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53 साल में सिर्फ दो बार त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी बरोदा विधानसभा सीट

भाजपा से योगेश्वर दत्त, कांग्रेस से इंदूराज नरवाल के मुकाबले के बीच कपूर सिंह नरवाल ने आजाद प्रत्याशी के तौर पर ताल ठोंक दी है। इसी वजह से एक दिन पहले तक सिर्फ कांग्रेस-भाजपा के बीच नजर आ रहा चुनाव अब त्रिकोणीय बनता नजर आ रहा है।

53 साल में सिर्फ दो बार त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी बरोदा विधानसभा सीट
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दीपक वर्मा : सोनीपत

तीन जिलों की सीमा को छूता, लेकिन विकास से अछूता।

59 गांवों का रकबा, नहीं है एक भी शहर या कस्बा।।

बरोदा विधानसभा की कहानी इन्हीं दो लाइनों में सिमटी जा सकती है। जाटलैंड का सबसे महत्वपूर्ण किला बरोदा हमेशा से ही राजनीतिक गलियारों में चर्चित रहा है। 1967 में जब पहली बार चुनाव हुए थे, उसके बाद से लेकर अब 2020 तक 53 सालों में बरोदा की जनता ने 12 बार स्पष्ट जनादेश दिया है।

सिर्फ दो बार ऐसा हुआ है कि मुकाबला त्रिकोणीय रहा है, वरना तो हर बार बरोदा के लोग सिर्फ दो प्रत्याशियों या दलों के बीच ही चुनाव करते आए हैं। जिन दो बार मुकाबला त्रिकोणीय रहा, वो साल 1977 और 2019 के विधानसभा चुनाव रहे हैं। जहां पर बहुत ही कम अंतर से जीत और हार का फैसला हुआ है। 1977 में जहां जीत का अंतर 4,319 था, वहीं 2019 में सिर्फ 4,840 मतों ने हार-जीत का अंतर तय किया था। इन्हीं दो चुनावों में तीन-तीन प्रत्याशियों पर जमकर वोट बरसें। जबकि अन्य सभी चुनावों में केवल दो प्रत्याशियों के बीच ही चुनाव लड़ा गया। मजे की बात ये है कि अब उप-चुनावों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनती दिखाई दे रही है।

शुक्रवार को नामांकन के आखिरी दिन भाजपा से योगेश्वर दत्त, कांग्रेस से इंदूराज नरवाल के मुकाबले के बीच कपूर सिंह नरवाल ने आजाद प्रत्याशी के तौर पर ताल ठोंक दी है। इसी वजह से एक दिन पहले तक सिर्फ कांग्रेस-भाजपा के बीच नजर आ रहा चुनाव अब त्रिकोणीय बनता नजर आ रहा है।

क्या हुआ था 1977 में

वर्ष 1977 के विधानसभा चुनावों के दौरान आजाद प्रत्याशी दरया सिंह, विहीप के रामधारी और जेएनपी के भलेराम के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था। उस समय बरोदा विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित था। इसी वजह से तीनों ही प्रत्याशी जातिगत आधार पर लगभग एक समान थे। इन चुनावों में बरोदा की जनता ने 10,672 वोट आजाद प्रत्याशी दरया सिंह को, 10,386 वोट विहीप प्रत्याशी रामधारी को और 14,705 वोट जेएनपी के भलेराम को दिए थे। इस तरह से इन चुनावों में 4 हजार 319 मतों से भलेराम ने जीत दर्ज की थी। भले ही भलेराम ने उस समय जीत दर्ज की थी, लेकिन चुनाव लड़ने में तीनों ही प्रत्याशियों के पसीने छूटे थे।

2019 ने दोहराई थी 1977 की कहानी

1977 की ही तरह 2019 में भी बरोदा की जनता के लिये विधायक चुनना आसान नहीं था। कांग्रेस प्रत्याशी श्रीकृष्ण हुड्डा केवल 4,840 मतों से जीते थे। श्रीकृष्ण हुड्डा को 42,566 मत मिले थे। दूसरे नंबर पर भाजपा के योगेश्वर दत्त ने 37,726 मत प्राप्त किए थे। तीसरे स्थान पर जजपा के भूपेंद्र मलिक ने 32,480 वोट प्राप्त किए थे। इस तरह से यह मुकाबला भी त्रिकोणीय रहा था। खास बात ये है कि 1977 में जहां इनेलो वजूद में नहीं थी, वहीं 2019 तक इनेलो का वजूद का बंटवारा हो गया था। 2019 के विधानसभा चुनावों में श्रीकृष्ण हुड्डा लगातार तीसरी बार जीतने वाले विधायक बने थे।

बरोदा विधानसभा क्षेत्र का ये रहा है इतिहास

वर्ष विधायक पार्टी

1967 रामधारी कांग्रेस

1968 श्यामचंद वीएचपी

1972 श्यामचंद कांग्रेस

1977 भलेराम जेएनपी

1982 भलेराम एलकेडी

1987 कृपाराम एलकेडी

1991 रमेश कुमार जेपी

1996 रमेश कुमार एसएपी

2000 रमेश खटक इनेलो

2005 रामफल इनेलो

2009 श्रीकृष्ण हुड्डा कांग्रेस

2014 श्रीकृष्ण हुड्डा कांग्रेस

2019 श्रीकृष्ण हुड्डा कांग्रेस

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