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चिंतन: जीका का भारतीय टीका विश्व को बड़ी देन होगा

1947 में यूगांडा के जीका के जंगलों में बंदरों में पाया जाने वाला यह वायरस 1954 में इंसान के अंदर पहली बार देखा गया।

चिंतन: जीका का भारतीय टीका विश्व को बड़ी देन होगा
जब दुनिया रहस्यमयी वायरस जीका के खिलाफ वैज्ञानिक शोध की योजना बना रही है, तब एक भारतीय बायोटेक कंपनी ने इसका टीका बना लेने का ऐलान कर सबको चौंका दिया है। एक दिन पहले ही मंगलवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने जीका वायरस संक्रमण को खतरनाक बताते हुए ग्लोबल इमरजेंसी की घोषणा की है। इसके अगले ही दिन बुधवार को हैदराबाद की एक बायोटेक कंपनी ने जीका वायरस के खिलाफ टीका (वैक्सीन) बनाने का दावा किया। कंपनी ने कहा कि जीका वायरस बाहर से मंगाकर उसने दो वैक्सीन तैयार की हैं। ये दोनों टीके जीका वायरस के खिलाफ लड़ने में सक्षम हैं। कंपनी के प्रमुख कृष्णा इला के मुताबिक इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने इस काम में मदद का हाथ बढ़ाया है। उन्होंने मोदी सरकार से मदद भी मांगी है और अपील भी की है कि जीका प्रभावित देशों को इन टीकों के जरिये सहायता करें। कंपनी ने यह भी कहा है कि वह चार महीने में वैक्सीन के 10 लाख डोज बना सकती है। लेकिन असल सवाल यह है कि अभी तक इन टीकों का किसी इंसान या जानवर पर ट्रायल नहीं हुआ है, जोकि एक लंबी प्रक्रिया है। दूसरा अहम सवाल है कि इन टीकों को चिकित्सा वैज्ञानिकों की जांच से गुजरना है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने कहा भी है कि अगले दो-तीन दिनों में चिकित्सा वैज्ञानिकों की एक टीम इस टीके की जांच करेगी। इसके बाद डब्ल्यूएचओ और अमेरिका व ब्राजील के चिकित्सा वैज्ञानिक भी परखेंगे। इसलिए जीका के इन टीकों की राह आसान नहीं रहने वाली है, लेकिन यदि यह जांच में सफल रहता है, तो निश्चित ही चिकित्साजगत और दुनिया को भारत की बड़ी देन होगी। क्योंकि दुनिया अभी तक इबोला का भी इलाज नहीं ढूंढ़ पाई है और जीका वायरस ने दस्तक दे दी है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अभी यह माना जा रहा था कि जीका केवल एडीस एजिप्टी मच्छड़ के काटने से होता है, लेकिन अमेरिका में यौन संबंध से जीका के फैलने का मामला सामने आने के बाद यह मिथ टूट गया है। अमेरिकी शहर टेक्सास में सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने सेक्स से जीका वायरस के एक इंसान से दूसरे इंसान में जाने की बात की पुष्टि कर दी है। इसके बाद जीका डेंगू व चिकुनगुनिया की तरह केवल मच्छड़ों से फैलनी वाली बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह एचआईवी/ एड्स की तरह यौन संक्रमित बीमारी भी हो गई है। ऐसे में यह अब समस्त दुनिया के लिए खतरा है। 1947 में यूगांडा के जीका के जंगलों में बंदरों में पाया जाने वाला यह वायरस 1954 में इंसान के अंदर पहली बार देखा गया। 2007 में माइक्रोनेशिया के एक द्वीप याप में इस वायरस ने बड़ी तेजी से पैर पसारे और फिर यह कैरीबियाई व लेटिन अमेरिकी देशों में फैल गया। अभी जीका 20 देशों में फैला है। सबसे अधिक ब्राजील प्रभावित है। बुखार जैसे लक्षण वाले इस रोग का सबसे अधिक खतरा गर्भवती महिलाओं को है। इसके संक्रमण से गर्भ में पहल रहे बच्चे का सिर अविकसित (माइक्रोसेफैली) रह जाता है। ऐसे में इस टीके से उम्मीद बढ़ गई है और विश्व में भारतीय वैज्ञानिकों की साख भी बढ़ेगी।
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