Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख: देश के साथ खड़े हुए युवा

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सामने आए युवाओं के उदाहरण पीड़ा में भी मुस्कुराहट लाने वाले हैं। साथ ही यह भी समझाते हैं कि आपदा के दौर में देश का साथ देने का जज्बा उम्र का मोहताज नहीं होता। देखा जाए तो बात सिर्फ आर्थिक, शारीरिक या रचनात्मक मदद की नहीं है। इन उदाहरणों के साथ सोच और संवेदनाओं भी कई पक्ष जुड़े हैं। ये पहलू कोरोना महामारी से लड़ने में संबल बनकर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर भी मददगार साबित होंगे।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख: देश के साथ खड़े हुए युवा

कोरोना वायरस की मुसीबत से लड़ने के लिए देश के हर क्षेत्र के लोग अपना योगदान दे रहे हैं। इस महामारी से जूझते हुए हमारे देश में आगे आकर मदद करने की एकजुटता का जज्बा हर उम्र, हर तबके के लोगों में दिख रहा है, लेकिन नई पीढ़ी के बच्चों का अपने वतन के प्रति समर्पण देख एक नई आशा जागती है। यह उम्मीद बंधती है कि वे अपने आंगन की समस्याओं से परिचित हैं। अपने देश के तकलीफदेह हालातों के मायने समझते हैं। भावी पीढ़ी का यह जागरूक और जिम्मेदारी भरा व्यवहार आज के संकट से जूझने की शक्ति और भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति देता है।

बीते दिनों 15 साल के गोल्फर अर्जुन भाटी ने विश्व जूनियर गोल्फ चैंपियनशिप के तीन खिताब और एक राष्ट्रीय खिताब सहित अपनी 102 ट्राफियों को बेचकर जुटाए गए फंड को देश की मदद के लिए पीएम-केयर्स फंड में दान दिया है। इस मदद के बाद अर्जुन के ट्वीट को प्रधानमंत्री ने रिट्वीट करते हुए लिखा कि देशवासियों की यही वो भावना है, जो कोरोना महामारी के समय सबसे बड़ा संबल है। वैश्विक महामारी बन चुके कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में मदद करने के लिए 15 साल की ही एक और खिलाड़ी आगे आईं। शूटर ईशा सिंह ने भी पीएम-केयर्स फंड को 30,000 रुपये का दान दिया है। कुछ इसी तरह फिल्म अभिनेत्री सारा अली खान भी पीएम केयर्स और मुख्यमंत्री के राहत कोष में योगदान देकर अपना समर्थन प्रदान करने की प्रतिज्ञा लेने वाली सबसे कम उम्र की अदाकारा हैं। सारा ने इस महामारी के प्रकोप के दौरान सभी को अपनी क्षमता के अनुसार मदद करने का आग्रह भी किया है। अलवर में दस साल के दो बच्चों ने अपनी मिट्टी की गुल्लक में मौजूद धन राशि को प्रधानमंत्री सहायता कोष में भेजकर कोरोना महामारी से बचाव के कार्यों में लगाने को कहा है। महाराष्ट्र में कोरोना वायरस से जारी जंग में पांच साल की दो जुड़वा बहनें भी अपने गुल्लक में इकट्ठा करके रखे गए पैसों को मुख्यमंत्री रिलीफ फंड में दान देकर उदाहरण बन गई हैं। इतना ही नहीं कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझ रहे लोगों की सहायता के लिए एक किशोरी ने तो अपने इलाज के लिए जुटाए गए रुपये भी मदद के रूप में दे दिए हैं। राष्ट्रमंडल खेल और युवा ओलंपिक की चैम्पियन मनु भाकर ने भी अपनी बचत से हरियाणा कोरोना केयर्स फंड में एक लाख रुपये का योगदान किया है। 18 साल की इस चैम्पियन ने ट्वीट किया है कि यह वह समय है जब सिर्फ देश के लोगों का जीवन मायने रखता है और उनको बचाने के लिए हम सबको जो कर सकें करना होगा। आप सब भी अपनी तरफ से कुछ न कुछ योगदान करके आपदा की इस घड़ी में देश का साथ दें।

