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हवा में घुलता जहर, जिम्मेदार कौन?

मनुष्य और प्रकृति का संबंध उतना ही पुराना है, जितना धरती पर मनुष्य का अस्तित्व। मनुष्य पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। बावजूद इसके प्रकृति को नष्ट करने, उसका अथाह दोहन करने और उस पर विजय पाने के मानवीय प्रयास सदियों से निरंतर जारी हैं।

हवा में घुलता जहर, जिम्मेदार कौन?

मनुष्य और प्रकृति का संबंध उतना ही पुराना है, जितना धरती पर मनुष्य का अस्तित्व। मनुष्य पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। प्रकृति का अस्तित्व, मनुष्य के बिना भी संभव है लेकिन प्रकृति के बिना मनुष्य के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

बावजूद इसके प्रकृति को नष्ट करने, उसका अथाह दोहन करने और उस पर विजय पाने के मानवीय प्रयास सदियों से निरंतर जारी हैं। इसका सीधा प्रभाव हमारे पर्यावरण पर पड़ रहा है।

बढ़ते प्रदूषण की समस्या

हमारी आवश्यकताओं का भार वहन करने में धरती और इसके पर्यावरण को भारी खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इसके चलते ही पर्यावरण से जुड़ी अनेक समस्याएं विकराल रूप धारण करती जा रही हैं।

एक तरफ जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया को डरा रहा है तो दूसरी तरफ कूड़े और प्रदूषण से पृथ्वी पर रहने वाला हर जीव त्रस्त है। पर्यावरण पर मंडराते संकट से उसे बचाने के लिए हमें जितने प्रयास करने चाहिए, उसका आधा भी हम नहीं कर रहे हैं। कहना चाहिए हम अपने पर्यावरण के प्रति गंभीर ही नहीं हैं।

ऐसे बिगड़ा पर्यावरण

वनस्पति, प्राणी, मनुष्य सहित सभी जीवों और उनसे संबंधित भौतिक परिसर को पर्यावरण कहते हैं। मतलब हवा, पानी, मिट्टी, पहाड़, पेड़-पौधे, जीव जंतु, इंसान और इनकी गतिविधियां सभी पर्यावरण का हिस्सा हैं और उसे प्रभावित भी करती हैं।

प्रकृति ने सभी के काम और क्षेत्र बांट रखे हैं और सदियों से हमारा पर्यावरण स्वत: गतिशील रहा है। लेकिन पिछली एक-दो सदी से मानव विकास और भौतिक तरक्की की ऐसी होड़ मची कि धरती का हर कोना और प्रकृति का हर अवयव इससे प्रभावित हुआ।

हमारे पर्यावरण में जहरीले पदार्थों के प्रवेश के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगा है। पर्यावरण के तत्वों और गतिविधियों में परिवर्तन आने लगा और इसका दुष्प्रभाव मानवजाति सहित पर्यावरण के सभी अंगों पर पड़ रहा है। इससे ही पर्यावरण बिगड़ रहा है।

प्रमुख समस्याएं

वैसे तो आज धरती का हर कोना मनुष्य की जरूरतों और उसकी गतिविधियों से प्रभावित हुआ है। लेकिन इसकी सबसे ज्यादा मार हवा, पानी और जमीन ने झेली है। कभी अमृत जैसे पानी से भरी रहने वाली जीवनदायिनी नदियां आज जहरीली होती जा रही हैं।

‘गंगा तेरा पानी अमृत’ अब गुजरे सदी की बात हुई। अब तो नदियां अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। इंसानी कचरा निगलते-निगलते कहीं-कहीं तो नदियां सिर्फ नालों की शक्ल में जीवित हैं। देश की अनगिनत नदियां सदानीरा से मौसमी हो गईं और बहुत सी अन्य नदियां हमेशा के लिए विलुप्त हो चुकी हैं।

इसी तरह कुदरत ने हमें बिल्कुल शुद्ध हवा दी और हमने उसमें तमाम तरह के हानिकारक तत्व घोल दिए। आज महानगरों में हवाएं खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हैं तो छोटे शहरों और गांवों में भी हवाओं में जहर घुलने लगा है। समय-समय पर हमारे वातावरण में धुंध छाकर घुटती हवाओं का हाल भी दिखा जाता है।

इसी तरह लगातार खाद के इस्तेमाल से हमारी मिट्टी की उपजाऊ शक्ति क्षीण और मिट्टी बीमार हुई है। फसल और सब्जियों की गुणवत्ता में कमी आई है और उनमें प्रयुक्त खाद और कीटनाशकों का असर इंसानों के शरीर तक पहुंच कर असाध्य रोग पैदा कर रहा है।

