Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

शांताबाई देश की पहली महिला ''नाई''

अपने पति की मौत के बाद शांताबाई ने नाई का काम करना शुरू कर दिया।

शांताबाई देश की पहली महिला नाई
X
नई दिल्ली. भारत की पहली महिला बारटेंडर शात्भी बसु से लेकर भारत की पहली महिला शराब परिचारक सोभना पुरी तक, देश की महिलाएं अपनी लगन औऱ मेहनत के दम पर अपने कॅरियर को आगे बढ़ाने के लिए एक सचेत प्रयास के द्वारा जेंडर छवि को तोड़ते हुए आगे की ओर बढ़ रहीं हैं।
लेकिन, 40 साल पहले, एक पारंपरिक औरत जिसे यह भी नहीं पता था कि लिंग रूढ़िबद्धता क्या है। इन सभी चीजों से दूर वह औरत एक गांव में अपने परिवार के साथ शांत जीवन व्यतीत कर रही थी।
लेकिन उसके साथ जीवन में एक अनहोनी घटी जिसकी उसने कल्पना तक नही की थी। इस घटना के बाद उसे मर्दों वाले काम को करना पड़ा जो की उस वक्त इसे सही नहीं माना जाता था। लेकिन अपनी भूखी बेटियों को दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए उसे यह भी करना पड़ा। यह कहानी है भारत की पहली महिला नाई शांताबाई श्रीपति यादव की। शांताबाई जब सिर्फ 12 साल की थी, उसकी शादी हो गई थी। उसके पिता एक नाई थे और उसके पति श्रीपति भी एक नाई थे।
श्रीपति और उसके चार भाइयों ने कोल्हापुर जिले के अर्डल गांव में तीन एकड़ जमीन खरीदी थी और चारों भाई उस जमीन पर खेती का काम करते थे। श्रीपति खेती के अलावा नाई का भी काम किया करती थीं ताकि अपनी आय को कुछ और बढ़ा सके। लेकिन जल्द ही भाइयों के बीच झगड़ा हो गया और उन्हें तीन एकड़ जमीन को आपस में बांटना पड़। श्रीपति के पास खेती करने के लिए जो जमीन थी वह एक एकड़ से भी कम थी। श्रीपति ने अन्य गांवों कि यात्राएं करनी शुरु कर दी ताकि शेव औऱ बालों को कटाने के लिए अधिक ग्राहक मिल सकें। हालांकि, अभी भी श्रीपति के पास उतने पैसे नहीं हो पा रहे थे कि वह अपने बच्चों का पेट भर सके जिसके कारण श्रीपति को साहूकारों से कर्ज लेना पड़ा।
हरिभाऊ कदुकर, जो हसुरसासगिरी गांव के सभापति थे, उन्होंने श्रीपति की दुविधा को देख उसकी मदद करनी चाही और उसे हसुरसासगिरी में बुला लिया। हसुरसासगिरी गांव में एक भी नाइ नहीं थे तो वहां श्रीपति की की कमाने की अच्छी संभावना थी।
शांताबाई और श्रीपति एक नया जीवन शुरू करने के लिए हसुरसासगिरी आ गए। अगले 10 वर्षों में शांताबाई ने छह बेटियों को जन्म दिया, जिसमें से दो की मृत्यु हो गई थी। हालांकि, श्रीपति अपनी नाई की दुकान से अच्छा कमा रहा था और अपने परिवार की देखभाल कर सकता था। लेकिन 1984 में जब शांताबाई की सबसे बड़ी बेटी 8 साल की थी तब श्रीपति का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।
तीन महीने के लिए, शांताबाई एक खेत में आठ घंटे एक मजदूर के रूप में काम करने लगी थी। दिनभर काम करने के बाद उसे अंत में मात्र 50 पैसे मेहनताना मिलता था जो उसकी चार बेटियों को खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं था।
श्रीपति के पास जो जमीन का टुकड़ा था उसे भी सरकार ने 15,000 रुपए का भुगतान कर ले लिया। उन पैसों का शांताबाई ने श्रीपति के द्वारा लिए कर्ज का भुगतान करने में इस्तेमाल किया। लेकिन उसे अभी भी अपने बच्चों को खिलाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। तीन महीने के लिए, वह खेतों में मेहनत करने लगी। कुछ दिन वह अपने परिवार के लिए दो वक्त का भोजन जूटा पाने में कामयाब हो जाती तो अगले दिन उसके हाथ कुछ भी नहीं लगता। अंत में उसने हार मान ली और फैसला किया कि वह अपनी चार बेटियों के साथ आत्महत्या करेगी।
