बड़ा सवाल: तुर्कमान गेट हिंसा के दौरान मौजूद सपा नेता मोहिबुल्लाह नदवी कौन है? जानिए पूरी कुंडली

नदवी ने वहां मौजूद लोगों से आह्वान किया कि वे प्रशासन की 'एकतरफा' कार्रवाई के आगे न झुकें।
नई दिल्ली : दिल्ली के ऐतिहासिक तुर्कमान गेट इलाके में अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई के दौरान भड़की पत्थरबाजी और तनाव ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में समाजवादी पार्टी के रामपुर सांसद मोहिबुल्लाह नदवी की मौके पर मौजूदगी ने देश भर का ध्यान खींचा है। भाजपा और सत्ता पक्ष का आरोप है कि नदवी जैसे जिम्मेदार जनप्रतिनिधि की वहां मौजूदगी ने भीड़ को उकसाने का काम किया।
दूसरी तरफ, राजधानी की सड़कों पर हुई इस हिंसा के बाद सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट्स तक मोहिबुल्लाह नदवी की भूमिका को लेकर बहस छिड़ गई है।
अब लोग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि एक शांत स्वभाव के धर्मगुरु के रूप में पहचाने जाने वाले नदवी अचानक विवादों के घेरे में कैसे आ गए।
शाही इमाम से संसद तक का सियासी सफर
मोहिबुल्लाह नदवी का दिल्ली से नाता बहुत पुराना और गहरा है। वे केवल एक सांसद नहीं हैं, बल्कि पिछले करीब 20 वर्षों से दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट स्थित जामा मस्जिद के शाही इमाम के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
यह मस्जिद लुटियंस दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक मानी जाती है, जहा राष्ट्रपति भवन और संसद भवन के पास होने के कारण बड़े-बड़े राजनेता, विदेशी राजनयिक और वीवीआईपी नमाज अदा करने पहुँचते हैं।
इमाम के तौर पर नदवी की छवि हमेशा एक संतुलित और विद्वान व्यक्ति की रही है, लेकिन 2024 के आम चुनावों ने उनके इस धार्मिक सफर को एक नई राजनीतिक दिशा दे दी, जब वे सीधे तौर पर सक्रिय राजनीति के अखाड़े में उतरे।
गांव की गलियों से दिल्ली के गलियारों तक
मोहिबुल्लाह नदवी का जन्म उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले की स्वार तहसील के रजा नगर गांव में हुआ था। उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि बेहद मजबूत है; उन्होंने लखनऊ के विश्वविख्यात 'नदवतुल उलेमा' से 'आलिम' और 'फाजिल' की उपाधि प्राप्त की, जिसके बाद ही उनके नाम के साथ 'नदवी' शब्द जुड़ा।
इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से आधुनिक शिक्षा भी ग्रहण की। नदवी केवल अरबी और उर्दू के ही नहीं, बल्कि अंग्रेजी और हिंदी के भी अच्छे जानकार माने जाते हैं।
दिल्ली आने के बाद उन्होंने एनडीएमसी के तहत आने वाली पार्लियामेंट स्ट्रीट मस्जिद की कमान संभाली। इमाम के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान उनके संबंध कांग्रेस, सपा और यहां तक कि भाजपा के भी कुछ उदारवादी नेताओं से रहे।
2024 में जब सपा ने उन्हें रामपुर से उतारा, तो यह उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। वर्तमान में वे न केवल सांसद हैं, बल्कि वक्फ संशोधन विधेयक के लिए बनी जेपीसी के सदस्य के तौर पर संसद में तकनीकी दलीलें पेश करने वाले प्रमुख मुस्लिम चेहरा बन चुके हैं।
विवादों से पुराना नाता: पारिवारिक कलह से लेकर 'जिहाद' के आह्वान तक
नदवी की पहचान जितनी शांत दिखती है, उनका विवादों से नाता उतना ही गहरा रहा है। उनके राजनीतिक और निजी जीवन में कई ऐसे मोड़ आए जिन्होंने उन्हें कटघरे में खड़ा किया।
पारिवारिक और कानूनी विवाद: नदवी के निजी जीवन में सबसे बड़ा विवाद तब आया जब उनकी पत्नी रुमाना ने उन पर गंभीर आरोप लगाए। रुमाना ने उन पर मारपीट, प्रताड़ना और दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज कराया था।
