बजट 2026: मेडिकल डिवाइस सेक्टर में 70% आयात का दबदबा; स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की उठी मांग

मेडिकल डिवाइस सेक्टर में 70% आयात का दबदबा; स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की उठी मांग
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मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री ने बजट 2026 में आयात शुल्क बढ़ाने की मांग की है, क्योंकि वर्तमान में 70% उपकरण विदेशों से आते हैं।

सरकार से 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' को ठीक करने और स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने का आग्रह किया गया है, ताकि भारत सस्ती चिकित्सा तकनीक का वैश्विक केंद्र बन सके।

नई दिल्ली: भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते चिकित्सा उपकरण बाजारों में से एक है, लेकिन विडंबना यह है कि इस क्षेत्र की 70 से 80 प्रतिशत जरूरतें आज भी विदेशों से आयात के जरिए पूरी होती हैं।

आगामी केंद्रीय बजट 2026 में, घरेलू चिकित्सा उपकरण निर्माताओं ने सरकार से 'मेक इन इंडिया' को मजबूत करने के लिए आयात शुल्क बढ़ाने और विशेष रियायतों की मांग की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने सही नीतिगत प्रोत्साहन दिया, तो भारत किफायती चिकित्सा तकनीक में वैश्विक लीडर बन सकता है।

​आयात पर भारी निर्भरता और व्यापार घाटे की चुनौती

​भारत वर्तमान में एमआरआई मशीन, सीटी स्कैनर और अन्य उच्च तकनीक वाले उपकरणों के लिए चीन, अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों पर निर्भर है। आंकड़ों के अनुसार, देश की 70% से अधिक स्वास्थ्य तकनीक आयातित है।

मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री का तर्क है कि जब तक विदेशी उपकरणों पर आयात शुल्क नहीं बढ़ाया जाएगा, तब तक घरेलू निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल होगा।

उद्योग जगत चाहता है कि बुनियादी उपकरणों पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी को तर्कसंगत बनाया जाए ताकि स्थानीय उत्पादन को लाभ मिल सके।

​इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी और 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' का समाधान

​चिकित्सा उपकरण संगठनों ने मांग की है कि तैयार उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाया जाए, जबकि कच्चे माल पर इसे कम किया जाए।

वर्तमान में 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' की समस्या है, जहां कच्चे माल पर टैक्स ज्यादा और तैयार माल पर कम है।

इससे भारत में उपकरण बनाना महंगा पड़ता है और आयात करना सस्ता। बजट 2026 से उम्मीद है कि सरकार इस विसंगति को दूर करेगी, जिससे 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को गति मिलेगी।

​सस्ती चिकित्सा तकनीक: भारत बन सकता है ग्लोबल हब

​विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में दुनिया के लिए 'किफायती चिकित्सा तकनीक' विकसित करने की अपार क्षमता है। यदि सरकार रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के लिए टैक्स में छूट और सब्सिडी प्रदान करती है, तो भारतीय कंपनियां न केवल घरेलू मांग को पूरा करेंगी, बल्कि अन्य विकासशील देशों को सस्ते उपकरणों का निर्यात भी कर सकेंगी।

इससे स्वास्थ्य सेवाओं की लागत कम होगी और आम आदमी के लिए इलाज सस्ता हो जाएगा।

​पीएलआई (PLI) स्कीम का विस्तार और क्लस्टर विकास

​मेडिकल डिवाइस सेक्टर के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना के दूसरे चरण की मांग जोर पकड़ रही है। उद्योग चाहता है कि सरकार मेडिकल डिवाइस पार्कों और विशेष क्लस्टरों के निर्माण के लिए अतिरिक्त फंड आवंटित करे।

इन पार्कों में साझा परीक्षण केंद्र होने से छोटे और मध्यम उद्योगों की लागत में कमी आएगी और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।

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