लेकिन इस बार फिर से, हरिभाऊ कदुकर उसके रक्षक बन गए। जब हरिभाऊ को शांताबाई की आत्महत्या वाली बात का पता चला तो उन्होंने उसे कि वह अपने पति के पेशे को करना शुरू कर दे। श्रीपति की मौत के बाद गांव में कोई भी नाई नहीं था और शांताबाई वहां अपने पति की तरह ही अच्छे से कमा सकती थी। शांताबाई इस विचार पर चुप थी। इन सब के बाद, किसी ने भी कभी एक महिला नाई के बारे में नहीं सुना था। शांताबाई के पास इस एक विकल्प के बाद और कोई रास्ता नहीं था।
हरिभाऊ शांताबाई के पहले ग्राहक बन गए। प्रारंभ में, ग्रामीणों ने पाया कि वह क्या ऊटपटांग काम कर रही है। वे उसका मज़ाक उड़ाया करते थे। लेकिन शांताबाई की भावना को कोई भी नहीं तोड़ सका और फिर उसने एक नाई बनने का फैसला किया। शांताबाई काम पर जाते वक्त अपने बच्चों को अपने पड़ोसियों को यहां छोड़ जाया करती थी। शांताबाई हर रोज अधिक ग्राहकों की तलाश में आसपास के गांवों में 4-5 किलोमीटर की दूरी तय कर जाया करती थी। जल्द ही, कादल, हिदादुगी और नरेवाडी गांवों के निवासी शांताबाई के यहां नाई का काम कराने आने लगे क्योंकि उनके गांव में कोई नाई नहीं था।
खबर फैल गई और शांताबाई की कहानी तरुण भारत जैसे स्थानीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों द्वारा कवर किया गया था। शांताबाई को विभिन्न संगठनों द्वारा नाई समुदाय समाज के लिए एक प्रेरणा होने के लिए रत्न पुरस्कार जैसे पुरस्कार दिए गए। 1984 में शांताबाई बाल कटवाने और दाढ़ी बनवाने के लिए 1 रुपए चार्ज करती थी। जल्द ही वह मवेशियों की भी शेविंग करना शुरू कतर दिया था जिसके लिए वह 5 रुपए चार्ज करती थी।
1985 में शांताबाई को इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत एक घर का निर्माण करने के लिए सरकार से पैसे मिले। शांताबाई ने किसी से भी वित्तीय मदद लिए बिना अपनी सभी बेटियों की शादी कर दी। आज शांताबाई दस बच्चों की दादी है। अब शांताबाई 70 वर्ष की हो गई है जो अब आसपास के गांवों के लिए अब और नहीं चल सकती है। वह कुछ ग्राहकों पर निर्भर है जो अपने खुद के गांव से उसके पास आते हैं।
शांताबाई कहती है, 'गांव में एक सैलून है जहां गांव के सभी युवा जाते हैं। मैं केवल कुछ पुराने ग्राहकों से मिलती हूं। अब मैं दाढ़ी और बाल कटवाने के लिए 50 रुपए लेती हूं और मवेशी की हजामत बनाने के लिए 100 रुपए लेती हूं। मैं प्रति माह 300 से 400 रुपए कमा लेती हूं और सरकार की ओर से 600 रुपए मिलते हैं। इतने पैसे वास्तव में पर्याप्त नहीं है, लेकिन मैं इससे पहले भी कठिन परिस्थितियों से गुजर चुकी हूं और फिर से ऐसा कर सकती हूं।'
शांताबाई उसके साहस और उसे उसकी सबसे कठिन दिनों के दौरान प्रोत्साहित करने के लिए हरिभाऊ कदुकर को अपना आदर्श मानती हैं। हरिभाऊ का 99 वर्ष की उम्र में 2008 में निधन हो गया। उनके महान पोते, बबन पाटिल अभी भी शांताबाई को देखने नियमित रूप से उसके घर जाया करते हैं।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलोकरें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story