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अद्भुतः बच्चे के जन्म लेते ही 85 दिन बाद अचानक कोमा से बाहर आई मां

परिजनों ने हॉस्पिटल की तारीफ में पीएम और सीएम को लिखा पत्र।

अद्भुतः बच्चे के जन्म लेते ही 85 दिन बाद अचानक कोमा से बाहर आई मां
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करीब 85 दिन तक कोमा में रहने वाली एक गर्भवती महिला को उसके नवजात शिशु के साथ बचाने में डॉक्टरों ने बड़ी कामयाबी हासिल की है।

पुणे की रूबी हॉल क्लीनिक में पिछले 20 मार्च से मध्य प्रदेश के बुरहानपुर की रहने वाली 32 वर्षीय गर्भवती महिला प्रगति साधवानी का इलाज चल रहा था।
लंबे समय तक कोमा में रहने के कारण परिजनों की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी थीं लेकिन आखिरकार डॉक्टरों ने महिला और उसके नवजात को बचा लिया।
परिजनों ने हॉस्पिटल की तारीफ में पीएम और मध्य प्रदेश के सीएम को भी पत्र लिखा है जिसकी जानकारी मिलने के बाद हॉस्पिटल ने महिला के इलाज के खर्च से भी परिजनों को राहत दे दी।

3.5 माह बेहोश गर्भवती हुई थी भर्ती

पिछले 8 वर्षों से डायबिटीज से पीड़ित प्रगति करीब साढ़े तीन महीने की प्रेगनेंट थीं जब उन्हें पिछली 5 मार्च को बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाया गया।
जहां न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रूस्तम वाडिया ने इलाज कराना शुरू किया। यहां पर 20 मार्च से प्रगति का इलाज चल रहा था। बाद में प्रसवपूर्व इलाज के लिए इसी अस्पताल में गाइनकॉलजिस्ट डॉ. सुनीता तेंदुलवाडकर की निगरानी में रखा गया।
प्रगति करीब 17 सप्ताह की प्रेगनेंट थीं जब डॉक्टरों की पूरी टीम ने उनके इलाज का पूरा खाका तैयार किया। डाइट से लेकर कई तरह की जांच और शुगर की मॉनिटरिंग के साथ हर स्तर पर सावधानी बरती गई। जिसके बाद ये रिजल्ट सामने आया। डॉ.सुनीता ने बताया, 'हॉस्पटिल में भर्ती होने के करीब 85 दिन बाद पहली बार प्रगति ने बात की। धीरे-धीरे उसमें सुधार आना शुरू हुआ और उसने आसपास के माहौल को समझना शुरू किया।'

ऐसे मामलों में कम मिलती है सफलता

प्रगति करीब 132 दिन तक हॉस्पिटल में भर्ती रहीं। इसमें से 22 दिन तो उसे हाई डिपेंडेंसी यूनिट में रखना पड़ा। बाद में सुधार को देखते हुए जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। डॉ. सुनीता ने बताया, 'प्रगति ने जुलाई अंत में 2.2 किलोग्राम के एक स्वस्थ बेबी गर्ल को जन्म दिया है। हमारी कोशिश यही थी कि मां और नवजात को किसी भी तरह का कोई संक्रमण न हो।
यह पूरी टीम की मेहनत है कि हम दोनों को बचा पाने में सफल रहे। प्रसूति एवं स्त्री रोग यूनिट के हेड प्रफेसर डॉ. रमेश भोसले ने बताया, 'ऐसे केस बहुत कम ही सफल हो पाते हैं। दरअसल, डायबिटीज के मरीजों में इलाज के दौरान संक्रमण का खतरा हमेशा ही बना रहता है।

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