ट्रैवल डायरी- अंतिम| Tanzania: तंजानिया के लोग...तन से काले, मन से सुनहरे

तंजानिया यात्रा के अंतिम भाग में डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने वहां के लोगों, संस्कृति और नेशनल पार्क के अनुभव साझा किए।
तंजानिया यात्रा वृत्तांत-अंतिम | डॉ. हिमांशु द्विवेदी (प्रधान संपादक, हरिभूमि ग्रुप)
मानव जाति के इतिहास में एक कलंकित अध्याय दास प्रथा का भी है। विशेषकर अफ्रीकी देशों के नागरिकों के साथ जो कुछ अरब और यूरोपियन व्यापारियों ने अतीत में किया है, उसकी कहानियां पढ़कर तो रोंगटे ही खड़े हो जाते हैं। इस महाद्वीप के तमाम देशों से 15वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी के बीच तकरीबन तीन करोड़ महिलाओं और पुरुषों को उनकी इच्छा के विपरीत गुलाम बनाकर अन्यत्र स्थानों पर ले जाया गया था। बचपन में जब कभी इतिहास की किताबों में दास व्यपार और गुलाम प्रथा के अध्याय पड़ता था तो यह अचरज होता था कि अफ्रीका के लोग शारीरिक रूप से इतने मजबूत या ह्ट्टे-कट्टे होकर भी गुलामी का जीवन जीने कैसे तैयार हो जाते थे। इस जिज्ञासा का समाधान इस तंजानिया प्रवास के दौरान हो गया है।
दरअसल अफ्रीका के इन काजल से भी अधिक काले और इस्पात की तरह मजबूत मांसपेशियों के शरीर के अंदर मासूम मन और सुनहरा दिल निवास करता है। अ ब्लैक मैन विद गोल्डन आर्ट की कहावत शायद इन लोगों को देखकर ही गढ़ी गई थी। अभी तक जितना समय तंजानिया में बिताया है, उसमें यहां के लोगों की सरलता, विनम्रता, गंभीरता देखकर अचंभित हूं। व्यक्ति के संबंध में राय उसकी त्वचा का रंग देखकर नहीं, व्यवहार देखकर बनाना चाहिए। बुजुर्गों की यह समझाइश अब जाकर समझ आई है। हम भारतीयों का गोरी त्वचा को लेकर अलग ही आकर्षण रहता आया है श्याम अर्थात काले रंग के प्रति आकर्षण केवल कृष्ण भक्ति से ओतप्रोत भजनों तक ही सीमित रहा है।
गोरों की रिहाईश मुख्यतौर पर यूरोप और अमेरिका में है। वहां की यात्रा के दौरान आपको अधिकांश मौकों पर स्थानीय निवासियों के व्यवहार में शुष्कता और रुखापन महसूस होगा। यह रुखापन ही वह वजह है कि यूरोप की यात्रा के दौरान भी हम भारतीयों की पहली पसंद यूरोपियन एयरलाइंस की जगह एमिरेट्स, कार्यालय एतिहाद एयरलाइंस रहती है।
ईमानदारी की मिसाल: भूली हुई सोने की चेन की वापस
पूर्वी अफ्रीका के देश तंजानिया में अनुभव इससे पूरी तरह जुदा हैं। एयर तंजानिया के विमान की परिचालिका से लेकर होटल और कैंप के स्टाफ तक हर मौके पर लोग चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान के साथ मदद को आतुर दिखते हैं। टिप ना मिलने पर भी उनके चेहरे से मुस्कुराहट ओझल नहीं होती है। इनके स्वभाव में ईमानदारी और जिम्मेदारी का प्रत्यक्ष अनुभव तब हुआ जब म्वांजा के होटल से तकरीबन सौ किलोमीटर दूर आ जाने के बाद वाहन चालक हमीद के पास फोन आया कि अपनी गले की सोने की चेन मैं कमरे में ही छोड़ आया हूं। होटल स्टाफ, सफारी कंपनी और हमीद ने साझा प्रयास कर तीन दिन के भीतर सात 100 किलोमीटर दूर मनियारा में वह चेन मेरे हवाले कर दी। इसके एवज में उन्होंने कोई शुल्क भी नहीं लिया। यूरोप या अमेरिका में तो आप ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते।
शाकाहारी यात्रियों के लिए सुखद आश्चर्य
