India US Trade Deal: 18% टैरिफ के साथ भारत को बड़ी बढ़त, चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश से आगे निकला 'मेड इन इंडिया'

India-US Trade Deal के बाद अमेरिकी टैरिफ घटकर 18% हुआ।
India US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापारिक तनातनी अब साझेदारी में बदलती दिख रही है। 2 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए ट्रेड समझौते ने भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर नई ताकत दी है।
50% से सीधे 18% पर आया अमेरिकी टैरिफ
इस समझौते से पहले भारतीय उत्पादों पर अमेरिका में कुल 50% तक टैरिफ लगाया जा रहा था। इसमें रेसिप्रोकल टैरिफ और अतिरिक्त पेनल्टी शामिल थी। नई डील के बाद भारत पर प्रभावी अमेरिकी टैरिफ घटकर सिर्फ 18% रह गया है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत है।
रूस से तेल खरीद बना था विवाद की वजह
अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत पर कड़ा रुख अपनाया था। वजह थी यूक्रेन युद्ध के बीच भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदना। इसी कारण भारतीय सामान पर भारी टैरिफ लगाया गया था। अब भारत ने ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका समेत अन्य विकल्पों की ओर रुख करने का संकेत दिया है।
एशिया के कई देशों से आगे निकला भारत
नए टैरिफ स्ट्रक्चर में भारत ने अपने कई क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया है।
- पाकिस्तान, मलेशिया और थाईलैंड पर 19%
- वियतनाम और बांग्लादेश पर 20%
- चीन पर अब भी 37% तक टैरिफ लागू है
इस तुलना में भारत का 18% टैरिफ उसे अमेरिकी बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाता है।
'मेड इन इंडिया' को मिला बड़ा ग्लोबल बूस्ट
टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग और कंज्यूमर गुड्स जैसे सेक्टर्स के लिए यह डील किसी लाइफलाइन से कम नहीं है। अमेरिकी खरीदारों के लिए भारतीय उत्पाद अब चीन और दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में ज्यादा किफायती हो गए हैं।
स्टार्टअप और ब्रांड्स के लिए सुनहरा मौका
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह डील भारतीय ब्रांड्स को सिर्फ एक्सपोर्टर नहीं, बल्कि ग्लोबल ब्रांड बनने का मौका देती है। डिजाइन, क्वालिटी और इनोवेशन के दम पर भारत अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत पहचान बना सकता है।
बाजार ने भी दिया भरोसे का संकेत
ट्रेड डील की घोषणा के बाद भारतीय रुपये में मजबूती देखने को मिली और निर्यात से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में जोरदार उछाल आया। शेयर बाजार की प्रतिक्रिया ने इस समझौते को निवेशकों के लिए भी सकारात्मक करार दिया है।
आगे की राह आसान नहीं, लेकिन मजबूत
हालांकि यह समझौता ऐतिहासिक है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। भारत को अपनी ऊर्जा नीति में बदलाव करना होगा, जबकि अमेरिका की कंपनियां भारतीय बाजार में नए अवसर तलाशेंगी। दोनों देशों के लिए यह डील 'विन-विन' मानी जा रही है।
