GST राहत का असर: हेल्थ इंश्योरेंस में बड़ा बदलाव, औसत कवरेज 30% से ज्यादा बढ़ा

हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर जीएसटी हटने का व्यापक असर हुआ है।
GST Impact on Health Policy: भारत में हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर लोगों की सोच अब साफ तौर पर बदलती दिख रही। सालों तक कम कवरेज और सिर्फ नाम के लिए ली जाने वाली पॉलिसियों के बाद अब लोग ज्यादा बड़ी, लंबी अवधि वाली और बेहतर सुरक्षा देने वाली हेल्थ इंश्योरेंस योजनाएं खरीद रहे। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह बनी है-हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर जीएसटी हटाया जाना।
पॉलिसीबाजार के 2025 के अंत तक के आंकड़ों के मुताबिक, जीएसटी हटने के बाद औसत हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज में 31 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। पहले जहां औसत कवरेज करीब 14.5 लाख रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 19 लाख रुपये तक पहुंच गया। हाल के वर्षों में यह सुरक्षा स्तरों में देखी गई सबसे तेज बढ़ोतरी मानी जा रही।
सबसे बड़ा बदलाव कम कवरेज वाली पॉलिसियों से दूरी के रूप में सामने आया। 10 लाख रुपये से कम सम इंश्योर्ड वाली पॉलिसियों की हिस्सेदारी जीएसटी राहत के तुरंत बाद 24 फीसदी घट गई, और साल-दर-साल आधार पर इसमें 29 फीसदी की गिरावट आई है। साफ है कि महंगे इलाज और बढ़ती मेडिकल महंगाई के दौर में लोग अब कम कवरेज को नाकाफी मानने लगे।
इसके उलट, मिड और हाई कवरेज वाली पॉलिसियों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला। 10 से 25 लाख रुपये की पॉलिसियों में GST हटने के बाद 47 फीसदी की बढ़ोतरी हुई जबकि 25 लाख रुपये और उससे ऊपर के कवरेज में 85% तक की छलांग लगी। सालाना आधार पर भी यह रुझान मजबूत है- 10–25 लाख वाली पॉलिसियां 55.6% और 25 लाख से ऊपर वाली योजनाएं 49.3% बढ़ी हैं।
एक और अहम ट्रेंड है मल्टी-ईयर पॉलिसियों की बढ़ती मांग। लोग अब एक साल की जगह लंबी अवधि की पॉलिसियां चुन रहे हैं, ताकि भविष्य में प्रीमियम बढ़ने से बच सकें और हर साल रिन्यूअल की झंझट न रहे। चार साल की पॉलिसियों में 56 फीसदी और पांच साल की पॉलिसियों में 62% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सबसे चौंकाने वाला बदलाव अनलिमिटेड हेल्थ इंश्योरेंस प्लान्स की बढ़ती लोकप्रियता है। जो प्लान पहले गिने-चुने लोगों तक सीमित थे, वे अब 2025 में कुल खरीद का 15.7% हिस्सा बन चुके हैं। 2024 में यह आंकड़ा महज 2% के आसपास था। ज्यादा प्रीमियम के बावजूद जीएसटी राहत ने इन प्लान्स को अपनाने की झिझक कम कर दी है।
यह बदलाव सिर्फ कीमत का नहीं, बल्कि सोच का भी है। अब हेल्थ इंश्योरेंस सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि लॉन्ग टर्म सुरक्षा के तौर पर देखा जा रहा। दिलचस्प बात यह है कि यह ट्रेंड सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं है। टियर-3 शहरों की हिस्सेदारी बढ़कर 70% हो गई है, जो पिछले साल 63.5% थी। तेजी से बढ़ते इलाज खर्च और महामारी के बाद बदली सोच ने इस बदलाव को रफ्तार दी है। अगर यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले सालों में हेल्थ इंश्योरेंस घरों की फाइनेंशियल प्लानिंग का मजबूत आधार बन सकता है।
(प्रियंका कुमारी)