विदेश यात्रा के दौरान शाकाहारी होना खासा परेशानी भरा रहता है। विकल्प बहुत सीमित होते हैं और अगर आपकी बुकिंग फुल बोर्ड के रूप में है तो जो बुफे में परोसा गया है उसी से आपको काम चलाना होता है। यहां इस मामले में भी हालात पूरी तरह जुदा रहे। हर जगह होटल के शेफ ने आकर पसंद ना केवल जानना ही चाही बल्कि उसको पूरा करने की ईमानदार कोशिशें भी की। वेटर भी उसमें पूरी तरह से भागीदार रहते रहे। वाकई यह सेवा भाव अचंभित करने वाला था।
मासूमियत का सदियों तक हुआ शोषण
इनकी इस मासूमियत और व्यवाहारिक कोमलता का सदियों तक गलत फायदा उठाया गया। इसे रंगभेदी मानसिकता ना समझा जाए। यह कटु सत्य है कि गोरे तन में काला मन लिए हुए कुटिल लोगों ने अपनी शातिरता और अत्याधुनिक हथियारों के बूते सदियों तक इन पशुपालकों को ही अपना पालतू बनाए रखा। नये साल के मौके पर कुछ नया और सकारात्मक साझा करने के उद्देश्य से अपने मनोभाव को आपसे साझा किया।




गोरंगोरो नेशनल पार्क: प्रकृति का अद्भुत चमत्कार
अब बात एक बार फिर यात्रा पर केंद्रित करते हैं। सेरेंगेट्टी नेशनल पार्क के बाद अब हमारा मुकाम गोरंगोरो नेशनल पार्क है। लाखों साल पहले ज्वालामुखी फूटने के चलते एक विशाल गहरा गड्ढा बना जो जैव विविधता के चलते अब विश्व धरोहर भी है। बिग फाइव प्राणियों में गेंडे की तलाश यहां आकर ही पूरी होती है। सेरेंगेट्टी से यहां तक का सफर आसान नहीं रहता। डामर विहीन पत्थरों से भरी सड़क पर चार से पांच घंटे बिताने के बाद ही आप यहां पहुंच पाते हैं। तन डोले कि मन डोले का मुकम्मल अहसास इस दौरान होता रहता है। तकरीबन 206 किलोमीटर व्यास के इस क्रेटर के गहरे इलाके में उतरने और ऊपर आने के रास्ते अलग अलग हैं। जमीन की प्रकृति ऐसी है यहां पेड़ बमुश्किल ही देखने को मिलते हैं।
हर ओर घास के मैदान हैं। अच्छी लंबी चौड़ी झील भी है जहां सफेद - गुलाबी रंग के हजारों फ्लेमिंगों पक्षियों की मौजूदगी रोमांचित कर देती है। बड़ी संख्या में विशालकाय शरीर के हिप्पोपोटामस अर्थात दरियाई घोड़े भी दिखाई दे जायेंगे। कटार जैसे बड़े और धारदार दांतो को जब वह अपना मुंह फाड़कर दिखाते हैं तो शरीर में झुरझुरी दौड़ जाती है। शेर, जंगली सूअर, हाथी , जिराफ जैसे जानवर भी पर्याप्त हैं। एक स्थान पर हाथियों के बीच मुकाबले का वीडियो बनाने का मौका भी हमें मिला।
हाथियों की मतवाली चाल को देखना भी अलग ही अनुभव होता है। आपकी जेब में पैसे जरूरत से ज्यादा हों और समय भी इफरात हो तो नजदीक में मनियारा नेशनल पार्क और तरंगिरी नेशनल पार्क भी मौजूद हैं। लेकिन कुल मिलाकर अब इतना कुछ देख लिया है कि अब कुछ और देखने की तुरंत तो चाह नहीं रही। इसलिए अब समय है वापसी का। इस वादे के साथ कि जल्द ही फिर किसी नये स्थान की सैर आप पाठकों को जरूर करायेंगे।
सलाह
आप जितने भी समझदार हों लेकिन यात्रा के अनुभव के आधार पर आपको यह सलाह है कि सफारी के लिहाज से पहले से सब कुछ बुक करके घर से निकलना ही बेहतर है। अच्छी साख वाले किसी ट्रैवल एजेंट के माध्यम से वह टूर पैकेज बनवाना ही बेहतर है जिसमें विदेशी धरती पर उतरने से लेकर वापसी के लिए विमान में चढ़ने तक की हर चीज शामिल हो। ऐसा ना करने पर यात्रा आपके लिए दुखद अनुभव भी साबित हो सकती है।
तंजानिया से रायपुर का रिश्ता
तंजानिया के साथ रायपुर का भी भावनात्मक रिश्ता है। नया रायपुर में छोटे बच्चों की ह्रदय संबंधित बीमारियों के इलाज के लिए स्थापित सत्यसांई ह्रदय संस्थान इस रिश्ते की वजह है। अभी तक तंजानिया से सात बच्चे उपचार के लिए यहां आ चुके हैं और प्रसन्नता की बात यह है कि उनमें से छह बच्चे निशुल्क इलाज सुविधा का लाभ उठ कर पूरी तरह से ठीक भी हो चुके हैं।
नववर्ष आपको मंगलमय हो।
