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प्रणय कुमार का लेख : कश्मीर में बदलाव की बयार

जम्मू-कश्मीर विकास परिषद के चुनाव और उसके नतीजों पर केवल शेष भारत ही नहीं, अपितु पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं। स्वतंत्रता के सात दशक बाद वहां पहली बार त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली लागू की गई है। उसके बाद से ही वहां के अवाम में इस चुनाव को लेकर उत्साह एवं उत्सुकता का माहौल था।यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नहीं कि तमाम अवरोधों और भीतरी-बाहरी दबावों के बावजूद कश्मीर के अवाम ने उम्मीद के सुनहरे सूरज की दिशा में साहसिक एवं मजबूत क़दम बढ़ाया है। निश्चित ही यह वहां के अवाम की आशाओं-आकांक्षाओं की मुखर अभिव्यक्ति एवं लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था को प्रतिध्वनित करता है।

प्रणय कुमार का लेख : कश्मीर में बदलाव की बयार
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प्रणय कुमार

प्रणय कुमार

गत वर्ष 5 अगस्त को धारा 370 और अनुच्छेद 35ए के हटने के बाद हुए जम्मू-कश्मीर विकास परिषद के चुनाव और उसके नतीजों पर केवल शेष भारत ही नहीं, अपितु पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं। स्वतंत्रता के सात दशक बाद वहां पहली बार त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली (ग्राम-ब्लॉक-जिला) लागू की गई है। उसके बाद से ही वहां के अवाम में इस चुनाव को लेकर उत्साह एवं उत्सुकता का माहौल था। दरअसल जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र महज कुछ राजनीतिक घरानों एवं रसूखदार लोगों तक सीमित था। त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू होने के बाद वहां ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र को मज़बूती मिलने की संभावना प्रबल हुई है।

इस चुनाव की घोषणा के समय से देश-दुनिया में अटकलों का बाजार गर्म था। पहले तो निष्पक्ष, अहिंसक एवं शांतिपूर्ण चुनाव कराने को लेकर ही तरह-तरह की आशंकाएं और चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं। उधर सात दलों को मिलाकर बने गुपकार-गठबंधन (पीएजीडी) के दावों और बड़बोले बयानों ने भी सियासी सरगर्मियों को परवान चढ़ाया था। जहां नेशनल कॉन्फ्रेंस के सबसे बड़े नेता फ़ारूक़ अब्दुल्ला धारा 370 और अनुच्छेद 35 A को पुनः बहाल कराने को लेकर चीन तक से मदद लेने की सार्वजनिक वक़ालत कर चुके थे, वहीं महबूबा घाटी में तिरंगे को हाथ न लगाने की विवादित बयान दे चुकी थीं। वे तो यहां तक बोल गईं कि यदि इन धाराओं के हटने से पूर्व की स्थिति बहाल नहीं हुई तो घाटी में कोई तिरंगे को थामने वाला तक नहीं बचेगा, पर कश्मीर के अवाम ने ही उनके बड़बोले एवं धमकी भरे बयानों का माक़ूल जवाब दे दिया। तमाम मुश्किलों और आतंकवादियों के खौफ़ को धता बताते हुए आठ चरणों में 280 सीटों पर हुए मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए 51.42 प्रतिशत मतदान के साथ वहां के अवाम ने लोकतंत्र के इस महापर्व को सफल बनाया, बल्कि चुनाव के दौरान कुछ भाजपा उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं की हत्या से भी लोग नहीं डरे और उन्होंने गोली-बंदूक की बजाय विकास और लोकतंत्र में अपना विश्वास जताया।

अभी तक मिले नतीज़ों के मुताबिक 74 सीटें जीतकर बीजेपी वहां सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 67, निर्दलीयों ने 39, पीडीपी ने 27, कांग्रेस ने 26, जेके अपनी पार्टी ने 12, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने 8 सीपीआई-सीपीएम ने 5 तथा कुछ सीटों पर अन्य ने जीत दर्ज की है। सात दलों को मिलाकर बने गुपकार-गठबंधन को कुल 112 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफलता मिली है। ग़ौरतलब है कि आज़ादी से लेकर अब तक हुए चुनाव में पहली बार भाजपा घाटी में कोई जीत दर्ज करने में क़ामयाब हुई है। बांडीपोरा जिले की तुलेल, पुलवामा जिले की काकपोरा-2 और श्रीनगर की खनमोह-2 सीटों पर उसे जीत मिली है।

