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हैरतअंगेज: ‘कड़कनाथ'' पर भिड़े छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश

हैरतअंगेज कर देने वाली खबर ये है कि कड़कनाथ यानि मुर्गे पर छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश आपस में भीड़ गए हैं। कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गे के जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) को लेकर ये दोनों ही राज्य अपना-अपना दावा पेश कर रहे हैं। इससे पहले रसगुल्ला को लेकर बंगाल और ओडिशा के बीच विवाद हुआ था।

हैरतअंगेज: ‘कड़कनाथ पर भिड़े छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश
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हैरतअंगेज कर देने वाली खबर ये है कि लाजवाब स्वाद के लिए जाने जाने वाले कड़कनाथ मुर्गे की प्रजाति मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच विवाद का विषय बनी हुई है। इससे पहले रसगुल्ला को लेकर बंगाल और ओडिशा के बीच विवाद हुआ था। कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गे के जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) को लेकर ये दोनों ही राज्य अपना-अपना दावा पेश कर रहे हैं। इन दोनों पड़ोसी राज्यों ने इस काले पंख वाले मुर्गे की प्रजाति के लिए ‘जीआई टैग‘ प्राप्त करने के लिए चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेतक पंजीयन कार्यालय में आवेदन दिये हैं।

मध्यप्रदेश का दावा है कि कड़कनाथ मुर्गे की उत्पत्ति प्रदेश के झाबुआ जिले में हुई है, जबकि छत्तीसगढ़ का कहना है कि कड़कनाथ को प्रदेश के दंतेवाड़ा जिले में अनोखे तरीके से पाला जाता है और यहां उसका सरंक्षण और प्राकृतिक प्रजनन होता है। विशेषज्ञों के अनुसार कड़कनाथ के मांस में आयरन एवं प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक होती है, जबकि कॉलेस्ट्राल की मात्रा अन्य प्रजाति के मुर्गों से काफी कम पायी जाती है।

इसके अलावा, यह अन्य प्रजातियों के मुर्गों से बहुत अधिक दाम में बेचा जाता है। मध्यप्रदेश पशुपालन विभाग के अतिरिक्त उप संचालक डॉ. भगवान मंघनानी ने बताया, मध्यप्रदेश को कड़कनाथ मुर्गे के लिए संभवत: जीआई टैग मिल जाएगा। इस प्रजाति का मुख्य स्रोत राज्य का झाबुआ जिला है। इस मुर्गे के खून का रंग भी सामान्यतः काले रंग का होता है, जबकि आम मुर्गे के खून का रंग लाल पाया जाता है।

उन्होंने कहा, झाबुआ जिले के आदिवासी इस प्रजाति के मुर्गों का प्रजनन करते हैं। झाबुआ के ग्रामीण विकास ट्रस्ट ने इन आदिवासी परिवारों की ओर से वर्ष 2012 में कड़कनाथ मुर्गे की प्रजाति के लिए जीआई टैग का आवेदन किया है। छत्तीसगढ़ ने भी हाल ही में कड़कनाथ मुर्गे के जीआई टैग के लिए दावा किया है।

ग्लोबल बिजनेस इनक्यूबेटर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष श्रीनिवास गोगिनेनी ने बताया कि कड़कनाथ को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में अनोखे तरीके से पाला जाता है। यहां उसका सरंक्षण और प्राकृतिक प्रजनन होता है।

इस कंपनी को दंतेवाड़ा जिला प्रशासन जन-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत इलाके के आदिवासी लोगों की आजीविका सृजित करने में मदद करने के लिए लाया है।

गोगिनेनी ने कहा, दंतेवाड़ा प्रशासन ने फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज की मदद से जिले में कड़कनाथ प्रजाति को अनोखे तरीके से पाले जाने एवं इसका बहुत ज्यादा उत्पादन होने के कारण पिछले महीने जीआई टैग के लिए आवेदन किया है।

मप्र में ढाई लाख उत्पादन

मध्यप्रदेश पशुपालन विभाग के अतिरिक्त उप संचालक डॉ. भगवान मंघनानी ने बताया कि मध्यप्रदेश में राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही हैचरीज में सालाना करीब ढाई लाख कड़कनाथ मुर्गों का उत्पादन किया जाता है।

दंतेवाड़ा में 4 लाख उत्पादन

अकेले दंतेवाड़ा जिले में 160 से अधिक कुक्कुट फार्म राज्य सरकार द्वारा समर्थित स्व-सहायता समूहों द्वारा चलाए जा रहे हैं। इनमें सालाना करीब चार लाख कड़कनाथ मुर्गों का उत्पादन होता है।

ऐसा है कड़कनाथ

कड़कनाथ के एक किलोग्राम के मांस में कॉलेस्ट्राल की मात्रा करीब 184 एमजी होती है, जबकि अन्य मुर्गों में करीब 214 एमजी प्रति किलोग्राम होती है। कड़कनाथ के मांस में 25 से 27 प्रतिशत प्रोटीन होता है, जबकि अन्य मुर्गों में केवल 16 से 17 प्रतिशत ही प्रोटीन पाया जाता है। इसके अलावा, कड़कनाथ में लगभग एक प्रतिशत चर्बी होती है, जबकि अन्य मुर्गों में 5 से 6 प्रतिशत चर्बी रहती है।

इनपुट भाषा

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