बैंकों की बढ़ी टेंशन: रिकॉर्ड 81.75% पर पहुंचा सीडी रेशियो, जमा जुटाना बना बड़ी चुनौती

भारत में बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) रेशियो बढ़कर 81.75 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
Banks CD Ratio: भारतीय बैंकों की वित्तीय स्थिति को लेकर एक अहम संकेत सामने आया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 31 दिसंबर तक बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) अनुपात बढ़कर रिकॉर्ड 81.75 प्रतिशत पर पहुंच गया है। यानी बैंक हर 100 रुपये जमा पर लगभग 81.75 रुपए कर्ज के रूप में दे चुके हैं। यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है और यह बताता है कि ऋण की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका एक दूसरा निराशाजनक पहलू यह है कि बैंकों की जमा जुटाने की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। सीडी अनुपात पर आरबीआई ने कोई औपचारिक सीमा तय नहीं की है, लेकिन उसने बैंकों को यह सलाह जरूर दी है कि वे पर्याप्त तरलता बनाए रखें ताकि अप्रत्याशित स्थितियों से निपटने में परेशानी नहीं हो।
आम तौर पर बैंकों को जमा राशि में से एक हिस्सा नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) के लिए, एक बड़ा हिस्सा वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के लिए और कुछ अतिरिक्त सरकारी प्रतिभूतियों में रखना होता है। इन सभी प्रावधानों के बाद बैंकों के पास वास्तविक रूप से कर्ज देने के लिए लगभग 75 से 76 रुपए ही बचते हैं। ऐसे में 81.75 प्रतिशत का सीडी अनुपात यह दिखाता है कि बैंक उपलब्ध संसाधनों का काफी हद तक उपयोग कर चुके हैं। इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि जमा की तुलना में कर्ज का विस्तार तेजी से हुआ है। वर्ष 2025 में बैंक ऋण में 11.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि जमा में बढ़ोतरी केवल 10.1 प्रतिशत रही।
आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर तक बैंकों के पास कुल जमा राशि 248.5 लाख करोड़ रुपए थी, जबकि कुल कर्ज 202 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह अंतर बताता है कि ऋण की मांग मजबूत है, लेकिन लोग उतनी तेजी से बैंक में पैसा जमा नहीं कर रहे हैं। जमा जुटाने में आ रही इस चुनौती की एक वजह यह भी है कि निवेशकों को बैंक जमा के मुकाबले अन्य विकल्पों में बेहतर रिटर्न मिल रहा है। उदाहरण के तौर पर, छोटी बचत योजनाओं में तीन साल की अवधि के लिए 7.10 प्रतिशत तक ब्याज मिल रहा है, जबकि बैंक जमा पर ब्याज दरें 6.40 से 6.50 प्रतिशत के आसपास हैं। इसके अलावा, फरवरी 2025 से आरबीआई द्वारा नीति दरों में कुल 125 बेसिस प्वाइंट की कटौती के बाद बैंकों ने भी जमा दरें घटा दी हैं।
नतीजतन, मौजूदा टर्म डिपॉजिट पर औसत ब्याज दर घटकर 6.73 प्रतिशत और नई जमाओं पर 5.59 प्रतिशत तक आ गई है, जो हाल के वर्षों का सबसे निचला स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस दबाव से निपटने के लिए बैंकों को वैकल्पिक फंडिंग स्रोतों पर ध्यान देना चाहिए जैसे बॉन्ड जारी करना। हाल के महीनों में बैंकों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश की गति धीमी हुई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे अधिक धन कर्ज देने में लगा रहे हैं। कुछ अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि सीडी अनुपात की गणना में उरी और स्वामित्व पूंजी जैसे व्यापक स्रोतों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वास्तविक तस्वीर सामने आ सके। उम्मीद है आरबीआई द्वारा प्रणाली में डाली जा रही अतिरिक्त तरलता और जमा वृद्धि में संभावित सुधार से यह अनुपात कुछ हद तक संतुलित हो सकता है।
(एपी सिंह की रिपोर्ट)
