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सतत उपेक्षा और अपमान भी नहीं तोड़ सके ''मानबी'' का हौंसला, बनीं पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल

सामाजिक सोच है पिछड़ी- पहले मैं झारग्राम कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर नौकरी करती थी। वहां मुझे हटाने के लिए अन्य शिक्षकों द्वारा खूब षड़यंत्र रचे गए। मुझे वहां के स्टाफ क्वार्टर से निकाल दिया गया। लेकिन मैं कभी नहीं डरी और उसके बाद पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के विवेकानंद सतवार्षिकी महाविद्यालय में बतौर एसोसिएट प्रोफेसर ज्वाइन कर लिया। मैं ट्रांसजेंडर हूं, इसलिए मेरे साथ कॉलेज में एडमिनिस्ट्रेशन लेवल पर भी भद भाव हुआ। मैंने 2006 में पीएचडी की, उसके बाद 2011 तक मुझे कोई इंक्रीमेंट नहीं दिया गया।
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