इन समस्याओं की तह में देखें तो हम पाएंगे कि विज्ञान की तरक्की ने इंसानी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाया है। इसके चलते वह खुद को सबसे शक्तिशाली समझने लगा है। तकनीक का इस्तेमाल कर धरती, आकाश से लेकर समुद्र तक की गहराई नाप चुका है।

अब उसे लगता है कि वह कुदरत के नियम कानून अपने हित साधने के लिए बदल सकता है। उसने कथित विकास के लिए धरती के संसाधनों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा। जंगल, पेड़-पौधे काटे जाने लगे, कारखानों से जहरीला धुआं वातावरण में फेंका जाने लगा, नदियों में जहरीले पदार्थ वाले जल बहाए जाने लगे, उन पर बांध बनाकर उनकी धाराओं को मनमर्जी से रोकना, समुद्र में कचरा फेंकना, पहाड़ों को काट कर उनमें सड़कें, रेल लाइन बिछाने और जीव-जंतुओं तक के घर उजाड़ कर धरती के हर कोने में बिल्डिंग और भवन बनाए जाने लगे।

इतना ही नहीं मानव ने अपनी सुख सुविधा के लिए भौतिक संसाधनों, जैसे फ्रिज, एसी, कार, हवाई जहाज जैसी चीजों का इतना ज्यादा प्रयोग किया कि इससे निकलने वाली गैसें जीवन रक्षक ओजोन परत तक को क्षीण कर रही हैं।

प्रकृति से लेना नहीं, अब उसे देना होगा

विचारणीय बात यह है कि प्रकृति ने मनुष्य को जीने के लिए हर संसाधन मुहैया कराया है। तरह-तरह के खाद्य, फल-सब्जियों के अलावा अपार खनिज संपदा भी दी है। मनुष्य चिरकाल से इन संसाधनों का प्रयोग करता आ रहा है।

मनुष्य प्रकृति से सिर्फ लेता रहा है लेकिन अगर पृथ्वी समेत प्रकृति को बचाए रखना है तो अब हमें उसे देना भी सीखना होगा। इसके लिए अधिक से अधिक वृक्षारोपण, हर तरह के प्रदूषण पर नियंत्रण, धरती के जल स्तर को बनाए रखने के लिए जल संरक्षण, वनों की कटाई, शहरीकरण पर नियंत्रण जैसे प्रयास करने होंगे।

जरूरी है प्लास्टिक से मुक्ति

विश्व पर्यावरण दिवस के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ हर वर्ष एक विशेष थीम तय करता है। इस वर्ष का थीम है, ‘बीट प्लास्टिक पॉल्युशन’, यानी प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति पाओ। प्लास्टिक कचरे की समस्या कितनी भयावह है, इसे समझने के लिए कुछ तथ्यों के बारे में जानना होगा।

  • पांच मिनट से भी कम समय में प्लास्टिक का चार ट्रक कचरा समुंदर में जमा हो जाता है। कुल मिलाकर 80 लाख टन प्लास्टिक का कचरा हर वर्ष समुंदर में जमा होता है।
  • हर वर्ष पूरी दुनिया में लगभग 500 बिलियन प्लास्टिक थैले का इस्तेमाल होता है।
  • पिछले सौ साल से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन पिछले दस साल में हुआ है।
  • प्रत्येक मिनट में पूरी दुनिया में 10 लाख प्लास्टिक बोतल खरीद ली जाती हैं।
  • पूरी दुनिया में निकलने वाले कुल अपशिष्ट का दस प्रतिशत प्लास्टिक कचरा होता है।
  • इन वजहों से सिद्ध होता है कि प्लास्टिक कचरा आज पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। पर्यावरण खासकर पेड़-पौधों, समुद्र, जमीन और मानव जीवन को बचाने के लिए इस समस्या का निदान अति आवश्यक हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस का मेजबान भारत को बनाया है। भारत सरकार इस सिलसिले में कई तरह का कार्यक्रम शुरू करेगी। जन जागरूकता और जन सहभागिता बढ़ाने के अभियान शुरू करेगी। इसके तहत सरकार, उद्योग और लोगों के समुदायों को एकजुट कर प्लास्टिक का विकल्प तलाशने और इसके अत्यधिक इस्तेमाल पर रोक लगाने का अभियान शुरू किया जाएगा।

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