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मॉरीशस भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक साझेदार

मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में 18 से 20 अगस्त को संपन्न हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में यह बात साफ तौर पर नजर आई कि मॉरीशस आज भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक साझेदार है। इस तथ्य को भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ और पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने बड़ी ही शिद्दत के साथ रेखांकित किया।

मॉरीशस भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक साझेदार

मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में 18 से 20 अगस्त को संपन्न हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में यह बात साफ तौर पर नजर आई कि मॉरीशस आज भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक साझेदार है। इस तथ्य को भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ और पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने बड़ी ही शिद्दत के साथ रेखांकित किया।

अनिरुद्ध जगन्नाथ ने बड़े ही भावुक शब्दों में अपने संबोधन में कहा कि हम मानते हैं हमारा मॉरीशस देश भारत माता का एक पुत्र है और यह पुत्र मां के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन अवश्यमेव करेगा। उनके इस कथन पर पूरा हॉल काफी देर तक तालियों से गूंजता रहा। प्रवीण कुमार जगन्नाथ ने अपने अंग्रेजी वक्तव्य से पहले इस बात पर हिंदी में अफसोस व्यक्त किया कि वे ठीक से हिंदी नहीं बोल पाते।

श्री जगन्नाथ ने फिर थोड़ा परिहास किया। उन्होंने हिंदी की शब्दावली का प्रयोग करते हुए कहा कि ‘लेकिन मैंने अपनी पत्नी से कहा है कि वह संक्रांति के दिनों में वे खिचड़ी ही बनाएं।' उनकी इस बात पर भी काफी तालियां बजीं। दरअसल भारतीय संस्कृति के अनुसार संक्रांति के दिनों में खिचड़ी खाई जाती है।

सुषमा स्वराज ने उद्घाटन सत्र में गिरमिटिया देशों का दृष्टांत देते हुए कहा कि इन देशों में भारतीय संस्कृति का गौरव तो कायम है, किंतु हिंदी भाषा लुप्त हो रही है, अतः इन देशों में भाषा को बचाने की जिम्मेदारी भारत ने संभाली है। यहां यह बताना लाजिमी है कि अंगेजों ने गिरमिटिया उन भारतीय मजदूरों को कहा था, जिन्हें गुलाम बनाकर फिजी, गयाना, मॉरीशस आदि देशों में भेज दिया गया था।

मॉरीशस के संदर्भ में भी श्रीमती स्वराज ने सांकेतिक शब्दों में इस बात को रेखांकित किया। डोडो मॉरीशस का राष्ट्रीय पक्षी है। यह पक्षी संरक्षण के अभाव में बड़ी तेजी से लुप्त हो रहा है। इसे प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त करते हुए अशोक चक्रधर के निर्देशन में बनी एक बड़ी ही रोचक एनिमेशन फिल्म इस सत्र में दिखाई गई।

इसमें दिखाया गया कि समुद्र में डूबते डोडो को भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर बचाकर किनारे ले आता है और फिर दोनों मिलकर नृत्य करते हैं। श्रीमती स्वराज ने अपनी विशिष्ट वक्तृत्व शैली में कहा कि मॉरीशस में आज हिंदी भी डोडो की तरह ही डूब रही है, लेकिन अब भारत का मोर आकर उसे बचाएगा। श्रीमती स्वराज के इस कथन से यह स्पष्ट है कि भारत और मॉरीशस मिलकर गिरमिटिया देशों में हिंदी भाषा को पुनर्स्थापित करेंगे।

मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना इसी उद्देश्य को लेकर की गई है। वैसे तो यह सचिवालय 2008 से कार्यरत है, लेकिन अब इसे नए भवन में स्थानांतरित कर दिया गया है। इस भवन का उद्घाटन इसी वर्ष राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया है। मॉरीशस सरकार के भ्रमण कार्यक्रम के तहत हमने इस भवन को देखा। पुष्पित पौधों और हरे-भरे वृक्षों से घिरा यह भवन सचमुच बड़ा ही सुंदर बन पड़ा है।

इसके भीतर एक बड़ा पुस्तकालय और वातानुकूलित सभागार भी है। सम्मेलन में यह प्रस्ताव भी रखा गया कि विश्व सचिवालय की उपशाखाएं कुछ अन्य देशों में स्थापित की जानी चाहिए। इस सम्मेलन की एक विशेष बात यह भी थी कि पहली बार सम्मेलनों की श्रृंखला में भाषा के साथ संस्कृति को भी जोड़ा गया। सम्मेलन का मुख्य विषय था- ‘हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति'।

यह सम्मेलन पोर्ट लुई के ‘स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय सभागार' में रखा गया और इस इलाके को ‘गोस्वामी तुलसीदास नगर' का नाम दिया गया। तकरीबन 20 देशों के 3500 हिंदी साहित्यकार, विद्वान, प्राध्यापक और हिन्दीप्रेमी इस आयोजन में शामिल हुए। आयोजन स्थल और सभागार में भारत और मॉरीशस के हिंदी साहित्यकारों के बड़े-बड़े चित्र लगाए गए थे।

आयोजन की सभी प्रस्तुतियों में शालीनता और भारतीय संस्कृति की झलक मिल रही थी। सम्मेलन आरंभ होने के एक दिन पूर्व 17 अगस्त की शाम को यहाँ के ‘गंगा तलाव' में गंगा आरती का कार्यक्रम रखा गया। यह तालाब ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा' की कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करता है। भारत से गंगाजल लाकर इस तालाब में डाल दिया गया है और सारे जल को गंगाजल मान लिया गया है।

यह तालाब हरिताभ पहाड़ियों से घिरे बड़े ही रमणीक स्थान पर स्थित है। गंगा तालाब के किनारे एक भव्य शिव मंदिर है, जिसे सागर शिव मंदिर कहा जाता है। इसके आसपास शिव, गणेश, दुर्गा, गंगा, हनुमान की विशाल प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। हमने यहां एक और खास बात गौर की। तालाब तथा मंदिर के आसपास हमें किसी भी प्रकार की गंदगी का नामोनिशान नहीं दिखा।

वहां न तो फूल और पूजा सामग्री बेचनेवाले दिखे और न ही खाने-पीने की चीजों के खोमचे सजाए बैठे लोग दिखे। पूरे वातावरण में फैली एक पवित्र शांति और नीरव आध्यात्मिकता की अनुभूति हमारे हृदयों में उतर रही थी। क्षेत्रफल की दृष्टि से मॉरीशस काफी छोटा देश है। यहां एक छोर से दूसरे छोर की अधिकतम दूरी 65 किमी है। आबादी कुल 13 लाख की है।

जब हम हवाई अड्डे से होटल रवाना हुए तो हमने हरेक चौराहे पर बड़ी तादाद में भारत और मॉरीशस के राष्ट्रध्वज लहराते दिखे, लेकिन अटलजी के निधन की वजह से ये झंडे झुके हुए थे। 18 अगस्त को सम्मेलन का पहला सत्र अटलजी की स्मृतियों को समर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

विभिन्न देशों से आए हिंदी विद्वानों ने एक संपादक, एक पत्रकार, एक संवेदनशील कवि और एक हिंदी के विद्वान की भूमिकाओं में अटलजी को याद किया। दूसरे दिन रात को निर्धारित कवि सम्मेलन को काव्यांजलि नाम देकर अटलजी की स्मृतियों को समर्पित किया गया।

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