यह मामला कोर्ट तक पहुंचा और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नदवी को अपनी पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इस विवाद ने उनकी 'धार्मिक गुरु' वाली छवि पर सवाल खड़े किए थे।
'जिहाद' वाला विवादित बयान: हाल ही में संसद के भीतर वक्फ बिल पर चर्चा के दौरान नदवी ने 'जिहाद' शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने कहा था कि "अगर हमारे अधिकारों के साथ छेड़छाड़ हुई, तो मुसलमानों को हक के लिए जिहाद करना होगा।"
इस पर संसद में भारी शोर-शराबा हुआ और भाजपा ने उन पर सीधे तौर पर नफरत फैलाने और देश के मुसलमानों को उकसाने का आरोप लगाया।
नारियल फोड़ने से इनकार: रामपुर में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान जब उद्घाटन के लिए नारियल फोड़ने की रस्म की जा रही थी, तब नदवी ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया था।
उन्होंने इसे अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध बताया था, जिसे लेकर हिंदू संगठनों ने उनकी कड़ी आलोचना की थी और इसे 'कट्टरपंथी सोच' करार दिया था।
मस्जिद में अखिलेश-डिंपल की एंट्री और वो बड़ा विवाद
मोहिबुल्लाह नदवी के कार्यकाल का एक सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब उन्होंने दिल्ली की पार्लियामेंट स्ट्रीट मस्जिद में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव को आमंत्रित किया था। यह कार्यक्रम नदवी की इमामत के दौरान हुआ था।
विवाद तब गहरा गया जब डिंपल यादव मस्जिद के भीतर दाखिल हुईं। परंपरागत रूप से कई रूढ़िवादी मुस्लिम गुटों और कुछ धार्मिक संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई कि एक गैर-मुस्लिम महिला का मस्जिद के मुख्य परिसर में इस तरह प्रवेश करना उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है।
भाजपा ने भी इस पर तंज कसते हुए इसे 'सियासी नमाज' और तुष्टिकरण की राजनीति करार दिया था। मस्जिद के भीतर अखिलेश और डिंपल की मौजूदगी वाली तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी थी।
नदवी पर आरोप लगा कि उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए मस्जिद जैसे पवित्र स्थान को 'पॉलिटिकल अखाड़ा' बना दिया। इसी घटना के बाद यह माना जाने लगा था कि अखिलेश यादव ने उन्हें रामपुर के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लिया है।
आज़म खान के गढ़ में आपसी रार और वक्फ का मुद्दा
रामपुर में आज़म खान का कद इतना बड़ा था कि वहां किसी और का खड़ा होना नामुमकिन माना जाता था। लेकिन अखिलेश यादव ने नदवी को उतारकर आज़म के वर्चस्व को चुनौती दी। आज़म खान के समर्थकों ने नदवी को 'सरकारी इमाम' और 'अखिलेश का पिट्ठू' तक कह डाला था।
आज भी रामपुर की राजनीति दो फाड़ है एक तरफ आज़म के वफादार हैं और दूसरी तरफ नदवी का उभरता गुट। तुर्कमान गेट हिंसा के बाद अब आज़म समर्थक भी दबी जुबान में नदवी की सक्रियता पर सवाल उठा रहे हैं, जिससे सपा के भीतर की गुटबाजी और गहरी हो गई है।
हिंसा में भूमिका पर जांच की आंच
तुर्कमान गेट की घटना में अब दिल्ली पुलिस के हाथ कुछ ऐसे इनपुट्स लगे हैं जो नदवी की मुश्किल बढ़ा सकते हैं। भाजपा का स्पष्ट आरोप है कि सांसद को भीड़ को कानून हाथ में लेने से रोकना चाहिए था, न कि वहां खड़े होकर मूकदर्शक बनना चाहिए था। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या नदवी की मौजूदगी पूर्व नियोजित थी या वे वाकई शांति की अपील करने गए थे।
