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जनसंहारक हथियारों की होड़ खत्म होना जरूरी, विश्व शांति मील का पत्थर

ईरान और पश्चिमी देशों के बीच 12 साल से इस पर गतिरोध बना हुआ था।

जनसंहारक हथियारों की होड़ खत्म होना जरूरी, विश्व शांति मील का पत्थर
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ईरान और दुनिया की छह शक्तियों-अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन व जर्मनी के बीच तेहरान परमाणु कार्यक्रम अभियान पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से हुआ समझौता विश्व शांति के लिए एक मील का पत्थर है। इस ऐतिहासिक समझौते की अंतिम रूपरेखा जून के अंत तक सामने आ जाएगी। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच 12 साल से इस पर गतिरोध बना हुआ था। पश्चिमी देशों का आरोप रहा है कि ईरान परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी साधन जुटा रहा है।
हालांकि वह इससे इंकार करता रहा है। अब इस समझौते के तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम अभियान को अगले दस साल या जरूरत पड़ने पर उससे अधिक समय के लिए रोकेगा और बदले में अमेरिका व यूरोपीय देश उस पर लगाए सभी पाबंदियों को हटाएंगे। इस समझौते के तहत ईरान कुछ संयंत्रों की डिजाइन भी बदलेगा, ताकि हथियारों में इस्तेमाल हो सकने वाले प्लूटोनियम का उत्पादन नहीं हो। अब संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था ईरान के सभी परमाणु कार्यक्रमों की निगरानी करेगा। जैसे-जैसे वह सत्यापन पत्र जारी करता जाएगा, उस पर लगाए गए प्रतिबंध भी उसी क्रम में हटते जाएंगे। करीब एक दशक तक यह मुद्दा काफी विवादों में रहा है। ईरान के पूर्व राष्टÑपति महमूद अहमदीनेजाद की हठधर्मिता व धमकियां इसमें बाधक बनी रही।
उसके परमाणु कार्यक्रमों को हतोत्साहित करने के लिए पश्चिमी देशों ने उस पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए। जिससे उसकी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई है। ईरान की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक कच्चे तेल की बिक्री पर निर्भर है, लेकिन प्रतिबंध के बाद दूसरे देश उससे कच्चे तेल खरीदने से कतराने लगे। इन प्रतिबंधों की सबसे ज्यादा मार वहां की आम जनता पर पड़ रही थी। 2013 में हुए राष्ट्रपति के चुनावों में ईरान का परमाणु कार्यक्रम बहुत बड़ा मुद्दा बना था। लोगों ने हसन रोहानी के पक्ष में वोट दिया था, क्योंकि उन्होंने इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने का वादा किया था। उनके राष्टÑपति बनने के बाद से ईरान के रुख में लचीलापन आया था। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया सशंकित इसलिए भी थी, क्योंकि वहां चरमपंथी ताकतों का बोलबाला है, जो आए दिन दुनिया में हिंसक गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं।
ईरान पर आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने हितों की पूर्ति के लिए चरमपंथियों को हथियार और पैसे मुहैया कराता है। विश्व जगत को इस बात का खतरा था कि उसके परमाणु हथियार आतंकियों के हाथों में जा सकते हैं। वहीं अरब देशों के साथ ईरान का पारंपरिक शिया-सुन्नी विवाद हर साल सैकड़ों लोगों की मौत का कारण बनता रहा है। ईरान के शासन का वैचारिक चरित्र भी पश्चिमी देशों के विपरीत रहा है। ऐसे में यदि उसे परमाणु हथियार मिल जाते तो दुनिया को अंदरखाने डर बना रहता कि वह कब गैर जिम्मेदाराना कदम उठा दे।
अभी पाक के परमाणु हथियार के भी गलत हाथों में जाने का एक डर बना रहता है। हालांकि, परमाणु कार्यक्रम के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर किसी को आपत्ति नहीं है। नए समझौते के बाद भी ईरान परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण इस्तेमाल करता रहेगा। आज जिस तरह दुनिया परमाणु बम जैसे जनसंहारक हथियारों के पीछे भाग रही है, उससे समूची मानवता को खतरा है। लिहाजा, बेहतर यही है कि दूसरे देश भी इससे मुक्त होने के बारे में गंभीरता से विचार करें।
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