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इस यूनिवर्सिटी में गरीब छात्रों को मिलती है दो लाख रूपए में डिग्री, लेकिन एडमिशन होता है फ्री

देश में शिक्षा की व्यवस्था की स्थिति और भी लचर होती जा रही है। हमारे केंद्र और राज्य सरकार सिर्फ सर्वशिक्षा अभियान के नारे लगा रहे है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने वाली तस्वीरों को लगातार नकार रहे हैं।

इस यूनिवर्सिटी में गरीब छात्रों को मिलती है दो लाख रूपए में डिग्री, लेकिन एडमिशन होता है फ्री
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देश में शिक्षा व्यवस्था की स्थिति और भी लचर होती जा रही है। हमारे केंद्र और राज्य सरकार सिर्फ सर्वशिक्षा अभियान के नारे लगा रहे हैं। लेकिन शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने वाली तस्वीरों को लगातार नकार रहे हैं।

जब देश के सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इतनी कमियां और घपलेबाजी होती है तो आप सोच सकते हैं कि प्राइवेट स्कूलों और विश्वविद्यालयों में कितनी घपलेबाजी होती होगी।

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प्राइवेट स्कूल और विश्वविद्यालय मनमाने तरीके से छात्रों को दखिला देते हैं। जरूरत से ज्यादा छात्रों से फीस की उगाही की जाती है। हालांकि सरकार ने गरीब, दलित और पिछड़ों छात्रों के दाखिले कि लिए प्राइवेट स्कूलों और विश्वविद्यालयों में दिशा निर्देश दे रखे हैं, लेकिन ये निजी स्कूल और विश्वविद्यालय प्रशासन सरकारी नीतियों की धज्जियां उड़ाकर इन छात्रों के साथ भी धोखाधड़ी कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से एक ऐसा ही एक मामला सामने आया है। मुरादाबाद स्थित तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय(टीएमयू) में गरीबी कोटे और कैटेगरी से आने वाले छात्रों के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन धोखाधड़ी करता है।

गरीब छात्रों के साथ धोखाधड़ी

टीएमयू में पढ़ने वाले छात्र बताते है कि विश्वविद्यालय गरीब, पिछड़े और दलित छात्रों का दाखिला तो सरकार की नीतियों के तहत मुफ्त में ले लिया जाता है, लेकिन कोर्स की पढ़ाई का खर्चा बहुत है।

इसके अलावा छात्रों ने का कहना है कि मुफ्त में दखिला तो दे दिया जाता है लेकिन जब छात्र पास होकर डिग्री लेने जाते है तो उनसे कोर्स के हिसाब से फीस वसूली जाती है। अगर छात्र फीस नहीं भरते हैं तो उनकी डिग्री रोक ली जाती है। साल और समय बर्बाद होने के डर से गरीब, दलित और पिछड़े छात्र कर्जा लेते हैं और उसके बाद फीस जमा कर अपनी डिग्री लेते हैं।

जो छात्र फीस नहीं जमा कर पाता तो उसे आगे जॉब के लिए कई कठिनाईओं का सामना करना पड़ता है। नौकरी देने वाली कंपनी योग्यता का प्रमाण मांगती है, योग्यता पत्र न होने पर कंपनी उन छात्रों की योग्यता पर सवाल उठाती है।

एक पूर्व छात्र ने बताया

टीएमयू के एक पूर्व छात्र ने हरिभूमि को बताया कि 2013-16, 2012-16, 2011-15 तक के बैच में सैकड़ों छात्रों ने एडमिशन लिया और आखिरी सेमिस्टर तक अपनी पढ़ाई पूरी कर ली फिर उसके बाद असली खेल शुरू हुआ। उनको स्नातक डिग्री देने के नाम पर उनसे कोर्स के हिसाब से 50,000 से लेकर 2,00,000- 3,00,000 रुपये तक की मांग की गई।

पूर्व छात्र ने आगे कहा कि उन सभी दलित छात्रों में कोई गरीब किसान का बेटा है तो कोई मजदूर का। कुछ तो ऐसे हैं जिनके खानदान से कोई पहली बार बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने, डिग्री पूरी करने गया था, तो ऐसी स्थिति में क्या वे इतनी मोटी रकम चुका पाएंगे?

न जाने कितने छात्र अवसाद में हैं तो कितने बंद कमरों में रो रहे हैं। उनमें से अधिकतर छात्र डिग्री न होने के कारण न तो आगे की पढ़ाई कर पाए न ही नॉकरी, सिर्फ 10% का आँकड़ा होगा जिन्हें छोटी-बड़ी जॉब मिल गयी हो!

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