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डॉ. चंद्र त्रिखा का लेख: क्या ऐसी ही बनी रहेगी संवेदनशीलता

क्या डॉक्टर व पैरामेडिकल कर्मी इसी समर्पित भाव से सेवारत रहेंगे? क्या स्वयंसेवी संस्थाएं इसी सेवाभाव को बनाए रख पाएंगी? क्या किसी अकेले रहने वाले बुजुर्ग के लिए पुलिस की टुकड़ी फिर भी कभी हैप्पी बर्थ डे का केक लेकर उसके द्वार खटखटाएगी।

डॉ. चंद्र त्रिखा का लेख: क्या ऐसी ही बनी रहेगी संवेदनशीलता

यह संकट तो देर-सवेर टल जाएगा और इसमें मुख्य भूमिका मेडिकल-जगत, पुलिस व स्वयंसेवी संस्थाओं की दर्ज होगी। मगर ऐसे संकट तो आते रहेंगे। कभी किसी वायरस के नाम से, कभी कोई और लबादा ओढ़कर। सवाल कुनमुनाते हैं, क्या पुलिस का वर्तमान मानवीय एवं संवेदनशील चेहरा आगे भी दिखाई देता रहेगा? क्या डॉक्टर व पैरामेडिकल कर्मी इसी समर्पित भाव से सेवारत रहेंगे? क्या स्वयंसेवी संस्थाएं इसी सेवाभाव को बनाए रख पाएंगी? क्या किसी अकेले रहने वाले बुजुर्ग के लिए पुलिस की टुकड़ी फिर भी कभी हैप्पी बर्थ डे का केक लेकर उसके द्वार खटखटाएगी।

अगर आने वाली पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी को ऐसी किसी महामारी से बचना-बचाना है तो ढेरों सबक हैं कोरोना के वर्तमान दौर में। पहला सबक यह है कि हमें तमाशा-संस्कृति से कम से कम एक दशक तक बचना होगा। प्रदूषण के प्रति व्यक्तिगत रूप में अपने भीतर जागरुकता लानी होगी। पर्यावरण के महत्व को मन में कहीं गहरे तक उतारना होगा। हम जिस भी पेशे से हैं, चाहे वह पुलिसिया है, डॉक्टरी है, पैरामेडिकल सेवा है, प्रशासनिक सेवा है, पत्रकारिता है, लेखन है, सब में संवेदनशीलता को इंजेक्ट करना होगा। हो सकता है संवेदनशीलता आपके स्वभाव व जीवनशैली का हिस्सा हो, मगर इसका निरंतर होना महामारी-मुक्ति की एक महत्वपूर्ण शर्त है।

विश्व साहित्य में चर्चित उपन्यास प्लेग में लेखक आल्बेयर कामू का कहना था, मरने के कई कारण हो सकते हैं मगर किसी को मारने का कोई कारण नहीं होता। कामू भी हमारे बीच सिर्फ 47 वर्ष जिए, लेकिन अपनी इस सीमित सी जिंदगी में वह ढेरों मार्गदर्शक बातें कह गए। द प्लेग में कामू लिखते हैं, जब तक एक-एक डॉक्टर के पास दो या तीन केस ही पहुंचे थे, तब तक किसी ने इस बारे में कोई कदम उठाने की बात ही नहीं सोची। यह सिर्फ संख्याओं के जोड़ने का सवाल था। लेकिन जब ऐसा किया गया तो कुल संख्या हैरतअंगेज निकली। कुछ ही दिनों में मरीजों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ गई थी और इस विचित्र बीमारी के दर्शकों को इसमें जरा भी संदेह न रहा कि जरूर कोई महामारी फैल गई है। इससे आगे वे कहते हंै, अगले चार दिनों में ही बुखार में चौंकाने वाली प्रगति हुई थी। चौथे दिन शिशुओं के एक स्कूल के भीतर एक छोटा सा अस्पताल खाले जाने की घोषणा की गई थी। नगरवासी अब तक नुक्ताचीनी करके अपनी घबराहट को छिपाते नजर आए थे, लेकिन अब जैसे उनकी बोलती बंद हो गई थी और वे उदास चेहरे लिए अपने कामों पर जा रहे थे।

