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युवराज का संन्यास : जितनी कामयाबी बटोरी आखिर में उससे ज्यादा नाकामियां लगी हाथ, कीर्तिमान आएंगे हमेशा याद

21वीं शताब्दी के शुरुआत में भारतीय टीम की फिल्डिंग औसत दर्जे की थी। उड़कर या ड्राइव मारकर कैच पकड़ना हम ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका का काम समझते थे। युवराज की फुर्ती ने टीम को सिखाया कि अब बदलने का समय है और इस बदलाव में जो साथ चलेगा वो टिकेगा बाकी बाहर जाएंगे।

युवराज का संन्यास : जितनी कामयाबी बटोरी आखिर में उससे ज्यादा नाकामियां लगी हाथ, कीर्तिमान आएंगे हमेशा याद

युवराज ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया। लॉग आन के ऊपर से जड़े गगनचुम्बी छक्के, अम्पायर के सिर के ठीक ऊपर से जड़ा चौका, प्वाइंट और गली में पकड़े शानदार कैच उनके साथ ही मैदान से सीधे इतिहास में दर्ज हो जाएंगे। एक बात जो युवराज को खल रही होगी वो ये कि वह सरताज बनकर क्रिकेट को अलविदा न कह पाए।

युवराज ने भारतीय क्रिकेट को बहुत कुछ दिया। सौरभ गांगुली की कप्तानी में क्रिकेट कैरियर की शुरुआत करने वाले पंजाब के इस बल्लेबाज ने अगले 10 साल पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेलता गया, मारता गया और भारत को सिखाता गया।

21वीं शताब्दी के शुरुआत में भारतीय टीम की फिल्डिंग औसत दर्जे की थी। उड़कर या ड्राइव मारकर कैच पकड़ना हम ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका का काम समझते थे। युवराज की फुर्ती ने टीम को सिखाया कि अब बदलने का समय है और इस बदलाव में जो साथ चलेगा वो टिकेगा बाकी बाहर जाएंगे।



युवराज को साथ मिला मो. कैफ का। दोनों ने मिलकर गली, कवर और एक्स्ट्रा कवर को पैक कर दिया। विपक्षी बल्लेबाज डरने लगे। वह बाहर निकलती गेंदो को दूर से ही नमस्ते कर लेते थे। दोनों खिलाड़ियों का 2002 में एक मैच हर क्रिकेट प्रेमी के दिमाग में बसा है।

इंग्लैंड की सरजमी पर नेटवेस्ट सीरीज के फाइनल में उसके द्वारा दिए तीन सौ से ज्यादा के लक्ष्य का पीछा करते हुए युवराज और कैफ ने रिकॉर्ड साझेदारी निभाई और टीम को जीत दिलाई थी जिसके बाद दादा ने लार्डस की बालकनी में टीशर्ट उतारकर जमकर लहराई थी।

युवराज 2005-6 में पाकिस्तान के खिलाफ जमकर रन बनाए थे। उन्होने उमर गुल, मोहम्मद समी से लेकर रावलपिंडी एक्सप्रेस के नाम से मशहूर शोएब अख्तर को मुल्तान और कराची के मैदानों में ठोके। लंका के चमिंडा वास की तो उन्होंने लंका लगा दी थी।

साल 2007 का टी-20 विश्व कप कौन भूल सकता है भला। फ्लिंटॉफ ने थोड़ी सी स्लेजिंग की। उसके बाद युवराज ने जो किया वो कीर्तिमान बन गया। स्टुअर्ट ब्रॉड की सभी गेंदो को हवाई रास्ते से मैदान के बाहर भेजा। और 12 गेंद पर ही पचासा ठोक दिया।

2011 में भारत विश्व विजेता बना और युवराज सिंह विजेता टीम के सबसे बड़े हीरो। युवराज को टूर्नामेंट में बेहतरीन प्रदर्शन करने के लिए 'मैन ऑफ़ द टूर्नामेंट' का खिताब मिला। 2007 के टी-20 में भी उन्हें टूर्नामेंट का सबसे काबिल खिलाड़ी घोषित किया गया था।



2011 के बाद युवराज सिंह को कैंसर ने जकड़ लिया पर इस वीर खिलाड़ी ने इस खतरनाक बीमारी को भी पटखनी देकर मैदान में वापसी की। पर वह पुराने युवराज न रहे। पहले टेस्ट टीम फिर एकदिवसीय और बाद में टी-20 क्रिकेट से भी उन्हें बाहर कर दिया गया।

304 एकदिवसीय मैचों में 36.55 की औसत से कुल 8701 रन बनाए। 40 टेस्ट मैचों में 33.92 की औसत से 1900 रन बनाए। 58 टी-20 मैचो में 28 के औसत से 1177 रन बनाए। गेंदबाजी में भी युवराज ने करतब दिखाए हैं। वनडे क्रिकेट में उनके नाम 111 विकेट, टेस्ट में 9 तो टी20 में उनके नाम 28 विकेट दर्ज हैं।

बीते 3-4 सालों में युवराज को कई बार मौका दिया गया पर वह छाप छोड़ पाने में असफल रहे। उनके प्रशंसक हौसलाअफजाई करते रहे पर इंग्लैंड के खिलाफ 150 रन की पारी छोड़ दें तो बाकी उनका प्रदर्शन बेहद औसत ही रहा। और इसी कारण उन्हें विश्वकप 2019 के लिए टीम में जगह नहीं मिली। सन्यास के साथ ही क्रिकेट का एक अध्याय आज हमेशा के लिए बन्द हो गया।

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