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यूपी पुलिस के कांस्टेबल की यह बात जरूर सुननी चाहिए, हम भी इंसान हैं- हमें भी जीने का हक है

गोमतीनगर में विवेक तिवारी की हत्या के बाद प्रदेश और राजनैतिक दोनों का माहौल गर्म है। हर कोई पुलिस पर सवाल खड़े करने में तुला है। इस मामले पर मैने यूपी पुलिस में अपने एक कांस्टेबल से बात की जानिए उन्होंने क्या कहा।

यूपी पुलिस के कांस्टेबल की यह बात जरूर सुननी चाहिए, हम भी इंसान हैं- हमें भी जीने का हक है
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गोमती नगर में विवेक तिवारी की हत्या के बाद प्रदेश और राजनैतिक दोनों का माहौल गर्म है। हर कोई पुलिस पर सवाल खड़े करने में तुला है। न तो कोई पुलिस से बात कर रहा है और न ही कोई पुलिस की सुन रहा है।
इस मामले पर मैंने उत्तर प्रदेश पुलिस में काम करने वाले एक कांस्टेबल मित्र से बात की। उन्होंने विवेक तिवारी के मामले में कोई टिप्पणी नहीं की। उन्होंने यह भी कयास नहीं लगाया कि क्या हो सकता है या क्या हुआ होगा। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि बेवजह कोई भी पुलिस वाला किसी पर गोली नहीं चलाएगा।
उन्होंने अपनी एक आपबीती घटना सुनाई जो हमें जाननी चाहिए। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले वह यूपी के गोंडा-बहराइच हाइवे पर कार से अपने परिवार के संग जा रहे थे। यही कोई रात 10 साढ़े दस का समय रहा होगा।
थोड़ी दूर रास्ते में दो बाइक सवार उनके आगे पूरी सड़क पर कब्जा करके चल रहे थे। उन्होंने हार्न बजाया लेकिन वो नहीं हटे। उन्हें लगा दोनों नशे में होंगे इसलिए उन्होंने दोनों बाइकसवारों को ओवरटेक किया और आगे निकल गए।
उनके मुताबिक 1 मिनट से भी कम समय में उनके ऊपर फायरिंग शुरू हो गई। उनकी गाड़ी पर कई गोलियां चलीं। किस्मत अच्छी थी कि गोली किसी को लगी नहीं। उन्होंने गाड़ी भगाई और पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने रास्ते में चेकिंग लगाई। लेकिन दोनों बाइकसवार न जाने कहां गायब हो गए।
इतनी बात बताने के बाद वो थोड़ा चुप रहे, उन्होंने मुझसे पूछा कि इस हालत में मुझे क्या करना चाहिए था? क्या किसी प्रोटोकाल का इंतजार करना चाहिए था? या जब गोलियां चल रही हों तब मैं अपने पुलिस ट्रेनिंग को याद करता?
उस समय तो बस मुझे अपने और अपने परिवार की फिक्र थी, अगर मेरे पास बंदूक होती तो शायद मैं गोली चला देता। अपने और अपने परिवार की आत्मरक्षा के लिए शायद मुझसे कत्ल भी हो जाता। तो क्या आप उसके लिए पूरे पुलिस डिपार्टमेंट को कटघरे में खड़ा कर देते। क्रिमिनल मनबढ़ हो चुके हैं।उन्हें लगता है कि वो कुछ भी करें किसी न किसी तरह जेल से बाहर आ जाएंगे।

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उन्होंने मुझसे कहा कि विवेक तिवारी के साथ जो हुआ वो दुखद है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की आप कांस्टेबल की बात सुनेंगे ही नहीं। पूरे डिपर्टमेंट को कटघरे में खड़ा कर देंगे। जांच हो रही है, अपने डिपार्टमेंट की बड़ाई करते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस जांच में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। अगर कांस्टेबल दोषी होगा तो अदालत उसे सजा देगी। लेकिन इस घटना के कारण आप पुलिस से तो अपना विश्वास नहीं हटा सकते।
आप लोग (मीडिया) तो किसी भी आदमी का मीडिया ट्रायल करने पर तुले रहते हैं। जबकि बरेली में अपनी ड्यूटी कर रहे पुलिस वाले को पशु तस्कर कुचल देते हैं उस समय मीडिया शांत रहती है।
हम पुलिस वाले हर किसी की गाली खा रहे हैं। मीडिया की भी, नेता की भी और जनता की भी। जबकि इनमें से किसी का भी काम बिना पुलिस के नहीं चलने वाला। हमारे भी परिवार हैं, हम भी सोचते हैं कि ड्यूटी करके वापस अपने घर जाकर बच्चे से मिलें। पुलिस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है। आपको नहीं लगता हम भी इंसान हैं और हमें भी जीने का हक है।
उनकी इस बात को काटने के लिए मैं कोई भी तर्क नहीं देना चाहता था। लेकिन मैं इतना जरूर बताना चाहता हूं कि पुलिस पर से जनता का विश्वास नहीं हटता है। अगर ऐसा होता तो पुलिस की ज्यादती की शिकायत हम पुलिस से न कर रहे होते।
अंधियारी रात में जब चारों और खौफ फैला रहता है तो एक सिपाही को भी देखकर साहस आ जाता है। पुलिस के पेट्रोलिंग की गाड़ी देखकर क्रिमिनल आज भी भागते हैं और आम नागरिक अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं।
हर त्योहार पुलिस के बल पर होते हैं। बारिश, गर्मी, बरसात में पुलिस काम करती है और पुलिस के इस सेवा की देश का हर नागरिक सम्मान करता है।

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