मोदी जी, अपने होम मिनिस्टर को कंट्रोल कीजिए: कौन हैं प्रतीक जैन और क्या है I-PAC, जिनके लिए ममता बनर्जी ने केंद्र से लिया सीधा लोहा?
ममता ने पीएम मोदी से गृह मंत्री अमित शाह को नियंत्रित करने की अपील की और आरोप लगाया कि केंद्र उनकी चुनावी रणनीति और डेटा चुराने के लिए एजेंसियों का दुरुपयोग कर रहा है।
यह लड़ाई अब सड़कों से लेकर अदालत तक और तेज होने वाली है।
नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (I-PAC) के कार्यालय और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।
ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधी अपील करते हुए कहा, "प्रधानमंत्री जी, कृपया अपने गृह मंत्री को कंट्रोल कीजिए।" उन्होंने अमित शाह को "नारद मुनि" और "सबसे बुरा गृह मंत्री" बताते हुए आरोप लगाया कि वे विपक्षी दलों को डराने और उनकी चुनावी रणनीतियों को चुराने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रहे हैं।
ममता ने चेतावनी दी कि अगर भाजपा लोकतांत्रिक तरीके से नहीं लड़ सकती, तो उसे बंगाल आने की जरूरत नहीं है।
प्रतीक जैन: IIT बॉम्बे के पूर्व छात्र और TMC के 'साइलेंट' रणनीतिकार
प्रतीक जैन, जिनके ठिकानों पर दिल्ली से लेकर कोलकाता तक प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने छापेमारी की, वर्तमान में राजनीति के पर्दे के पीछे काम करने वाले सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं।
मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले प्रतीक जैन ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT बॉम्बे से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद कुछ समय तक कॉर्पोरेट जगत में भी काम किया।
साल 2015 में जब प्रशांत किशोर ने भारतीय राजनीति में डेटा और पेशेवर रणनीतियों के महत्व को बढ़ाने के लिए 'I-PAC' की नींव रखी, तब प्रतीक जैन इसके शुरुआती और सबसे विश्वसनीय सदस्यों में से एक थे।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी काबिलियत के दम पर संस्था में अहम जगह बनाई और वर्तमान में वे I-PAC के सह-संस्थापक और निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
प्रतीक जैन को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक 'साइलेंट' यानी खामोश रणनीतिकार के रूप में जाना जाता है, जो मीडिया की सुर्खियों से दूर रहकर केवल डेटा, जमीनी फीडबैक और डिजिटल अभियानों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
ममता बनर्जी ने इस छापेमारी के बाद स्पष्ट रूप से उन्हें अपनी टीम का "आईटी इंचार्ज" और "महत्वपूर्ण सदस्य" बताया, जिससे यह साफ हो गया कि पार्टी के डिजिटल नैरेटिव को गढ़ने में उनकी भूमिका कितनी बड़ी है।
वे न केवल सोशल मीडिया पर पार्टी की छवि सुधारने का काम देखते हैं, बल्कि बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के प्रबंधन और मतदाताओं के व्यवहार का विश्लेषण करने में भी माहिर माने जाते हैं।
उनके नेतृत्व में ही I-PAC ने बंगाल में 'दीदी के बोलो' और 'मां-माटी-मानुष' जैसे कई सफल अभियानों का खाका तैयार किया, जिसने पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूती प्रदान की।
यही कारण है कि उनके घर पर हुई छापेमारी को ममता बनर्जी ने सीधे अपनी चुनावी ताकत पर हमला करार दिया है।
क्या है I-PAC? जो बन गई है तृणमूल की चुनावी रीढ़
I-PAC यानी 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' भारत की पहली और सबसे बड़ी राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म है, जिसने देश में चुनाव लड़ने के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है।
इसकी शुरुआत 2013-14 में 'सिटिजन्स फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस' (CAG) के रूप में हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य डेटा और तकनीक के माध्यम से राजनीति को पेशेवर बनाना था।
