बस्तर के पेंशनरों की 12 दिवसीय तीर्थयात्रा: अयोध्या के रामलला से चित्रकूट के रामघाट तक झलकी संस्कृति, इतिहास और समर्पण
अयोध्या में राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद बस्तर संभाग के पेंशनरों ने 12 दिनों में अयोध्या, काशी, मथुरा, वृन्दावन, प्रयागराज और चित्रकूट की अविस्मरणीय आध्यात्मिक यात्रा की।
बस्तर के पेंशनरों की 12 दिवसीय तीर्थ यात्रा
अनिल सामंत - जगदलपुर। भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के अयोध्या में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन के बाद बस्तर संभाग के पेंशनरों ने 12 दिवसीय तीर्थ यात्रा कर आध्यात्मिकता, अनुशासन और सामूहिक आस्था का अनूठा उदाहरण पेश किया। यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक भ्रमण नहीं, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए सांस्कृतिक जुड़ाव और संगठनात्मक एकता का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आई।
अयोध्या में शुरुआत: रामलला और हनुमानगढ़ी के दर्शन
राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन के तुरंत पश्चात दल की यात्रा का शुभारंभ अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला के पावन दर्शन के साथ हुआ। इस अवसर पर सभी सदस्यों ने श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ प्रभु श्रीराम का स्मरण करते हुए यात्रा की मंगलकामना की। इसके उपरांत दल ने हनुमानगढ़ी पहुंचकर श्रद्धापूर्वक शीश नवाया, जहाँ बजरंगबली के दर्शन से सभी श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। यह पहला पड़ाव न केवल धार्मिक आस्था से परिपूर्ण रहा, बल्कि इससे पूरे दल में सकारात्मकता, आध्यात्मिक ऊर्जा और आपसी एकता की भावना का संचार हुआ, जिसने आगामी यात्रा के लिए सभी को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त किया।
काशी और सारनाथ: भारत की सनातन विरासत का अनुभव
इसके उपरांत यात्रा काशी नगरी पहुंची, जहाँ पेंशनर साथियों ने विधिवत काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा काल भैरव मंदिर में शीश नवाकर यात्रा की सकुशलता की कामना की। इन पावन दर्शनों ने सभी यात्रियों के मन में गहरी श्रद्धा और आत्मिक शांति का अनुभव कराया। काशी दर्शन के पश्चात दल सारनाथ पहुँचा, जहाँ स्थित अशोक स्तंभ और बौद्ध धरोहरों ने यात्रियों को भारत के गौरवशाली प्राचीन इतिहास और भगवान बुद्ध के संदेशों से परिचित कराया। सारनाथ की ऐतिहासिक और शांत वातावरण वाली भूमि ने सभी को ज्ञान, करुणा और शांति के मूल्यों का स्मरण कराते हुए यात्रा को एक ऐतिहासिक एवं बौद्धिक आयाम प्रदान किया।
मथुरा-वृन्दावन: कृष्ण नगरी में भक्ति का उछाल
यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव ब्रजभूमि रहा, जहाँ दल ने गोवर्धन पर्वत, श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा–गोकुल), नंदगांव और वृन्दावन के पावन स्थलों के दर्शन किए। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा और श्रीकृष्ण जन्मभूमि में दर्शन ने श्रद्धालुओं को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। नंदगांव और वृन्दावन की गलियों में व्याप्त भक्ति वातावरण ने सभी के मन को आनंद और श्रद्धा से भर दिया। इस क्रम में बांके बिहारी मंदिर, प्रेम मंदिर, निधिवन तथा बरसाना स्थित श्रीराधारानी मंदिर में दर्शन कर पेंशनर साथी अत्यंत भाव-विभोर हो उठे। ब्रज की इस दिव्य यात्रा ने सभी के हृदय में प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास की अमिट छाप छोड़ी।
प्रयागराज और चित्रकूट: यात्रा की दिव्य पूर्णता
वापसी यात्रा के दौरान दल प्रयागराज पहुँचा, जहाँ पवित्र त्रिवेणी संगम में विधिवत स्नान कर सभी यात्रियों ने आध्यात्मिक शुद्धि और पुण्य लाभ प्राप्त किया। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर किया गया यह स्नान पूरे यात्रा अनुभव का एक अत्यंत भावनात्मक और पावन क्षण रहा। इसके पश्चात यात्रा चित्रकूट पहुँची, जहाँ पंचकोशी मंदिर के दर्शन, रामघाट पर श्रद्धा अर्पण तथा मंदाकिनी नदी में नौकाविहार का आनंद लिया गया। चित्रकूट की शांत, आध्यात्मिक वातावरण वाली भूमि ने सभी को गहन आत्मिक शांति का अनुभव कराया। इस प्रकार प्रयागराज और चित्रकूट के इन पावन स्थलों के दर्शन के साथ यह 12 दिवसीय यात्रा आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्णता को प्राप्त हुई और सभी यात्रियों के स्मृतिपटल पर अविस्मरणीय छाप छोड़ गई।
रायपुर में भव्य स्वागत
29 दिसंबर को रायपुर लौटने पर बस्तर अंचल से आए पेंशनर साथियों का अत्यंत गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ स्वागत किया गया। इस अवसर पर संभागीय अध्यक्ष श्री राम नारायण ताटी एवं प्रांताध्यक्ष श्री वीरेंद्र नामदेव ने सभी यात्रियों को संबोधित करते हुए इस 12 दिवसीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा को “जीवन की अविस्मरणीय उपलब्धि” बताया। उन्होंने कहा कि यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक अनुभव से भरपूर रही, बल्कि आपसी सहयोग, संगठनात्मक एकता और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का भी सशक्त माध्यम बनी। उनके प्रेरक उद्बोधन ने सभी पेंशनर साथियों में संतोष, गौरव और आत्मिक आनंद की अनुभूति कराई।