दरअसल, छोटी उम्र में बड़ी सोच और बड़ा दिल रखने वाले ऐसे चेहरे आम परिवारों से हों या किसी खास क्षेत्र के चमकते सितारे। इस पीड़ादायी दौर में मदद करने का उनका जज्बा हर देशवासी का दिल जीतने वाला है। उनकी यह भागीदारी अपने देश के साथ खड़े होने का सकारात्मक संदेश तो देती ही है और भावी पीढ़ी की संवेदनशील सोच की बानगी भी है। ऐसे प्रशंसनीय और प्रेरणादायी उदाहरण समाज की पीड़ा को समझने और साथ देने के मोर्चे पर सहभागिता दर्ज करवाने वाले भी हैं। तभी तो सार्थक संदेश और संवेदनाओं का भाव लिए ऐसे सभी चेहरे और उनकी सोच इस लड़ाई में हर देशवासी के मन को मजबूती देने वाली है। आमतौर पर नई पीढ़ी को नकारात्मकता और अपने परिवेश एक प्रति एक उपेक्षा का भाव रखने वाली पीढ़ी मान लिया जाता है। आज की चकाचौंध और दिखावे की दुनिया का हिस्सा समझा जाता है। धैर्य की कमी और सहयोग करने की सोच भी से दूर ही समझा जाता है। ऐसे में कोरोना महामारी के इस संकट में नई पीढ़ी के चेहरों का यूं आगे आना और सकारात्मक कार्य में भागीदार बनना, वाकई सराहनीय है। इतना ही नहीं यह बात भी रेखाकिंत करने योग्य है कि उनका सहयोग और समझ कितने ही हमउम्र किशोरों के लिए अनुकरणीय उदाहरण भी बन रहा है।

किसी भी समाज के निर्माण में युवाओं की अहम भूमिका होती है। खासकर चुनौतियों से जूझने में उनका साहस, सजगता और सहयोग बहुत मायने रखते हैं। नई पीढ़ी आज और आने वाले कल के बीच एक सेतु का काम करती है। जो हर संकट से लड़कर उज्जवल भविष्य की बुनियाद बनने का हौसला रखती है। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है। सुखद है कि युवाओं की यह ऊर्जा और उत्साह इस संकट के दौर में भी देश का संबल बन रहा है। आर्थिक ही नहीं मदद के अन्य मोर्चों पर भी ऐसे उत्साही चेहरे मन से जुटे हैं। दुनिया भर में फैली इस महामारी के प्रकोप में हमारे यहां गांवों-कस्बों से लेकर महानगरों तक नई पीढ़ी के बच्चे पूरी एहतियात के साथ लोगों की मदद में जुटे हैं। हालांकि पहले भी प्राकृतिक आपदाओं या चुनौतीपूर्ण समय में देश के युवाओं ने हमेशा अपना योगदान दिया है। भूकंप, बाढ़ या किसी दुर्घटनास्थल पर युवाओं को पीड़ितों की मदद करते हुए देखा गया है। इस संक्रमण के संकट के समय युवा कई तरह से देश और समाज एक लिए सहायक बन रहे हैं। कई युवा अपनी रचनात्मक सोच के बल भी कोरोना से लड़ाई लड़ रहे हैं। दिल्ली के ऐसे ही दो युवा घर में ही फेस शील्ड बनाकर डॉक्टर्स, नर्स, पुलिसकर्मी और फल-सब्जी विक्रेताओं को अब तक करीब डेढ़ हजार शील्ड्स मुफ्त में बांट चुके हैं। वे कोरोना वॉरियर्स की सुरक्षा के मोर्चे पर अपने सहायता दे रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि एक अजब-अनजानी व्याधि के रूप में दस्तक देने वाले कोरोना की लड़ाई में भी नई पीढ़ी का आना बहुत मायने रखता है। ऐसे चेहरे एक मिसाल बनकर यह बताते हैं कि नई पीढ़ी अपने देश के लिए चिंतित भी है और समर्पित भी।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में समाने आए ऐसे उदाहरण पीड़ा में भी मुस्कुराहट लाने वाले हैं। इस आपदा से जीतने का मनोबल बढ़ाने वाले हैं। साथ ही यह भी समझाते हैं कि आपदा के दौर में अपने देश का साथ देने का जज्बा उम्र का मोहताज नहीं होता। असल में देखा जाए तो बात सिर्फ आर्थिक, शारीरिक या रचनात्मक मदद की नहीं है। इन उदाहरणों के साथ सोच और संवेदनाओं भी कई पक्ष जुड़े हैं। ऐसे सभी पहलू कोरोना वायरस के संक्रमण की महामारी से लड़ने में संबल बनकर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर भी मददगार साबित होंगें। युवाओं ने एकजुट होकर जिस तरह से मदद का हाथ बढ1ाया है, उससे न केवल देश का हौंसला बढ़ा है बल्कि सुनहरे भविष्य की किरण भी दिखाई दे रही है। क्योंकि यही युवा देश का भविष्य है और देश के कर्णधार भी।

Next Story
Top