SC ने साफ कर दिया है कि एआई द्वारा तैयार किए गए फर्जी या काल्पनिक फैसलों के आधार पर दिए गए आदेशों को केवल मानवीय भूल नहीं माना जाएगा, बल्कि यह 'न्यायिक दुराचार' कहलाएगा।

नई दिल्ली : भारतीय न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अदालत में एआई द्वारा तैयार किए गए फर्जी या काल्पनिक फैसलों का इस्तेमाल अब केवल 'निर्णय की गलती' या मानवीय भूल नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे सीधे तौर पर गंभीर 'न्यायिक दुराचार' की श्रेणी में रखा जाएगा।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है। अदालत ने साफ कर दिया है कि न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा से खिलवाड़ करने वालों को इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे और हर हाल में निर्णय केवल प्रामाणिक कानूनी नजीरों के आधार पर ही लिए जाने चाहिए।

​आंध्र प्रदेश के ट्रायल कोर्ट से सामने आया यह सनसनीखेज मामला

​सुप्रीम कोर्ट में यह पूरा विवाद तब पहुंचा जब आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई। दरअसल, आंध्र प्रदेश की एक निचली अदालत ने एक संपत्ति विवाद के मामले में एडवोकेट-कमिश्नर की रिपोर्ट पर आपत्तियों को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने पिछले साल अगस्त में दिए गए अपने आदेश में कुछ ऐसे पुराने फैसलों का हवाला दिया, जो असल में कभी अस्तित्व में ही नहीं थे।

जब याचिकाकर्ताओं ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी, तो यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि वे सभी फैसले एआई (AI) द्वारा तैयार किए गए पूरी तरह से फर्जी और मनगढ़ंत दस्तावेज थे। हाईकोर्ट ने हालांकि ट्रायल कोर्ट को चेतावनी दी, लेकिन मामले को मेरिट पर तय कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया की ईमानदारी और पवित्रता की जांच के लिए मोर्चा संभाल लिया है और ट्रायल कोर्ट को उस विवादित रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ने से फिलहाल रोक दिया है।

​न्याय प्रणाली की साख पर सवाल, श्याम दीवान बने एमिकस क्यूरी

​सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल किसी एक केस के फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी न्याय वितरण प्रणाली की साख पर सीधा प्रहार करता है।

अदालत ने चिंता जताई है कि जहां एआई का उपयोग आधिकारिक तौर पर स्वीकृत नहीं है, वहां भी इसका चलन तेजी से बढ़ रहा है, जो कानूनी प्रक्रिया की गरिमा को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। शीर्ष अदालत अब यह तय करेगी कि एआई निर्मित गैर-मौजूद फैसलों के उपयोग के क्या परिणाम होंगे और इसके लिए किसकी जवाबदेही तय की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च के लिए तय की गई है।

​वकीलों की मनमानी पर भी कोर्ट सख्त, 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' का दिया हवाला

​एआई का यह सिरदर्द सिर्फ निचली अदालतों के जजों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कई वकील भी याचिकाएं ड्राफ्ट करने के लिए इसका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे शीर्ष अदालत बेहद नाराज है। हाल ही में 17 फरवरी को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों द्वारा 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' जैसे पूरी तरह से फर्जी केसों का हवाला देने पर गहरी चिंता जताई थी।

राजनीतिक भाषणों पर दिशा-निर्देश मांगने वाली एक जनहित याचिका को ड्राफ्ट करने में भी वकीलों ने एआई का सहारा लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त हिदायत देते हुए कहा है कि यदि कोई न्यायाधीश या वकील जानबूझकर या लापरवाही से ऐसे कानूनी स्रोतों का इस्तेमाल करता है जो मौजूद ही नहीं हैं, तो उन्हें गंभीर कानूनी परिणामों का सामना करना ही होगा।