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Sunday Special में पढ़िए ऐसे खिलाड़ियों की कहानियां जो बदल देंगे आपके जिंदगी जीने का नजरिया

आज हम आपको जिनके बारे में बताने जा रहे हैं, उन्होंने ना सिर्फ जिन्दगी की कठिनाइयों (Difficulties Of Life) से पार पाया है बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणास्त्रोत (Inspiration) बने हैं।

खिलाड़ियों के जीवन के संघर्ष की कहानियां
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sunday special में खिलाड़ियों की कहानियां 

Sunday Special

'खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले

खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है'

अल्लामा इक़बाल की ये चंद लाइनें खेल जगत के उन मशहूर हस्तियों (Famous Celebrities) पर सटीक बैठती हैं जिन्होंने जिंदगी (Life) की मुश्किल परिस्थितियों (Difficult Situation) में हार नहीं मानी है। यही नहीं इन हस्तियों (Celebrities) ने दूसरों को भी जीने का सलीका सिखाया है। आज के युवा छोटी-छोटी मुश्किलें आने पर डर कर अपनी जिंदगी खत्म कर देते हैं, लेकिन आज हम आपको जिनके बारे में बताने जा रहे हैं, उन्होंने ना सिर्फ जिन्दगी की कठिनाइयों (Difficulties Of Life) से पार पाया है बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणास्त्रोत (Inspiration) बने हैं।

1- पैरा-एथलीट दीपा मलिक


अक्सर खेल जगत में उम्र की सीमा होती है। लेकिन हरियाणा (Haryana) के सोनीपत जिले (Dist. Sonipat) में पैदा हुईं, भारत की पहली महिला (India's First Women) पैरालंपिक (Para athletic) पदक विजेता दीपा मलिक (Deepa malik) के लिए ये उम्र सीमा उनके सपनों के बीच कभी नहीं आई। 30 की उम्र में तीन ट्यूमर सर्जरीज और शरीर का निचला हिस्सा सुन्न हो जाने के बावजूद दीपा ने न केवल शॉटपुट और ज्वलीन थ्रो में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीते हैं, बल्कि तैराकी और मोटर रेसलिंग में भी कई स्पर्धाओं में हिस्सा लिया है। उन्होने भारत की राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 33 स्वर्ण और 4 रजत पदक प्राप्त किये हैं। यहीं नहीं रियो पैरालिंपिक खेल- 2016 में दीपा मलिक ने शॉट-पुट में रजत पदक जीता, दीपा ने 4.61 मीटर तक गोला फेंका और दूसरे स्थान पर रहीं। पैरालिंपिक खेलों में मेडल जीतने वाली दीपा पहली भारतीय महिला बन गई हैं।

2. 'ढिंग एक्सप्रेस' हिमा दास


हिमा दास (Hima Das) को ढिंग एक्सप्रेस, उड़नपरी, स्वर्ण परी के नामों की उपाधी ऐसे ही नहीं मिली। हिमा की जिंदगी में कई कठिनाइयां आई लेकिन वह हारी नहीं। उन्होंने असम के एक गांव से यहां तक का सफर तय किया। हिमा की इस सफलता के पीछे उनकी लगन, कड़ी मेहनत और हिम्मत है। वह असम में धान की खेती करने वाले एक साधारण किसान की बेटी हैं। यहीं नहीं वह रेसिंग ट्रैक पर कदम रखने से पहले लड़कों के साथ फुटबॉल खेला करती थीं और मैदान पर अपनी फुर्ती, दमखम और स्किल से उनको छका देती थीं। जवाहर नवोदय विद्यालय के पीटी टीचर ने उन्हे रेसर बनने की सलाह दी। लेकिन पैसों की कमी की वजह से उनके पास अच्छे जूते भी नहीं थे। स्थानीय कोच निपुन दास की सलाह मानकर जब उन्होंने जिला स्तर की 100 और 200 मीटर की स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता तो कोच भी हैरान रह गए। जिसेक बाद वह हिमा को लेकर गुवाहाटी आ गए। हालांकि, हिमा का परिवार उनकी कोचिंग का खर्चा उठाने में असमर्थ था तो करियर के शुरुआत में उनके कोच निपोन ने ही उनकी काफी मदद की। इसके बाद हिमा ने कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। वहीं, हिमा पहली ऐसी भारतीय महिला बनीं जिसने वर्ल्ड ऐथलेटिक्स चैंपियनशिप ट्रैक में गोल्ड मेडल जीता है। हिमा ने 400 मीटर की रेस 51.46 सेकंड में खत्म करके यह रेकॉर्ड अपने नाम किया था।

3. 'गोल्ड मेडलिस्ट' अर्पिंदर सिंह

पुरुषों की त्रिकूद (ट्रिपल जंप) के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक और एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाले अर्पिंदर सिंह (Arpinder Singh) का बचपन काफी मुश्किलों में बीता है। अर्पिंदर सिंह की जिंदगी में भी काफी उतार चढ़ाव आए। उनके पिता जगबीर सिंह भारतीय फौज में हवलदार थे। कोई और आय का साधन ना होने के कारण अर्पिंदर के पिता ने उनकी ट्रेनिंग के लिए अपनी ढ़ेड बीघा जमीन से कर्जा लिया। मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई। इन सब के बाद अर्पिंदर के पिता पर 5 लाख तक का कर्जा हो गया। यहां तक की उन्हें एक दिन का खाना भी बड़ी मुश्किलों से नसीब होता था, लेकिन अर्पिंदर इन कठिनाइयों से घबराए नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। और आखिरकार 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में उनकी ये मेहनत रंग लाई और उन्होंने देश के लिए कांस्य पदक जीता। वहीं इसके बाद अर्पिंदर ने एक के बाद एक उपलब्धि हासिल की और 2018 के एशियन गेम्स में देश के लिए गोल्ड मेडल जीता।

