पुष्य पूर्णिमा पर आस्था का महाउत्सव: मरार पटेल समाज की मां शाकंभरी जयंती में उमड़ा जनसैलाब, 22 गांवों के लोग हुए शामिल

जगदलपुर में मरार पटेल समाज द्वारा मां शाकंभरी की जयंती श्रद्धा भव्य तरीके से मनाई गई। जिसमें 22 गांवों से पहुंचे ग्रामीणों की सहभागिता ने आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।

Updated On 2026-01-03 19:57:00 IST

मां शाकंभरी की जयंती में शामिल हुआ मरार पटेल समाज

अनिल सामंत- जगदलपुर। पुष्य पूर्णिमा के पावन अवसर पर नगर में मरार पटेल समाज द्वारा मां शाकंभरी की जयंती श्रद्धा, परंपरा और सामाजिक एकता के भव्य प्रदर्शन के रूप में मनाई गई। शनिवार दोपहर नगर की सड़कों पर निकली शोभायात्रा ने जन-आस्था का विराट स्वरूप प्रस्तुत किया। जिसमें समाज के 22 गांवों से पहुंचे ग्रामीणों की सहभागिता ने आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया। माता शाकंभरी की सुसज्जित झांकी के साथ आरंभ हुई यात्रा में भक्ति-गीतों, पारंपरिक वाद्यों और जयकारों से संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो उठा।

शोभायात्रा के स्वागत में नगर के विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ-साथ कांग्रेस, भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों ने भी सहभागिता निभाई। चित्रकोट मार्ग से आरंभ होकर यात्रा कांग्रेस भवन, संजय बाजार,दंतेश्वरी मंदिर,सिरहासार और समुंद्र चौक जैसे प्रमुख मार्गों से गुजरी,जहां श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर माता का अभिनंदन किया। पनारापारा स्थित इंद्रावती तट पर मां शाकंभरी मंदिर में विधिवत विसर्जन के साथ आयोजन का समापन हुआ, जबकि लक्ष्मीनारायण मंदिर में आयोजित भंडारे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। 


बस्तर के महाराजा कमलचंद्र भंजदेव रहे उपस्थित
आयोजन की विशेष पहचान सब्जियों से सजे माता शाकंभरी के रथ ने बनाई। जिसने समाज के कृषक संस्कार और प्रकृति-पूजन की परंपरा को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। अंतिम चरण में आयोजित पूजा-अर्चना के उपरांत शोभायात्रा को विधिवत प्रारंभ कराया गया। जिसमें बस्तर राजपरिवार की सहभागिता ने कार्यक्रम की गरिमा को और ऊंचा किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बस्तर महाराजा कमलचंद्र भंजदेव उपस्थित रहे। 


शक्ति, परंपरा और सेवा का संदेश
पुष्य पूर्णिमा पर आयोजित मां शाकंभरी जयंती केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव बनकर सामने आई। 22 गांवों की सहभागिता, नगरभर में मिला सर्वसमाज का स्वागत, सब्जियों से सजे रथ के माध्यम से कृषि-संस्कृति का संदेश और अंत में भंडारे के जरिए सेवा-भाव इन सभी ने मिलकर यह साबित किया कि मरार पटेल समाज की यह परंपरा आस्था के साथ-साथ सामाजिक समरसता और लोकसंस्कृति की सशक्त अभिव्यक्ति है।

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