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बिहार में 50 प्रतिशत महिलाएं करती हैं PAD यूज, जानिए बाकी राज्यों का हाल

बिहार में 74 प्रतिशत और झारखंड में 76 प्रतिशत लड़कियों ने पैड और कपड़े का प्रयोग किया जबकि 2013 में यह संख्या बिहार में 50 प्रतिशत तो झारखंड में 46 प्रतिशत थी।

बिहार में 50 प्रतिशत महिलाएं करती हैं PAD यूज, जानिए बाकी राज्यों का हाल
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दुनियाभर में विश्व मासिक धर्म स्वास्थ्य व स्वच्छता दिवस मनाया जा रहा है। यह एक ऐसा विषय है जिसके संबंध में अधिकतर लोग खुलकर बात नहीं करना चाहते, इसे कई तरह के रहस्यों से ढक दिया गया है और जिसका सबसे ज्यादा हर्जाना लड़कियों, महिलाओं को आज भी उठाना पड़ रहा है।

मासिक धर्म के बारे में व्याप्त रहस्यों व मिथकों को दूर करने और इस बावत खुलकर बात करने, नजरिए को बदलने और लड़कियों, महिलाओं को स्ापोर्ट करने, इन दिनों उनकी खास जरूरतों की पूर्ति के प्रति माहौल बनाने व जागरूकता फैलाने के मकसद से दुनियाभर में यह दिवस मनाया जाता है।

दरअसल लड़कियों, महिलाओं को इन दिनों में जिन खास मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसकी सूची बहुत लंबी है पर इस मुददे को उठाना बहुत ही जरूरी है, ताकि व्यक्तिगत, समाज, स्कूल, शिक्षण संस्थाओं, कार्यस्थलों, सरकारी स्तर पर योजनाएं बनाने वाले समूहों में इस पर व्यापक विचार-विमर्श हो सके।

कहने का अभिप्राय यह है कि मासिक धर्म को स्त्री के शरीर की शुचिता के बोझ व कलंक से आजाद कर उसे इस नजरिए से देखा जाए कि मासिक धर्म तो हरेक लड़की की जिंदगी का हिस्सा है, यह हर महिला के शरीर में होने वाला एक स्वाभाविक विकास है।

यह लड़की की जिंदगी का ऐसा संक्रमण काल है कि इससे वह किशोरावस्था में प्रवेश करती है और फिर बालिग। यह सभी लड़कियों के जीवन में बदलाव का अहम वक्त होता है।

ऐसे वक्त में उन्हें परिवार, सहेली, समुदाय, अध्यापक, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के उचित परामर्श, जानकारी की सख्त जरूरत होती है, ताकि वे विभिन्न भ्रंातियों के जाल में आने से बचें और मासिक धर्म के दारौन स्कूल मिस नहीं करें।

भारत एक ऐसा मुल्क है, जहां किशोर लड़कियों की तादाद बहुत अधिक है। अनुमान सुझाते हैं कि भारत में करीब 110 मिलियन किशोर लड़कियों में मासिक धर्म स्वच्छता और उसके निस्तारण के ज्ञान की कमी है।

ये उनकी शिक्षा व स्वास्थ्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं। इंडियन कौंसिल फाॅर मेडिकल रिसर्च की 2011-12 की रिपोर्ट बताती है कि मासिक धर्म वाली केवल 38 प्रतिशत लड़कियों ने ही इस बाबत अपनी मांओं से बात की थी।

शिक्षा मंत्रालय का 2015 का एक सर्वे बताता है कि गांवों में 63 प्रतिशत स्कूलों में अध्यापकों ने मासिक धर्म और इससे कैसे स्वच्छ तरीके से निपटा जाए की बाबत कभी चर्चा ही नहीं की।

यूनिसेफ और वाॅटर एड की नई शोध बताती है कि हम युवा लड़कियों को मासिक धर्म बाबत तैयार करने में कितने बढ़िया हैं, यह भी भिन्न-भिन्न है। भारत में जिन लड़कियों से पूछा गया था उनमें से 52 प्रतिशत ने कहा कि जब उनका पहला पीरियड हुआ तो उन्हें नहीं पता था कि उनके साथ क्या हो रहा था।

दरअसल किशोर लड़कियों को मासिक धर्म क्या है और इस बाबत स्वच्छता बरतना क्यों जरूरी है, बताना बहुत आवश्यक है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ और स्टे फ्री नामक प्रमुख सेनेटरी नेपकिन बनाने वाली कंपनी जाॅनसन एन जाॅनसन मिलकर किशोर लड़कियों में मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता के स्तर को सुधारने के लिए मिलकर बीते छह साल से काम कर रहे हैं।

ध्यान देने वाली एक बात यह है कि एक शोध के परिणाम यह बताते हैं कि 93 प्रतिशत लड़कियों ने पीरियड से होने वाली असुविधा के चलते औसतन एक या दो दिन स्कूल मिस किया, लेकिन सेनेटिरी नेपकिन तक पहंुच, मासिक धर्म संबंधी जानकारी व ज्ञान होने पर 97 प्रतिशत लड़कियों ने पीरियड के दौरान स्कूल में उपस्थित होने की स्वीकृति दे दी।

इनका फोकस इस पर है कि पीरियड के दौरान लड़कियां अपना स्कूल मिस नहीं करें, उनकी पढ़ाई व स्वास्थ्य प्रभावित नहीं हो। ‘वन पैड, स्कूल में सुरक्षा का एकदिन ’ के जरिए यही संदेश देने की कोशिश की गई है। किशोर लड़कियों, मांओं व अध्यापकों के लिए पहेली की सहेली नामक एक सचित्र फ्लिपबुक तैयार की गई है। पहेली की सहेली को राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम में शमिल किया गया है।

अध्ययन यह भी बताते हैं कि इस बाबत जानकारी व जागरूकता वाले कार्यक्रमों के कारण हालात में कुछ सुधार हुआ है। मसलन बिहार में 74 प्रतिशत और झारखंड में 76 प्रतिशत लड़कियों ने पैड और कपड़े का प्रयोग किया जबकि 2013 में यह संख्या बिहार में 50 प्रतिशत तो झारखंड में 46 प्रतिशत थी।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ को जमीनी स्तर पर पूरा करने के लिए भी यह जरूरी है कि लड़कियां पीरियड के दिनों में भी स्कूल मिस नहीं करें बल्कि स्कूल में बनी रहें।

इसके लिए पैड, साफ सूती कपड़ा के अलावा लड़कियों, महिलाओं के लिए अलग से शौचालय, उनमें सफाई व पानी का बंदोबस्त भी होना चाहिए। हाथ धोने के लिए साबुन भी।

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन आधी दुनिया से सीधा ताल्लुक रखता है पर इस पर सभी को तव्वजो देना चाहिए क्योंकि यह सामाजिक व आर्थिक सशक्तीकरण को आगे बढ़ाने में मदद करता है और विकास को भी। यही नहीं सतत विकास लक्ष्य को हासिल करने में भी सहायक हो सकता है।

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