4. 'महेंद्र सिंह धोनी' आसान नहीं था क्रिकेट का सफर


भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी (mahendra singh dhoni) ने छोटे शहर से निकल कर क्रिकेट की बड़ी-बड़ी बुलंदियों को छूने के लिए एक बहुत ही संघर्ष पूर्ण सफर तय किया। कहते हैं कि, जुलाई 1981 को झारखंड के रांची में पैदा हुए महेंद्र सिंह धोनी (mahendra singh dhoni) ने जिसे भी छुआ वो सोना बन गया, ये धोनी ही थे जिन्होंने अनहोनी को होनी कर दिया। दरअसल एमएस धोनी की कप्तानी में भारतीय टीम ने 28 साल बाद साल 2011 में देश को वर्ल्डकप जीताया। हालांकि उनके करियर का शुरूआती सफर उतना आसान नहीं था। 2001 में उन्होंने पश्चिम बंगाल के खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर टिकेट कलेक्टर की सरकारी नौकरी की, लेकिन उनका असली सपना क्रिकेट में जाना ही था। उन्हें सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली जब 2003 में उन्हें भारतीय टीम में चुन लिया गया और वो त्रिकोणीय सीरीज खेलने केनिया गए। यहां पाकिस्तान की टीम भी आई थी। इस सीरीज में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। इन सब के बाद एमएस धोनी ने अपने 15 साल के करियर को विराम देकर पिछले साल 15 अगस्त को सन्यास ले लिया। हालांकि, वह आईपीएल टूर्नामेंट से जुड़े हुए हैं। और चेन्नई सुपर किंग्स टीम की कमान संभाले हुए हैं।

5. फुटबॉल खिलाड़ी सुनील छेत्री


महज 17 साल की उम्र में सुनील छेत्री (Sunil Chetri) ने अपना फुटबॉल करियर दिल्ली से 2001 में शुरू किया। एक साल बाद ही उनकी प्रतिभा को मोहन बागान ने समझा और उन्हें अपने साथ शामिल कर लिया। उस दिन से सुनील के पेशेवर फुटबॉल जीवन का आरंभ हुआ और फिर क्या था उन्होंने कभी पीछे मूड के नहीं देखा। पहले समय में भारत में दूसरे देशों की तरह फुटबॉल का उतना क्रेज नहीं था, लेकिन सुनील छेत्री एक ऐसे खिलाड़ी हैं। जिन्होंने युवाओं में फुटबॉल के प्रति उत्साह जगाया। और यही वजह है कि उनके द्वारा चलाए गए कई अभियान और पहल के बाद भारतीय फुटबॉल की स्थिति में सुधार आया है। इसी के चलते 2018 में मुंबई में इंटरनेशनल कप के दौरान 10,500 क्षमता वाले फुटबॉल मैदान में लगभग 2000 तक लोग शामिल हुए।

6. 'स्वप्ना बर्मन' हेप्टाथलन में जीता स्वर्ण


2018 के एशियन गेम्स में देश के लिए हेप्टाथलन में स्वर्ण पदक लाने वाली पहली भारतीय स्वप्ना बर्मन (Swapna Barman) ने जीवन में काफी संघर्ष किया है। बता दें कि, वह 29 अक्टूबर 1996 को एक ऐसे परिवार में जन्मीं जो भारत की गरीबी रेखा से नीचे आता था। 2013 में पिता के आघात (Stoke) के बाद परिवार की जिम्मेदारी स्वप्ना के कंधों पर आ गई। इसके बाद उन्हें अपनी चोटों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों या खेलों में मजबूरी में भाग लेना पड़ता था क्योंकि जीत के बाद पुरस्कार राशि से परिवार का लालन पालन कर सके। वहीं, उनके जीवन का संघर्ष 2017 तक चला जब उन्हें Port GoSports 'फाउंडेशन द्वारा राहुल द्रविड़ एथलीट मेंटरशिप प्रोग्राम 'के माध्यम से छात्रवृत्ति और ONGC द्वारा एक नियमित वजीफा मिलना शुरू हुआ।

7. 'रवि बिश्नोई' IPL कॉन्ट्रैक्ट के लिए की मजदूरी


आईपीएल (IPL) एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां युवा खिलाड़ियों को मौका मिलता है। राजस्थान के 20 साल के लेग स्पिनर रवि बिश्नोई (Ravi Bishnoi) भी इन युवा खिलाड़ियों में से एक हैं। जिन्होंने जोधपुर (Jodhpur) में ट्रेनिंग (training) के लिए मजदूरी (labourer) तक की। मजदूरी से लेकर आईपीएल (IPL) का कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने तक का उनकी जिंदगी का सफर हर उभरते खिलाड़ी के लिए प्रेरणादायक है। इसके साथ ही वो पिछले साल अंडर-19 वर्ल्ड कप (Under-19 World Cup) में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। उनके इसी प्रदर्शन के बाद उन्हें पंजाब किंग्स (Punjab Kings) ने आईपीएल नीलामी (IPL Auction) में दो करोड़ की मोटी रकम देकर टीम में शामिल किया था। वह अपने सफर के बारे में बताते हैं कि उनके परिवार में कोई भी इस खेल से जुड़ा नहीं था। आर्थिक हालात भी ऐसे नहीं थे कि किसी क्लब में ट्रेनिंग ले पाएं, लेकिन खेल के लिए इतना जुनून था कि उसकी बदौलत ही वो यहां तक पहुंचे हैं।

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