बलौदा बाजार में इस साल होली मिलन समारोहों की ऐसी बाढ़ आई है कि, लोग कन्फ्यूज हैं — रंग लगाने जाएं या रणनीति बनाने?

कुश अग्रवाल- बलौदा बाजार। बलौदा बाजार में इस बार होली के रंग कुछ ज्यादा ही चटक नजर आए। फर्क बस इतना था कि, गुलाल के पैकेट पर अब “केमिकल फ्री” के साथ-साथ “पॉलिटिकली एक्टिव” भी लिखा होना चाहिए। बाजारों में पिचकारियां कम और बयानबाजी की फुहार ज्यादा चल रही है। होली मिलन समारोहों की ऐसी बाढ़ आई है कि लोग कन्फ्यूज हैं — “रंग लगाने जाएं या रणनीति बनाने?”

रंग लगाओ और समीकरण बनाओ” योजना 2026 

  • इस बार का नया ट्रेंड है — पहले फोटो, फिर फीलिंग्स।
  • नेता जी किसे गुलाल लगाएंगे, यह अब भावनात्मक नहीं, रणनीतिक फैसला हो गया है। कार्यकर्ताओं का फोकस रंग से ज्यादा कैमरे पर है। जैसे ही गुलाल लगेगा, तुरंत कैप्शन तैयार — “जनता के साथ खुशियों के रंग में।”
  • जनता सोच रही है — “हमारे साथ खुशियां हैं या सिर्फ फोटो?”

“गुलाल में छिपी रणनीति”

  • जिला पंचायत द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह तो मानो शक्ति प्रदर्शन का लाइव टेलीकास्ट था। पूरे शहर में फ्लेक्स ऐसे लगे थे जैसे चुनाव की अधिसूचना जारी हो गई हो।
  • मगर असली रंग तब फीका पड़ा जब सत्ता पक्ष के ही कई सदस्य कार्यक्रम से गायब मिले। लोग पूछ रहे हैं — “ये होली मिलन था या गुटों का साइलेंट प्रदर्शन?”
  • शहर के एक बड़े जनप्रतिनिधि को निमंत्रण सूची से दूर रखने की चर्चा ने तो गुलाल में बारूद मिला दिया। अब गलियारों में सवाल घूम रहा है —
  • “बुरा न मानो होली है… पर बुलाना तो चाहिए था!”
  • “किस पार्टी के रंग में कौन रंगेगा?”
  • बीजेपी ने तो पहले ही अपने दो-दो होली मिलन कार्यक्रम घोषित कर दिए — एक वार्मअप, दूसरा फाइनल मैच।
  • उधर कांग्रेस अभी रणनीतिक मौन में है। नवनियुक्त जिला अध्यक्ष अपने पत्ते छिपाए बैठे हैं। कार्यकर्ता सोच रहे हैं — “हम भी कुछ रंग डालें या ऊपर से आदेश आएगा?”
  • अब हालत यह है कि शहर में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दिखाने के लिए होली मिलन समारोह आयोजित करना मजबूरी बन गया है।
  • जिसने कार्यक्रम नहीं किया, समझो वो “ड्राई डे” पर है।

“रंगों में घुली सियासत”

  • कहते हैं होली गिले-शिकवे मिटा देती है।
  • लेकिन यहां तो रंग सूखते ही पुरानी फाइलें खुल जाती हैं।
  • जो नेता कल तक मंच साझा नहीं करते थे, आज एक-दूसरे को मिठाई खिला रहे हैं — और मन ही मन सोच रहे हैं, “अगली बार टिकट किसे मिलेगा?”
  • शहर के प्रथम नागरिक के इस बार कुछ कार्यक्रमों से दूरी बनाने की खबर ने अफवाह बाजार को और गरमा दिया है। चर्चा है कि वे सिर्फ “विशेष मंच” पर ही रंग स्वीकार करेंगे। आखिर VIP गुलाल भी तो अलग होता है!
  • “कलेक्टर साहब भी रंग में रंगे?”
  • हाल ही में पदभार संभालने वाले कुलदीप शर्मा अगर किसी होली मिलन में नजर आ जाएं तो प्रशासनिक रंगत और गहरी हो सकती है।
  • अधिकारी भी सक्रियता दिखाने में पीछे नहीं — फाइलें भी रंगीन और मीटिंग्स भी ताबड़तोड़।
  • कलेक्टर साहब जिस रफ्तार से बैठकों की पिचकारी चला रहे हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में “काम का रंग” चढ़ने वाला है।

“राज्यसभा के रंग: दिल्ली वाला गुलाल”

  • राजनीतिक गलियारों में गौरी शंकर अग्रवाल के राज्यसभा जाने की चर्चा ने पहले ही कई समर्थकों को एडवांस होली खेलने पर मजबूर कर दिया था।
  • बधाइयां बांटी जा चुकी थीं, मिठाइयां खाई जा चुकी थीं।
  • लेकिन “दिल्ली वाला गुलाल” कुछ ऐसा उड़ा कि कई चेहरे एकदम फीके पड़ गए।
  • अब चर्चा यह है कि जातीय समीकरण की पिचकारी किस दिशा में चली और किसने आखिरी वक्त पर रंग बदल दिया। राजनीति में रंग बदलना गिरगिट का गुण नहीं, आवश्यकता बन चुका है।

“नेताओं की होली स्पेशल डिमांड”

  • होली के दूसरे दिन नेताजी के साथ “फूलों वाली होली” का आयोजन प्रस्तावित है। अंदरूनी खबर है कि पिछले विवाद के कारण एक दौरा कैंसिल हुआ था, इसलिए इस बार सुरक्षा से ज्यादा रणनीति पर ध्यान है।
  • अब देखना यह है कि गुरुवार को नेताजी नगाड़े की धुन पर फाग सुनने पहुंचेंगे या फिर कोई नया “कारणवश स्थगित” संदेश आ जाएगा।

अंतिम फाग

  • कुल मिलाकर, बलौदा बाजार की होली इस बार सिर्फ रंगों की नहीं, रिश्तों और समीकरणों की भी है।
  • यहां गुलाल से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि
  • “किसे कितना रंग लगाया गया — और किसे सूखा छोड़ दिया गया!”
  • बुरा न मानो…
  • यह बलौदा बाजार है, यहां होली भी खबर बनकर खेली जाती है।