2019 के लोकसभा चुनाव में जब पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर टीएमसी को तगड़ा झटका दिया, तब ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर और उनकी संस्था I-PAC के साथ हाथ मिलाया।
तब से लेकर आज तक, I-PAC केवल एक बाहरी सलाहकार नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस की 'वॉर रूम' की तरह काम कर रही है।
I-PAC की कार्यप्रणाली केवल विज्ञापनों तक सीमित नहीं है। यह संस्था चार मुख्य स्तंभों पर काम करती है: डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल संचार, फील्ड ऑपरेशन और रणनीतिक शोध।
इसके पास हजारों 'फुट सोल्जर्स' का नेटवर्क है, जो हर विधानसभा क्षेत्र के हर बूथ से सूक्ष्म जानकारी इकट्ठा करते हैं।
ममता बनर्जी के लिए I-PAC ने 'दीदीर सुरक्षा कवच', 'दीदीर दूत' और 'जोलो जोगे' जैसे सफल अभियान चलाए, जिससे पार्टी को सत्ता विरोधी लहर को कम करने में मदद मिली।
ममता बनर्जी का यह कहना कि "ED हमारी रणनीति और उम्मीदवारों की लिस्ट चुराना चाहती है", यह दर्शाता है कि I-PAC के पास टीएमसी का वो गोपनीय डेटा और रणनीतिक ब्लूप्रिंट है, जिसके दम पर पार्टी 2026 के विधानसभा चुनाव जीतने की योजना बना रही है।
यही कारण है कि इस संस्था पर पड़ने वाला छापा सीधे ममता बनर्जी की चुनावी रीढ़ पर हमला माना जा रहा है।
छापेमारी के बीच ममता का हस्तक्षेप और 'ग्रीन फाइल' का रहस्य
कोलकाता के लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के घर पर जब ED की कार्रवाई चल रही थी, तब ममता बनर्जी वहां अचानक पहुंच गईं। लगभग 20-25 मिनट तक अंदर रहने के बाद, वे मीडिया के सामने एक हरी फाइल और एक हार्ड डिस्क लेकर निकलीं।
ममता ने दावा किया कि उन्होंने इन दस्तावेजों को ED के हाथ लगने से बचाया है। उनका कहना था कि फाइलों में आगामी विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की सूची और पार्टी की आंतरिक रणनीति थी, जिसे एजेंसियां जबरन जब्त करना चाहती थीं।
इस घटना ने एक नया संवैधानिक विवाद खड़ा कर दिया है कि क्या कोई मुख्यमंत्री छापेमारी की प्रक्रिया के बीच में हस्तक्षेप कर सकती है।
राजनीतिक प्रतिशोध बनाम भ्रष्टाचार की जांच: ED का अपना तर्क
जहां एक तरफ ममता बनर्जी इसे "राजनीतिक प्रतिशोध" बता रही हैं, वहीं ED के सूत्रों का कहना है कि यह छापेमारी साक्ष्यों के आधार पर की गई है।
अधिकारियों के मुताबिक, यह जांच कोयला घोटाले और नौकरी घोटाले से जुड़े संदिग्ध हवाला लेनदेन और कैश डील्स से संबंधित है। ED का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने जांच स्थल पर पहुंचकर साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की है और डिजिटल उपकरणों को जबरन अपने कब्जे में लिया है।
एजेंसी का दावा है कि उनके पास इस कार्रवाई के लिए पुख्ता कानूनी आधार और वारंट थे, और वे किसी राजनीतिक दल को निशाना नहीं बना रहे थे।
आगामी चुनाव और बंगाल में बढ़ता सियासी घमासान
यह घटनाक्रम 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की राजनीति में उबाल आने का संकेत है।
ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को "बंगाल की अस्मिता" और "डेटा चोरी" से जोड़ते हुए पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। वहीं, भाजपा ने इसे मुख्यमंत्री द्वारा अपनी पार्टी के भ्रष्टाचार को छिपाने की कोशिश करार दिया है।
इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद अब मामला कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुंच गया है, जहां ED ने मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के खिलाफ याचिका दायर की है। यह लड़ाई अब सड़कों से लेकर अदालत तक और तेज होने वाली है।