Stock Market: शेयर बाजार में कंपनियों को मार्केट कैप के आधार पर स्मॉल, मिड और लार्ज कैप में बांटा जाता है। ब्लू-चिप कंपनियां मजबूत, भरोसेमंद और आमतौर पर लार्ज-कैप होती हैं। इन कैटेगरी को समझना निवेश की सही रणनीति बनाने में मदद करता है।

Stock Market: शेयर बाजार की खबरें पढ़ते या सुनते वक्त अक्सर लार्ज-कैप, मिड-कैप, स्मॉल-कैप या 'ब्लू-चिप' जैसे शब्द सुनाई देते हैं। कई लोगों को लगता है कि ये कोई मुश्किल फाइनेंस की भाषा है, लेकिन असल में मामला सीधा है। इन शब्दों का इस्तेमाल कंपनियों के आकार, स्थिरता और ग्रोथ की संभावनाओं को समझाने के लिए किया जाता है। एक तरह से यह निवेशकों के लिए कंपनियों को जल्दी पहचानने का तरीका है।

सबसे पहले समझिए कैप क्या होता है? 
शेयर बाजार में 'कैप' का मतलब होता है मार्केट कैपिटलाइजेशन। यानी किसी कंपनी की कुल बाजार कीमत। इसे निकालने का फार्मूला भी बहुत आसान है। मार्केट कैप= शेयर की कीमत * कुल शेयर। मान लीजिए किसी कंपनी के 10000 शेयर बाजार में हैं और हर शेयर की कीमत 10 रुपये है। दोनों को गुणा करेंगे तो कंपनी की कुल वैल्यू 1 लाख रुपये हो जाएगी। यही उसका मार्केट कैप कहलाता है।

यहां आउटस्टैंडिंग शेयर का मतलब उन शेयरों से है जो निवेशकों के पास हैं, न कि वे शेयर जो कंपनी खुद के पास रखती है। इसलिए जब निवेशक किसी कंपनी के 'कैप' की बात करते हैं, तो वे असल में यह बता रहे होते हैं कि बाजार उस कंपनी को कितना बड़ा मानता है।

कैसे तय होता है कि कंपनी स्मॉल, मिड या लार्ज कैप? 
कंपनियां उनके मार्केट कैप के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में रखी जाती हैं। इससे निवेशकों को जोखिम, स्थिरता और ग्रोथ का अंदाजा लगाने में मदद मिलती है।

लार्ज कैप कंपनियां कौन होती? 
मार्केट वैल्यू के हिसाब से टॉप 100 कंपनियां इस कैटेगरी में आती हैं। आमतौर पर ये अपने सेक्टर की बड़ी और स्थापित कंपनियां होती हैं। इनका बिजनेस मजबूत होता है और निवेशकों को इनमें अपेक्षाकृत स्थिरता दिखाई देती है, हालांकि शेयर बाजार में जोखिम पूरी तरह कभी खत्म नहीं होता।

मिड कैप कंपनियों का लेखा-जोखा
रैंकिंग में लगभग 101 से 250 के बीच आने वाली कंपनियां मिड-कैप मानी जाती हैं। ये कंपनियां शुरुआती दौर से आगे निकल चुकी होती हैं लेकिन अभी भी तेजी से बढ़ने की गुंजाइश रहती है। इसलिए कई निवेशक इन्हें ग्रोथ और स्थिरता के संतुलन के रूप में देखते हैं।

स्मॉल कैप कंपनियों का हिसाब-किताब
इसके नीचे आने वाली कंपनियां स्मॉल-कैप कहलाती हैं। अक्सर ये नई या तेजी से उभरती कंपनियां होती हैं। इनमें ग्रोथ की संभावना ज्यादा हो सकती है लेकिन उतार-चढ़ाव भी उतना ही तेज होता है। इसलिए इनमें निवेश करने वाले निवेशक आमतौर पर ज्यादा जोखिम लेने के लिए तैयार रहते हैं।

अगर आसान भाषा में कहें तो जैसे-जैसे आप स्मॉल-कैप से लार्ज-कैप की तरफ जाते हैं, स्थिरता बढ़ती जाती है। वहीं दूसरी ओर ग्रोथ की संभावना और जोखिम स्मॉल-कैप में ज्यादा दिखाई देता है।

ब्लू-चिप्स स्टॉक्स कहां आते हैं
ब्लू-चिप कोई अलग साइज की कैटेगरी नहीं है, बल्कि यह एक तरह की पहचान है। ब्लू-चिप स्टॉक आमतौर पर ऐसी बड़ी, मजबूत और भरोसेमंद कंपनियों के शेयर होते हैं जिनका प्रदर्शन लंबे समय से अच्छा रहा हो। यह शब्द पोकर गेम से आया है, जहां नीले चिप्स सबसे ज्यादा कीमत के होते हैं।

हर ब्लू-चिप कंपनी लार्ज-कैप होती है लेकिन हर लार्ज-कैप कंपनी ब्लू-चिप नहीं होती। ब्लू-चिप कंपनियों का बिजनेस मजबूत होता है, कमाई स्थिर रहती है और वे बाजार के उतार-चढ़ाव में भी टिके रहने की क्षमता रखती हैं। इसलिए कई निवेशक इन्हें अपने पोर्टफोलियो की मजबूत नींव मानते हैं।

निवेशकों के लिए यह क्यों जरूरी है
इन कैटेगरी को समझना सिर्फ जानकारी भर नहीं है, बल्कि निवेश की रणनीति तय करने में मदद करता है। लार्ज-कैप अपेक्षाकृत स्थिरता दे सकते हैं।  मिड-कैप ग्रोथ और रिस्क का संतुलन दे सकते हैं। स्मॉल-कैप तेज ग्रोथ के साथ ज्यादा उतार-चढ़ाव ला सकते हैं

इसलिए कई निवेशक अपने पोर्टफोलियो में अलग-अलग कैटेगरी के शेयर शामिल करते हैं। इससे जोखिम भी संतुलित रहता है और ग्रोथ की संभावना भी बनी रहती है। सीधी बात यह है कि स्मॉल-कैप, मिड-कैप, लार्ज-कैप और ब्लू-चिप जैसे शब्द निवेश की दुनिया को समझने का आसान तरीका हैं। ये रिटर्न की गारंटी नहीं देते, लेकिन यह जरूर बताते हैं कि आप किस तरह की कंपनी में पैसा लगा रहे हैं।

(प्रियंका कुमारी)