पंकज गुप्ते - बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि जब किसी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामला न्यायालय में लंबित हो, तो उसी विषय पर विभागीय जांच समानांतर रूप से संचालित नहीं की जा सकती। यह फैसला बलौदाबाजार सिविल लाइन थाना में पदस्थ कांस्टेबल पीके मिश्रा की याचिका पर सुनाया गया।
कांस्टेबल ने लगाई थी याचिका
कांस्टेबल पीके मिश्रा ने याचिका में कहा था कि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन इसी बीच विभाग ने समान मुद्दों पर विभागीय जांच भी शुरू कर दी है।
याचिकाकर्ता ने दिए तर्क
दोनों जांचें एकसाथ चलना न्यायसंगत नहीं है।
आपराधिक मामले के तथ्यों और विभागीय जांच के बिंदु समान हैं।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले भी समानांतर जांचों को अनुचित बताते हैं।
इन बिंदुओं को आधार बनाकर विभागीय जांच पर रोक की मांग की गई थी।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, विभागीय जांच पर रोक
मामले की सुनवाई जस्टिस पीपी साहू की सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने माना कि, यदि आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच के मुद्दे एक जैसे हों, तो दोनों कार्रवाई साथ नहीं चल सकतीं। विभागीय जांच से आपराधिक मामले की सुनवाई प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया पर रोक लगा दी।
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कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण फैसला
HC का यह आदेश भविष्य में उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जहां सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक केस और विभागीय जांच एक साथ शुरू कर दी जाती हैं। यह फैसला दोहराता है कि, न्यायिक प्रक्रिया सर्वोपरि है और विभागीय कार्रवाई को इससे ऊपर नहीं रखा जा सकता।