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सतत उपेक्षा और अपमान भी नहीं तोड़ सके ''मानबी'' का हौंसला, बनीं पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल

देश की पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल की दास्तान

सतत उपेक्षा और अपमान भी नहीं तोड़ सके
नदिया. पश्चिम बंगाल के विवेकानंद सतवार्षिकी महाविद्यालय में बांग्ला की एसोसिएट प्रोफेसर मानबी बंद्योपाध्याय ने विगत 9 जून को नदिया जिले के कृष्णानगर महिला कॉलेज में बतौर प्रिंसिपल ज्वाइन किया है। अपने देश की वह पहली ट्रांसजेंडर हैं, जिन्होंने ऐसा प्रतिष्ठित पद हासिल किया है। लेकिन यहां तक पहुंचने से पहले उन्हें किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, कैसे उन्होंने जेंडर चेंज कराने का साहस बरा फैसला लिया और अब वह आगे क्या करना चाहती हैं? यह सब हरिभूमि को बता रही हैं खुद मानबी बंद्योपाध्याय

हालांकि भारत में कानूनी तौर पर थर्ड जेंडर को मान्यता मिल गई है, लेकिन भारतीय समाज ने अभी तक तीसरे लिंग वर्ग (थर्ड जेंडर कम्युनिटी) को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। आज भी थर्ड जेंडर को समाज में तिरस्कार और उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है’, यह कहना है देश की पहली ट्रांसजेंडर मानबी बंद्योपाध्याय का, जो हाल में ही पश्चिम बंगाल के एक कॉलेज की प्रिंसिपल बनाई गई हैं।
लगभग 35 सालों के लंबे संघर्ष के बाद उन्हें लगा कि अब जाकर उन्हें समाज में एक सम्मानजनक स्थान मिला है। इतना ही नहीं हाल में ही मानबी को पश्चिम बंगाल सरकार ने ट्रासजेंडर विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष भी नियुक्त किया है। उन्होंने विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में अपने संघर्ष के बूते यह मुकाम कैसे हासिल किया, मानबी बंद्योपाध्याय बता रही हैं अपनी जुबानी।

शुरुआती जीवन

मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के नैहाटी कस्बे में 25 सितंबर 1964 को पुत्र के रूप में हुआ। मेरा नाम सोमनाथ था। लेकिन जैसे-जैसे मैं 5-6 साल की हुई तो मुझे लड़कियों के कपड़े पहनना अच्छा लगने लगा। स्कूल में भी मैं लड़कियों के खेल खेलना पसंद करती थी। घर में मेरे अलावा दो बहनें और थीं। मुझे बहनों के कपड़े पहनने का मन होता, मगर मां डांट देतीं, फिर भी मैं छिपकर उनके कपड़े पहन लेती, कपड़े पहनकर मेरी आत्मा तृप्त-सी हो जाती। मैं खुद को पूर्ण महसूस करती, लेकिन परिवार वालों को यह बात बहुत अच्छी नहीं लगती। मेरी ऐसी आदत पर कई बार पिताजी ने मेरी पिटाई भी की। मुझे हमेशा लगता कि मैं लड़का नहीं लड़की हूं और लड़का होने का बोझ ढो रही हूं। कई बार तो इतना परेशान हो जाती कि मन करता इन सबको छोड़कर कहीं दूर भाग जाऊं।

सब बनाते थे मजाक

जब मैं स्कूल में पढ़ती थी तो कोई मुझसे दोस्ती नहीं करता था। अगर किसी दिन मैं स्कूल नहीं जाती तो कोई मुझे बीते दिन की पढ़ाई के बारे में नहीं बताता था। पहले तो मुझे बहुत खराब लगता था, लेकिन यहीं से मुझे एक सकारात्मक ऊर्जा भी मिली। मैंने दूसरों पर आश्रित होना छोड़ दिया, दूसरे बच्चों से पूछना छोड़ दिया। अगर स्कूल नहीं भी जाती तो भी खुद ही पढ़ाई करती, इसका परिणाम यह हुआ कि मैं कक्षा में अव्वल आने लगी।

ग्रेजुएशन में दाखिला लेने के बाद भी क्लासमेट्स मेरा मजाक बनाते थे। एक बार तो मुझे मेरे सहपाठियों ने कमरे में बंद तक कर दिया। अब तक भी मैं घुट-घुट कर जी रही थी, क्योंकि पोशाक मुझे लड़कों की पहननी होती थी, जो मुझे बिल्कुल भी पंसद नहीं था।

-नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए, मानवी की पूरी कहानी -

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