Breaking News
Top

भारत चीन सम्बन्ध: दोनों देश लिखेंगे इबादत, ऐसा था अब तक का इतिहास

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Mar 13 2018 11:27AM IST
भारत चीन सम्बन्ध: दोनों देश लिखेंगे इबादत, ऐसा था अब तक का इतिहास

चीन के संसदीय सत्र की पूर्व संध्या पर आयोजित एक प्रेस काॅन्फ्रेंस में चीन के विदेश मंत्री यांग यी ने कहा कि यदि भारत और चीन आपसी विवाद सुलझाकर और मिलकर चल सकें तो फिर वे विश्व के केवल दो राष्ट्र नहीं बल्कि ग्यारह के समकक्ष हो जाएंगे। विगत 23 फरवरी को पेरिस में आयोजित फाइनेंशिएल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की मीटिंग के आखिरी सत्र में पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में  शामिल करने के अमेरिकन प्रस्ताव का चीन ने विरोध नहीं किया।

चीन के इस बदले कूटनीतिक दृष्टिकोण का भारत के कूटनीतिक क्षेत्र में स्वागत किया गया। उल्लेखनीय है कि पेरिस की एफएटीएफ मीटिंग से पहले चीन द्वारा पाकिस्तान का अंध संमर्थन किया जाता रहा। जब मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की यूएन ने पेशकश की तो चीन ने उसका विरोध किया।  पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक मदद से अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के बाद चीन ने पाकिस्तान को आर्थिक और नैतिक संबल प्रदान किया है।

भारत और चीन रिश्तों में विगत वर्ष बेहद कटुता पैदा हो गई, जब डोकलाम में चीन ने सैन्य निर्माण शुरू किया गया तो दोनों राष्ट्रों के मध्य तनातनी बनी रही। अपनी आजादी के प्रारंभिक दौर में ही भारत ने चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया  था। समाजवादी रुझान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 1949 में चीन के प्रति आकर्षित हुए थे। चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री कामरेड चाऊ एन लाई संग नेहरू की मित्रता भी रही। पंचशील के सिद्धांत के तहत हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे का उद्घोष हुआ। वर्ष 1962 में सीमा विवाद के कारण चीन द्वारा भारत पर सैन्य आक्रमण अंजाम दिया। चीन ने भारत से विश्वासघात किया। यह भी तथ्य है कि वर्ष 1962 और 1987 के अतिरिक्त भारत और चीन मध्य कोई उल्लेखनीय सैन्य युद्ध नहीं हुआ। विगत वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा था कि भारत और चीन की सरहद पर पिछले 33 वर्षों से एक भी गोली नहीं चली है। यकीनन एक भी गोली तो नहीं चली, किंतु दोनों राष्ट्रों के मध्य सीमा विवाद कटुता के साथ विद्यमान है। 

विगत माह भारत के विदेश सचिव विजय गोखले बीजिंग मे कूटनीतिक सूत्रों की तलाश करते रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माह जून में प्रस्तावित शंघाई सहयोग संगठन की मीटिंग में शिरकत करने के साथ ही भारत चीन संबंधों में किस तरह से नई पहल कर सके। चीन द्वारा भारत के प्रायः सभी निकट पड़ोसी राष्ट्रों में विशेषकर नेपाल में विशेष रुचि ली जा रही है, क्योंकि नेपाल के माउंट एवरेस्ट पर साम्यवादी दल का लाल परचम लहरा रहा है।

नेपाल में आजकल सत्तासीन साम्यवादी वस्तुतः विचारधारा के नजरिये भारत के मुकाबले से चीन के अधिक निकट रहे हैं। एशिया प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रमक आधिपत्य सामना करने के लिए भारत ने जापान आस्ट्रेलिया और अमेरिका से हाथ मिलाया है। अतः चीन क्या वास्तव में अपनी विस्तारवादी फितरत का परित्याग करने को तैयार होगा। चीन की विस्तारवादी फितरत से केवल अकेला भारत ही संत्रस्त नहीं रहा है,

वरन वियतनाम, कंपूचिया और  म्यांमार आदि दक्षिण एशिया के तकरीबन सभी राष्ट्र आहत रहे हैं। यांग यी की यह इच्छा कि भारत-चीन विवाद निपटा लें और फिर मिलकर आगे कदम बढ़ाएं। इसे साकार करने के लिए चीन को विस्तारवादी फितरत से मुक्ति प्ाानी होगी, अन्यथा  50 के दशक की तरह हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे की तरह ही उनकी यह कामना भी एक कूटनीतिक पाखंड ही सिद्ध होगी।

ADS

(हमसे जुड़े रहने के लिए आप हमें फेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं )

ADS

ADS

मुख्य खबरें

ADS

ADS

ADS

ADS

Copyright @ 2017 Haribhoomi. All Right Reserved
Designed & Developed by 4C Plus Logo