी, तो हर राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या आनुपातिक रूप से बढ़ेगी और इसका लाभ दक्षिण को भी मिलेगा।