आतंक और अलगाव का सुर अलापने वालों की बातों में न आकर घाटी के अवाम ने यदि विकास की राह पर बेख़ौफ़ कदम बढ़ाया है तो निश्चित ही उसका श्रेय विगत एक वर्ष से वहां केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे विकास के कार्यक्रमों योजनाओं एवं नीतियों को जाता है। धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए के हटने के बाद व्यवस्था और सरकार लोगों का दुःख-दर्द सुनने के लिए स्वयं उनके द्वार तक पहुंच रही है। अधिकारी अपने-अपने वातानुकूलित कक्षों से निकल दूर-दराज के क्षेत्रों में जनता दरबार लगाकर समस्याओं का सीधा समाधान देने का प्रयास कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर ऐसा पहला प्रदेश है, जहां आम जनता की समस्याएं सुनने के लिए 'सरकार गांव की ओर' 'मेरा शहर, मेरी शान', 'ब्लॉक दिवस' जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। पंचायतों का चुनाव कराकर पंचायत समिति एवं सरपंचों को अधिकार-संपन्न बनाया जा रहा है। उनके माध्यम से स्थानीय स्तर पर सरकारी योजनाओं को लागू किया जा रहा है और वहां की आम जनता को उन योजनाओं का सीधा लाभ प्रदान कर उन्हें मुख्यधारा में सम्मिलित किया जा रहा है। रोशनी योजना जैसे भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा देने वाले क़ानूनों को निरस्त कर दिया गया है।

गत एक वर्ष से वहां संचार और आधारभूत संसाधनों के विकास पर लगातार जोर दिया जा रहा है। सड़क एवं यातायात व्यवस्था के सुचारू संचालन पर विशेष ध्यान दिया गया है। सरकारी नौकरियों से लेकर वहां रोज़गार के नए-नए अवसर सृजित किए जा रहे हैं। व्यापारिक जगत को 1300 करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज मिला है, वह भी बिचौलियों के बिना। बेरोजगारी दूर करने, निजी उद्योगों एवं स्वउद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए अगले तीन वर्षों में 25000 करोड़ रुपये का निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। उद्देश्य वहां के अवाम को रोज़गार एवं आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना ही है। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान जम्मू-कश्मीर में हस्तकला एवं हथकरघा से जुड़ी वस्तुओं का निर्यात लगभग पांच हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस क्षेत्र में अपार संभावनाओं को देखते हुए घाटी के हस्तशिल्पियों एवं बुनकरों द्वारा बनाए सामान को दुनिया भर में ऑनलाइन उपलब्ध कराने के लिए फ्लिपकार्ट के साथ सरकार ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

बीते एक वर्ष में सरकार ने अलगाववादी विचारधारा एवं आतंकी गतिविधियों पर उल्लेखनीय अंकुश लगाया है और विकास को गति मिली है। कश्मीरी युवाओं का आतंकवाद के प्रति रुझान पहले से बहुत कम हुआ है। ध्यातव्य हो कि वहां की 65 फ़ीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र की है। चूँकि पूर्व की सरकारों ने उनके रोज़गार के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया, इसलिए वहां बेरोजगारी दर भी सर्वाधिक रही है।

इन धाराओं के हटने का सर्वाधिक लाभ जम्मू-कश्मीर की महिलाओं और बेटियों-बहनों को प्राप्त हुआ है। वे आतंक और भय के साए से मुक्त शिक्षा एवं रोज़गार के लिए निडरता से आगे आ रही हैं। 490 से भी अधिक महिला उम्मीदवारों का डीडीसी चुनाव लड़ना लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी एवं अधिकारों के प्रति सजगता का उदाहरण है। यही नहीं आत्मनिर्भरता के लिए उन्हें हस्तकला से लेकर तमाम परंपरागत एवं नवीन कौशलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक गतिविधियों में उनकी बढ़ती भागीदारी महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक ठोस क़दम है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नहीं कि तमाम अवरोधों और भीतरी-बाहरी दबावों के बावजूद कश्मीर के अवाम ने उम्मीद के सुनहरे सूरज की दिशा में साहसिक एवं मजबूत क़दम बढ़ाया है। निश्चित ही यह वहां के अवाम की आशाओं-आकांक्षाओं की मुखर अभिव्यक्ति एवं लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था को प्रतिध्वनित करता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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