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पीएम मोदी का मास्टर प्लान, ऐसे निकलेगा कश्मीर और चीन का हल

Editorial | UPDATED Aug 18 2017 11:33AM IST
पीएम मोदी का मास्टर प्लान, ऐसे निकलेगा कश्मीर और चीन का हल

सरकार की कोशिश कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान की है। लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न गोली से न गाली से, हर कश्मीरी को गले लगाने से समस्या सुलझेगी कहकर स्पष्ट पैगाम दिया है कि सरकार कश्मीर में अमन बहाल करने को लेकर फिक्रमंद है और शांतिपूर्ण तरीके से अमन चाहती है।

घाटी में आतंकवाद के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन, टेरर फंडिंग से जुड़े अलगाववादी हुर्रियत धड़ों के खिलाफ एनआईए व ईडी की कार्रवाई और पाकिस्तान के साथ वार्ता बंद रहने के चलते कई लोगों की धारणा बन गई थी कि मोदी सरकार सेना के बल पर ही कश्मीर में शांति लाना चाहते हैं,

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लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर अपने संबोधन में कश्मीरियों को गले लगाने से परिवर्तन होगा कहकर उस धारणा को गलत साबित कर दिया। प्रधानमंत्री के इस शांति संदेश का स्वागत किया जाना चाहिए। गोली-बारूद से कभी कहीं शांति स्थापित नहीं हो सकी है। मिल-बैठकर ही अमन लाना संभव है।

इसी के साथ प्रधानमंत्री ने यह भी साफ कर दिया कि आतंकवाद के खिलाफ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। देश के सभी लोग कश्मीर में शांति चाहते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार, जम्मू-कश्मीर सरकार और सैन्य बल प्रयत्न भी कर रहे हैं। बड़ा सवाल है कि कश्मीर में शांति किस तरह चाहिए? मोदी सरकार की नीति साफ है।

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कश्मीरियों से वार्ता के जरिये समस्या का हल होगा। पिछले तीन साल में कश्मीर पर प्रधानमंत्री मोदी का स्पष्ट रुख रहा है कि वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के रोडमैप कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत पर चलेंगे,

लेकिन इसी के साथ मोदी सरकार सीमा पार से आतंकवाद और आतंकवाद को शह देने वाले अलगाववादी के खिलाफ सख्त है। सरकार कश्मीरी अवाम के सिविल सोसायटी, जनप्रतिनिधियों को वार्ता में शामिल करना चाहती है, चंद अलगाववादी हुर्रियत नेताओं को नहीं जो रहते-खाते भारत में हैं और गाते पाकिस्तान के हैं।

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हुर्रियत के अलगावादी धड़े के नेताओं की पोल खुल चुकी है। वे भारत के खिलाफ गतिविधियों में लिप्त हैं। कश्मीर में अशांति और आतंकवाद को भड़काने में इनके हाथ रहे हैं। वर्ष 2015 में जब सरकार ने वार्ता के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजा था,

तब हुर्रियत नेता सैय्यद अलीशाह गिलानी, शब्बीर शाह, उमरवाइज फारूक और अलगावादी जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक ने प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार कर दिया था। मतलब साफ था कि वे कश्मीर में शांति नहीं चाहते हैं। सरकार का स्पष्ट मानना है कि चंद हुर्रियत नेता सभी कश्मीरी अवाम का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

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उल्टे वे कश्मीरी को आतंकवाद और मजहबी नफरत का जख्म देते हैं। 40 साल में इन अलगावादी हुर्रियत नेताओं का रुख भारत के खिलाफ ही रहा है। इनके नाम टेरर फंडिंग में भी आ रहे हैं। कश्मीर में एक चुनी हुई सरकार है और वहां अमन-चैन को बिगाड़ने वाले पाकिस्तान और पाकपरस्त आलगावादी हैं,

इसलिए पाकपरस्त लोगों को वार्ता में शामिल करने का कोई मतलब नहीं है। सरकार की ऐसी सोच तर्कपूर्ण है। कश्मीरियों को भी अब समझ आ रहा है कि हुर्रियत व अलगाववादी गुटों के लोग उनके हित की बात नहीं करते हैं, बल्कि ये कश्मीरी युवाओं को गुमराह करते हैं।

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मोदी ने कहा भी कि कुछ मुट्ठीभर अलगाववादी कश्मीर का माहौल खराब कर रहे हैं। वे अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान भी कह चुके हैं कि कश्मीरी युवाओं को पत्थर हीं कलम थामनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती भी वार्ता से ही अमन की बात कई दफा कह चुकी हैं।

इससे साफ है कि कश्मीर में अमन के लिए केंद्र और राज्य सरकार एक ही ट्रैक पर है। वार्ता से ही कश्मीर में शांति की कोशिश होनी चाहिए, मगर सरकार को सीमा पार से आतंकवाद, अलगाववादी और टेरर फंडिंग के खिलाफ कठोर कदम जारी रखना चाहिए। स्थाई शांति के लिए कश्मीर के दुश्मनों का सफाया जरूरी है।

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