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वृद्धावस्था में शारीरिक-मानसिक कमजोरी आने ही लगती है। ऐसे में जीवनसाथी भी बिछड़ जाए तो सफर और कठिन हो जाता है। अगर आपके पिता को भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है तो आपको आगे बढ़कर उन्हें अकेलेपन से उबारने, उनका भावनात्मक संबल बनने का हर संभव प्रयास करना चाहिए, ताकि जीवन की संध्या उन्हें एकाकीपन में ना गुजारनी पड़े।    

Fathers Day: जब तक बच्चे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते, स्वावलंबी नहीं बन जाते, पिता उनको अपनी छत्रछाया में रखते हैं। वे अपने जीवन का सबसे कीमती समय, बच्चों की बेहतर परवरिश और उनकी जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर उठाने में बिता देते हैं। अपने बच्चों को किसी मुसीबत के समय अकेले नहीं छोड़ते, हर स्थिति में उनका साथ निभाते हैं, उनका संबल बनते हैं। लेकिन कई बार दुर्भाग्यवश ऐसी स्थितियां सामने आती हैं, जब जीवन की सांध्य बेला में पिता को एकाकी जीने के लिए विवश होना पड़ता है। 

ऐसा अक्सर तब होता है, जब उनके जीवन यात्रा में साथ चलने वाली उनकी हमसफर उनका साथ छोड़ जाती हैं। बच्चे अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं। बेटियां ब्याह कर अपने जीवनसाथी के घर चली जाती हैं। तब एक खालीपन पिता को चारों ओर से घेर लेता है। आजीविका कमाने के लिए जीवन भर व्यस्त रहने वाले पिता अचानक से इतने खाली हो जाते हैं कि एकाकीपन और अवसाद की भावना से भर उठते हैं। तब जीवन जीने के लिए उन्हें कोई सहारा नहीं दिखता। खालीपन के अंधेरे में कोई रोशनी उन्हें नजर नहीं आती। वे अलग-थलग अकेले रह जाते हैं। खुद को लाचार ही नहीं निरर्थक समझने लगते हैं। 

निभाएं संतान का दायित्व
अगर आपके पिता भी अकेलेपन की कुछ इसी तरह की स्थितियों का सामना कर रहे हैं, आप उनकी अकेली संतान हैं या आपके भाई-भाभी अपनी नौकरी की वजह से पिता के साथ नहीं रह पा रहे हैं तो आपको उनकी देख-भाल के लिए आगे कदम बढ़ाना होगा। ऐसे में ना केवल पिता के स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखें, उनको भावनात्मक सहारा भी दें। जिस तरह बचपन में आपके निराश होने पर पिता आपको हौसला देते थे, कभी उदास या मायूस नहीं होने देते थे, अब उनको ऐसा अहसास दिलाने की बारी आपकी है। यकीन मानिए, अकेलेपन का सामना कर रहे पापा जब अपनी परी का स्नेह भरा संबल पाएंगे तो उनमें एक नई ऊर्जा का संचार होगा। उनके भीतर से एकाकीपन के बादल छंट जाएंगे। नई उमंग के साथ वे जीना सीख जाएंगे। 

समझें उनकी भावनाएं
यह सच है कि बुढ़ापे में कुछ ना कमाने या कर पाने का बोध, पिता को अपनी नजरों में खुद की कीमत कम कर देता है। ऐसे में अगर आप उनकी भावनाओं को नहीं समझेंगी तो उनकी मदद पूरी तरह नहीं कर पाएंगी। यह मान लेना कि अब पापा घूमना-फिरना नहीं चाहते होंगे, बस आस-पास के पार्क तक टहलना ही उनके लिए काफी है, दो वक्त के खाने और दवा के अलावा उनकी कोई जरूरत नहीं, ऐसी सोच गलत है। सिर्फ टाइम से खाना और दवा देना ही उनकी केयर में शामिल नहीं होता, जब संभव हो उनके साथ कुछ वक्त बिताकर, उनसे बातें कर, उनकी भावनाओं को समझकर, उनकी इच्छाओं को पूरा कर आप उन्हें भरपूर खुशी दे सकती हैं।   

पापा को दें हर संभव खुशी
जीवन के सफर में अकेले पड़ गए पिता खुशी-खुशी अपने जीवन की सांझ गुजारें, इसके लिए उनमें जीने का उल्लास आपको ही भरना चाहिए। इसके लिए आप अपनी खुशियों में उन्हें शामिल करना कभी ना भूलें। घर-बाहर से जुड़े हर छोटे-बड़े मामलों में उनसे उनकी राय जरूर जानें। खाने-पीने में उनकी पसंद पूछें। उनके जन्मदिन पर याद से उनकी पसंद का कोई तोहफा जरूर भेंट करें। बाहर घूमने जाएं तो पिता की सुविधा के स्थान का चुनाव करें। उनकी रोजमर्रा की छोटी-मोटी जरूरतों का ख्याल रखें। उनके अनुभवों का लाभ उठाएं। उनकी उपेक्षा न करें। घर के हल्के-फुल्के काम सुविधानुसार पापा से करवा सकती हैं, जिससे वे खुद को उपेक्षित न महसूस करें। इससे उनका समय भी अच्छा बीतेगा और घर चलाने में सहयोग करने की भावना भी उनमें आएगी। उनको अहसास दिलाएं कि वे परिवार का सबसे अहम हिस्सा हैं। इससे उन्हें बहुत खुशी मिलेगी।

सरस्वती रमेश 

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