हिसार का राखीगढ़ी बनेगा विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र: आइकॉनिक साइट में दर्ज होगा, हड़प्पा की विरासत को मिलेगी नई पहचान
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरकार यहां आधुनिक पाथ-वे, अंतरराष्ट्रीय स्तर का संग्रहालय और स्थानीय गाइडों की नियुक्ति करेगी। इसके विकास के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
राखीगढ़ी में प्राचीन साइट से खुदाई में मिलीं वस्तुएं।
हरियाणा के हिसार के ऐतिहासिक स्थल राखीगढ़ी के लिए केंद्र सरकार ने एक बहुत बड़ी घोषणा की है। संसद में पेश किए गए हालिया बजट के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राखीगढ़ी को देश के 15 सबसे महत्वपूर्ण 'आइकॉनिक पुरातात्विक स्थलों' (Iconic Sites) की सूची में शामिल करने का ऐलान किया है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब दुनिया की सबसे प्राचीन और विशाल सिंधु-सरस्वती सभ्यता के इस केंद्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख टूरिज्म हब के रूप में विकसित किया जाएगा।
पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने को कई योजनाओं की घोषणा
केंद्र सरकार ने राखीगढ़ी की ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए यहां पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए कई योजनाओं की घोषणा की है। वित्त मंत्री के अनुसार यहां आने वाले सैलानियों की सुविधा के लिए विशेष 'पाथ-वे' (पैदल चलने के रास्ते) बनाए जाएंगे। इसके साथ ही स्थानीय इतिहास और संस्कृति की सटीक जानकारी देने के लिए पेशेवर गाइड्स के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर का संग्रहालय बनाया जाएगा। विरासत को सहेजने और लोगों तक पहुंचाने के लिए यहां समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएगा।
करोड़ों का बजट और अंतरराष्ट्रीय पहचान
राखीगढ़ी को वैश्विक स्तर पर चमकाने के लिए सरकार पहले से ही गंभीर रही है। इससे पूर्व के बजट में भी इस स्थल को 'ग्लोबल हेरिटेज सेंटर' में तब्दील करने के लिए 500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि आवंटित की जा चुकी है। यह स्थल 6,000 साल से भी अधिक पुरानी हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। इस नई पहल से राखीगढ़ी न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र बन जाएगा।
खुदाई में मिले प्राचीन जीवन के साक्ष्य
राखीगढ़ी की खुदाई ने दुनिया के सामने कई चौंकाने वाले तथ्य रखे हैं। यहां अब तक की रिसर्च में लगभग 60 मानव कंकाल प्राप्त हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, यहां से प्राचीन लिपि, महिलाओं के आभूषण और सबसे महत्वपूर्ण 'ड्रेनेज सिस्टम' (जल निकासी प्रणाली) के अवशेष मिले हैं। ये अवशेष इस बात का प्रमाण हैं कि हजारों साल पहले भी यहां के लोग सुनियोजित नगरों में रहते थे और उनकी जीवनशैली बेहद आधुनिक थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम वर्तमान में यहां के रहस्यों को सुलझाने के लिए लगातार प्रयासरत है।
मिस्र के पिरामिडों जैसे ऊंचे टीले
राखीगढ़ी की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थित ऊंचे टीले हैं, जिनका आकार देखने में मिस्र के पिरामिडों की याद दिलाता है। ये कुल 9 टीले लगभग 550 हेक्टेयर के विशाल क्षेत्र में फैले हुए हैं। इन्हीं टीलों ने एएसआई (ASI) के विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा, जिसके बाद यहां बड़े स्तर पर सर्वेक्षण और उत्खनन कार्य शुरू किया गया।
तीन चरणों में हुई खुदाई
राखीगढ़ी का इतिहास जानने के लिए अब तक तीन प्रमुख चरणों में खुदाई की जा चुकी है, जिनसे अलग-अलग युगों की जानकारी मिली है।
• प्रथम चरण (1997-98) : अमरेंद्र नाथ के नेतृत्व में हुई पहली खुदाई में टीला नंबर 7 से एक मानव कंकाल मिला था, जिसने यहां प्राचीन जीवन की पुष्टि की। यह कंकाल वर्तमान में दिल्ली के नेशनल म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहा है।
• द्वितीय चरण (2013-14): वसंत सिंधे की अगुआई में हुई खुदाई में 60 कंकाल मिले। डीएनए जांच से पता चला कि यह सभ्यता करीब साढ़े पांच हजार साल पुरानी है। गहराई में जाने पर 9 हजार साल पुराने मानव अवशेष, पुराने बर्तन और सूखे कुएं भी प्राप्त हुए।
• तृतीय चरण (2023-24): एएसआई के अपर महानिदेशक डॉ. संजय कुमार मंजुल के नेतृत्व में हाल ही में हुई खुदाई में शंख की चूड़ियां, तांबे के उपकरण, मोहरें और मिट्टी के मनके मिले हैं। यहां मिले मकानों के अवशेषों से पता चलता है कि उस समय के लोग कच्ची ईंटों के मजबूत घरों में रहते थे।
नदी के लुप्त होने के साथ खत्म हुआ यह वैभवशाली नगर
पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों का अनुमान है कि राखीगढ़ी प्राचीन सरस्वती नदी और उसकी सहायक नदी 'दृष्टवती' के तट पर बसा एक समृद्ध महानगर था। करीब 550 हेक्टेयर में फैली इस साइट पर अब तक 5 टीलों को अधिग्रहित किया जा चुका है। इतिहासकारों का मानना है कि जैसे-जैसे नदियां सूखती गईं, वैसे-वैसे इस विकसित सभ्यता का भी अंत हो गया होगा। अब सरकार टीला नंबर 6 और 7 को विशेष रूप से संरक्षित करने की दिशा में काम कर रही है।
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