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एक मंदिर ऐसा भी, यहां सोने और चांदी के तालों से पूरी होती है मन्नत

फूल-फल और प्रसाद के बजाय सोने के तालों को चढ़ाकर मन्नत पूरी की जाती है।

एक मंदिर ऐसा भी, यहां सोने और चांदी के तालों से पूरी होती है मन्नत
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नई दिल्ली. मंदिर में आपने लोगों को पूजा के लिए अगरबत्तिया और फूल-फल लाते तो जरूर देखा होगा। लेकिन यह बात आपको आश्चर्य में डाल देगी कि एक ऐसा मंदिर भी है जहां फूल-फल और प्रसाद के बजाय सोने के तालों को चढ़ाकर मन्नत पूरी की जाती है।
लखनऊ से 80 किलो मीटर दूर कानपुर के बंगाली मोहाल क्षेत्र के काली मंदिर की एक परंपरा बन गई है। कानपुर 1949 में बने इस मंदिर में यह परंपरा लगभग 60 साल पहले शुरु हुई थी।“ ऐसा माना जाता है कि, मंदिर में आने भक्तजन अपनी श्रद्धा से लोहे के बने ताले अर्पित करती है। इसके अलावा नवरात्रि के दिनों में लोग सोने और चांदी से जड़े हुए ताले चढ़ाते हैं। लगभग 500 लोग प्रतिदिन मंदिर में आते हैं और दुर्गा की विशालकाय प्रतिमा के सामने ताले अर्पित करते हैं।

ताले सीधे माता की मूर्ति के सामने नहीं रखे जाते बल्कि मूर्ति से कुछ दूर बने खम्भोँ में जड़ी रस्सियों में बांधे जाते हैं। श्रद्धालुओं के द्वारा अपनाएं गए ताले चढ़ाने की मान्यता के पीछे एक कहा भी है।

मान्यता के पीछे का सच

ऐसा कहा जाता है कि मंदिर के पहले पुजारी ताराचंद, जिन्होंने मंदिर का निर्माण कराया था, उनके एक भक्त ने देवी की प्रतिमा को जंजीर और ताले मे बांध दिया था जिसके बाद लोग उसे एक हत्यारा मानने लगे थे। यहां तक की उसे जेल तक पहुंचा दिया था।

तारा चंद ने प्रतिज्ञा की कि जब तक देवी भक्त को आशीर्वाद नहीं देंगी और उसे निर्दोष साबित नहीं करेंगी वह ताला जंजीर नहीं खोलेंगे। “ भक्त को जेल हो जाने के बाद ताराजी ने सामान्य “पूजा” और आरती नहीं की और देवी को जंजीर तथा ताले में बंधा छोड़ दिया। ऐसा कई महीनों तक चला। जब चीज़ों ने उनके के हित में बदलना शुरु कर दिया और अदालत ने उसे छोड़ दिया तब से ताले का चढ़ावा चढ़ाने की विलक्षण रीति का आरंभ हुआ और आज भी यह परंपरा चली आ रही है।

तब से ही भक्तजन मंदिर के परिसर में अपने हाथों में ताले लिये आते हैं ओर देवी के सामने अपनी समस्याओं के समाधान तथा उसी तरह के आशीर्वाद के लिये प्रार्थना करते हैं जैसा उन्होने अपने उस उत्कट भक्त को दिया था जिसे अदालत ने बरी कर दिया था। मंदिर में प्रतिदिन औसतन 500 भक्तों की संख्या नवरात्रि के उत्सव के दिनों में काफी भीड़ देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश के अनेक भागों और दूर-दूर के अन्य राज्यों से भक्त इस मंदिर में आते हैं।

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