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हैरतअंगेज! ये है धान-सब्जियों का बैंक, यहां मिलेंगी विलुप्त हो रही धान-सब्जी

धान की पुरानी किस्में और सब्जियों की प्रजाति को बचाने के लिए कुहरी गांव के किसानों ने इस बैंक की नींव रखी है। बीज बैंक से किसान जिस मात्रा में बीज लेते हैं, फसल होने पर उसकी डेढ़ गुना वापस करते हैं।

हैरतअंगेज! ये है धान-सब्जियों का बैंक, यहां मिलेंगी विलुप्त हो रही धान-सब्जी
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धान हल्का, सुंगधित और पतला...खालिस देसी। मोटा गुरमटिया हो या सफरी, विलुप्त हो रही ऐसी सब किस्में एक अनूठे बैंक में जरूरी मिल जाएंगी। हैरतअंगेज करने वाली खबर ये है कि धान की पुरानी किस्में और सब्जियों की प्रजाति को बचाने के लिए कुहरी गांव के किसानों ने इस बैंक की नींव रखी है। बीज बैंक से किसान जिस मात्रा में बीज लेते हैं, फसल होने पर उसकी डेढ़ गुना वापस करते हैं। दरअसल, खेती में नई तकनीक और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में पिछले 50 वर्षों में देसी किस्म के धान और सब्जियों की वेरायटियां विलुप्ति के कगार पर हैं।

हर्सीवे पर स्थित ग्राम कुहरी में खुले इस बीज बैंक का श्रीजन कल्याण समाज सेवी संस्था द्वारा किया जाता है जिसमें 12 सदस्यीय दल इसकी देखरेख करते हैं। हाल में 250 से अधिक किसान संख्या वाले इस बैंक में धान की 19 प्रजाति, 11 प्रकार के दलहन और 42 प्रकार की सब्जियों की 200 से अधिक वेरायटी के बीज मौजूद हैं।

देसी खाद और कीटनाशक भी

किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए यहां से बीज का आदान प्रदान होता है और देशी बीच के लिए लगने वाले देशी नुस्खों से तैयार खाद और कीटनाशक का भी प्रयोग करना सिखाया जाता है ताकि किसान को लागत में कमी के साथ नुकसान की आशंका भी कम हो। गौमूत्र, दीमक आदि से कीटनाशक तैयार किए जाते हैं वहीं नीम, धतूरा, फुड़हर, तरोई से खाद का निर्माण किया जाता है।

जैविक खेती की ओर बढ़ रहे किसान

संस्था के सदस्यों का मानना है कि वर्तमान में किसान और लोगों का रुझान एक बार फिर जैविक आहार की ओर है। ऐसे में पुराने किस्म की विलुप्तता को बचाने एक बार फिर प्रयास शुरु करने की आवश्यकता के चलते इसकी प्रेरणा मिली और उन्होनें जैविक खेती और पुराने किस्म को बचाने इस बैंक की स्थापना की।

बैंक में महिलाएं भी सदस्य

सिरपुर क्षेत्र के दर्जनों गांवों के 250 से अधिक किसान इस बैंक में सदस्य हैं। खास बात यह भी है कि इसमें महिला किसान भी सक्रिय सदस्य हैं। श्यामा बाई ध्रुव, कुंती खैरवार, पुन्नी ध्रुव, सावित्री विश्वकर्मा, लुकेश्वरी साहू बताती है कि किसान जरुरत के मुताबिक उत्पादन के लिए बीज ले जाते है और वापसी के दौरान ली हुई मात्रा का ड़ेढ़ गुना लौटाना होता है।

दो दशक पहले मध्यप्रदेश से हुई थी शुरआत

धान की पुरानी किस्मों को बचाने की शुरुआत दो दशक पूर्व मध्यप्रदेश के 35 जिलों से हुई। 55 दिनों तक 25 जिलों की यात्रा के दौरान बीज बचाओ-खेती बचाओ अभियान के तहत देसी अनाजों, वनस्पतियों, पेड़–पौधों, देशज पशुओं, मवेशियों और विलुप्त हो रही जैवविविधता पर गाँव की चौपाल पर ग्रामीणों से चर्चा की गई।

हरित क्रांति के बाद बदला खेती का तरीका

स्वयं सेवी संस्था से जुड़ीं हेमलता राजपूत का कहना है कि इन्हें बचाना इसलिये भी आवश्यक है कि ये प्रजातियाँ हजारों सालों और कई पीढ़ियों से रची बसी हुई थीं।

यही कारण है कि ज्यादा या कम बारिश के बाद भी फसल रोग का इन पर उतना ज्यादा असर नहीं होता है, जितना फिलहाल की जा रही खेती में होता है। हरित क्रान्ति के बाद परम्परागत खेती का तरीका बदला और पुरानी किस्में भुलाकर आयातित प्रजातियों की खेत को ही आधार मान लिया गया।

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