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जीते थे 3 गोल्ड मेडल, अब मिलती है 300 रु, पेंशन

कौशलेंद्र सिंह ने इंटरनैशनल अबिलिंपिक्स खेलों में भारत के लिए तीन गोल्ड मेडल जीते थे।

जीते थे 3 गोल्ड मेडल, अब मिलती है 300 रु, पेंशन
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शाहजहांपुर. ओलंपिक में मेडल जितने वाले खिलाड़ियों पर सरकार की ओर से इनामों की बौछारों की जा रही है। वहीं बीते दिनों के कुछ खिलाड़ी और कोच अपने गुजारे के लिए महज 300 रुपिए की पेंशन पर निर्भर है। सरकार द्वारा इन खिलाड़ियों पर की गई इनामों की बौछार ने इन लोगों की आर्थिक स्थिति को तो मजबूत कर दिया है लेकिन कौशलेंद्र सिंह के लिए कुछ नहीं बदला है।
शाजहांपुर के जलालाबाद में अपने भाई के साथ रहने वाले कौशलेंद्र अब 51 साल के हो चुके हैं। वह 16 साल के थे जब उन्होंने पहले इंटरनैशनल अबिलिंपिक्स खेलों में भारत के लिए तीन गोल्ड मेडल जीते थे। 1981 में जापान की राजधान टोक्यो में हुए इन खेलों में उन्होंने 1500 मीटर और 100 मीटर व्हीलचेयर में सोने का तमगा हासिल किया था। इसके साथ ही 100 मीटर की बाधा दौड़ में भी सिंह ने गोल्ड मेडल जीता था। 1982 में हॉन्ग कॉन्ग फार ईस्ट ऐंड साउथ पेसिफिक खेलों में उन्होंने सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल जीता था।
यह वह वक्त था जब अबिलिंपिक्स, जिसे आज क्राफ्ट और लाइफस्टाइल से जुड़ी प्रतिस्पर्धा के तौर पर देखा जाता है, में विकलांगों के लिए खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं। बता दें कि सिंह ने राष्ट्रीय स्तर पर भी कई पदक हासिल किए हैं।
इस सबके बावजूद सिंह को केवल महीने की 300 रुपये की पेंशन मिलती है और वह पूरी तरह अपने छोटे भाई पर निर्भर हैं। उन्होंने राज्य सरकार से कई बार मदद की गुहार लगाई पर वह अनसुनी कर दी गई। कौशलेंद्र जलालाबाद में अपने भाई तीरथराज के साथ अपने पुश्तैनी घर में रहते हैं। शारीरिक अक्षमता के कारण उनका कभी विवाह नहीं हो पाया लेकिन परिवार ने प्यार में किसी तरह की कोई कमी नहीं रखी। आज पैरालिंपिक मेडल विजेताओं को पुरस्कार राशि मिलते देख वह उदास महसूस करते हैं क्योंकि अपनी पेंशन के लिए उन्हें 20 साल तक मशक्कत करनी पड़ी।
उन्होंने कहा कि नेताओं ने हर बार उनसे झूठा बादा किया है। लोगों ने उनका काम अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है और फिर उन्हें भूल गए हैं। सिंह ने कहा कि अब उन्होंने सरकार की ओर से किसी मदद की उम्मीद ही छोड़ दी है। उन्होंने कहा, 'इस देश को मेडल की इच्छा है और अगर मुझे मौका दिया जाए तो मैं युवा ऐथलीट्स की काफी मदद कर सकता हूं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित करने के बावजूद मुझे मौका कौन देगा।'
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