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होली 2018: जहरीले गुलाल से बचने के लिए कल्याणी समूह बना रहा हर्बल गुलाल, जानें खासियत

उत्तराखंड के हल्द्वानी जिले के हरिनायकपुर गांव में कल्याणी स्व-सहायता समूह की महिलाएं होली के त्यौहार में प्रयोग होले वाले हर्बल बना रही हैं।

होली 2018: जहरीले गुलाल से बचने के लिए कल्याणी समूह बना रहा हर्बल गुलाल, जानें खासियत
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उत्तराखंड के हल्द्वानी जिले के हरिनायकपुर गांव में 'कल्याणी स्व-सहायता समूह' की महिलाएं होली के त्यौहार में प्रयोग होले वाले हर्बल गुलाल बना रही हैं। यह हर्बल गुलाल गुलाब, हल्दी, पालक और मैरीगोल्ड जैसे प्राकृतिक पदार्थों से बनाए जाते हैं।

कल्याणी स्वयं सहायता समूह का कहना है कि हर्बल रंग की भारी मांग न केवल उत्तराखंड में है बल्कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी इसकी काफी मांग रहती है।

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गौरतलब है कि होली को त्यौहार आने में कुछ ही दिन शेष बचे है और रंग-बिरंगे गुलाल दुकानों पर दिखने शुरू हो गए हैं। ऐसे में नकली और हमारी त्वचा के लिए हानिकारक रंग और गुलाल भी बाजारों में धड़ल्ले से बेचा जाता है जो कि काफी सस्ते दामों पर हमें मिल जाता है। लेकिन हम ये नहीं जानते कि चंद रुपये बचाने के चक्कर में हम अपनी जिन्दगी से ही खिल्वाड़ कर रहे हैं।

जहरीला गुलाल

रंगों के पर्व होली में लोग उत्साह से एक-दूसरे को रंग लगाते हुए शुभकामनाएं देते हैं, लेकिन कुछ रंग ऐसे होते हैं जो सेहत को नुकसान पहुंचा कर शुभकामनाओं को अर्थहीन तथा रंग पर्व को बदरंग बना देते हैं। मिलावटी रंगों के कारण होने वाला नुकसान कई बार घातक भी हो सकता है।
डॉक्टरों का कहना है कि सस्ती सामग्री से गुलाल बनाने के लिए कुछ निर्माता डीजल, इंजन ऑयल, कॉपर सल्फेट और सीसे का पाउडर आदि का इस्तेमाल करते हैं। इससे लोगों को चक्कर आता है, सिरदर्द और सांस की तकलीफ होने लगती है।
पर्यावरण संस्था ‘वातावरण’ की सुश्री विश्वास का कहना है कि कई बार रंगों में ऐसे रसायन मिले होते हैं जिनसे सेहत को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने बताया कि काले रंग के गुलाल में लेड ऑक्साइड मिलाया जाता है जो गुर्दों को प्रभावित कर सकता है। हरे गुलाल के लिए मिलाए जाने वाले कॉपर सल्फेट के कारण आंखों में एलर्जी, जलन, और अस्थायी तौर पर नेत्रहीनता की शिकायत हो सकती है।
डॉ. सुनीता मीणा कहती हैं ‘चमकीले गुलाल में एल्युमिनियम ब्रोमाइड मिलाया जाता है जो कैंसर उत्पन्न कर सकता है। नीले गुलाल में प्रूशियन ब्लू होता है जो त्वचा में एलर्जी और संक्रमण पैदा कर सकता है। लाल गुलाल के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला मरकरी सल्फाइट इतना जहरीला होता है कि इससे त्वचा का कैंसर हो सकता है।’

गुलाल और रंगों में मिलावट

अक्सर सूखे गुलाल में एस्बेस्टस या सिलिका मिलाई जाती है जिससे अस्थमा, त्वचा में सक्रंमण और आंखों में जलन की शिकायत हो सकती है। गीले रंगों में आम तौर पर जेनशियन वायोलेट मिलाया जाता है जिससे त्वचा का रंग प्रभावित हो सकता है और डर्मेटाइटिस की शिकायत हो सकती है।
जानकारी या जागरूकता के अभाव में अक्सर दुकानदार, खास कर छोटे दुकानदार इस बारे में ध्यान नहीं देते कि रंगों की गुणवत्ता कैसी है। कभी तो ये रंग उन डिब्बों में आते हैं जिन पर लिखा होता है ‘केवल औद्योगिक उपयोग के लिए।’

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