आगे यह त्रासदी वहां तक पहुंचती है, जैसा आज हम दुनिया के साथ अपने देश में घेरों में कैद होकर देख-भाग रहे हैं, एकाएक मौतों की संख्या एकदम बढ़ गई। जिस दिन यह संख्या 30 तक पहुंची, प्रीफेक्ट ने डॉक्टर रियो को एक तार पढ़ने के लिए दिया और कहा, तो अब लगता है कि वे लोग भी घबरा उठे हैं आखिरकार। तार में लिखा था, प्लेग फैलने की घोषणा कर दो। शहर के फाटक बंद कर दो।

वे विश्व युद्ध के एटमी उन्माद के साथ भारत उपमहाद्वीप में चल रहे सत्याग्रह सरीखे प्रयोगों के बीच उपनिवेशवाद का सूर्यास्त देख रहे थे। यही नहीं, आधुनिकता के साथ राज्य और पूंजी के उदय को वे भली-भांति भांप गए थे और वे इसके हश्र को भी समझ रहे थे। एक बुद्धिजीवी और गहन रचनात्मकता के साथ लेखन करने वाले काम तभी कहते भी हैं, प्रोडक्शन मॉडल पर तैयार किया गया समाज सिर्फ प्रोडक्टिव होता है, क्रिएटिव नहीं। कोरोना के कारण दुनिया में अचानक सब कुछ बदल गया है। पर इसके पहले भी स्थिति पर भी गौर करें तो कामू की यह चिंता सही दिखती है कि पूंजी और भौतिकता के बीच सृजन और संवेदना का शोक तयशुदा है।

कामू ने द प्लेग में लिखा है कि प्लेग से दस करोड़ लोग मारे जा चुके हैं। यह उपन्यास है महामारी के कारण एक जीते-जागते शहर के सन्नाटे में डूबने का, उसके मरघट में बदलने का। कर्फ्यू और बंदी जैसे जिन उपायों को आज हम देख रहे हैं, कामू ने उसका भी जिक्र किया है और बताया है कि उपाय और समाधान के बीच जिंदगी के अपने कई सवाल कैसे पहले से छूट जाते हैं, या फिर बाद में संकट की एक और शक्ल अख्तियार कर हमें डराते हैं। ये वो सवाल हैं, जिनसे निपटते हुए हमारी संवेदनाएं इतनी दूर तक खारिज होती चली जाती हैं कि यह यकीन कर पाना मुश्किल हो जाता है कि मनुष्य बचाव के लिए अपने ही समाज के बीच किस तरह सुविधाजनक खुदगर्जी की लकीरें खींच सकता है।

कामू के द प्लेग से लेकर सीमोन द बोउवार का द सेकेंड सेक्स तक इसी दौर की रचनाएं हैं। कामू सात दशक पहले पूंजी, समाज और सत्ता के बीच दम तोड़ती संवेदना का सच लिखते हैं तो उसी दौरान सीमोन स्त्री संघर्ष तक जेंडर की धुरी पर उतारने का नया ठोस विमर्शीय तकाज़ा लेकर आती हैं। द प्लेग 1947 में प्रकाशित हुआ। इसमें कामू अल्जीरिया और खासतौर पर उसके शहर ओरान का जिक्र करते हैं। प्लेग के आने के बावजूद शुरू में लोगों का जीवन सामान्य रहता है। वे मरने वाले आंकड़ों को हाशिए पर और खुद को मुख्यधारा में देखते हैं। दुनिया की बड़ी आबादी के साथ कई देशों की खुद को महफूज समझने की यह मूढ़ता कोरोना संक्रमण के शुरुआती दौर में भी हम देख चुके हैं। पर जैसे ही एेलान होता है कि प्लेग महामारी फैल चुकी है, ओरान शहर बदलने लगता है, शहरी समाज की भीतरी-बाहरी बनावट भरभराने लगती है। संक्रमण से बचने के लिए लोग अपने ही घरों को जलाने लगते हैं। मुर्दों को दफनाने तक की इंसानी दरकार भी कोई मायने नहीं रखती।

इसी बीच प्रख्यात साहित्य मर्मज्ञ व गज़लगो डॉ. दिनेश दधीचि की एक ताज़ा गज़ल-

यूं अतीत का बोझा ढोना, रहने दो ना।

पानी को इस तरह बिलोना, रहने दो ना।

बेखटके मासूम खुशी पलती हो जिसमें

दिल में ऐसा भी इक कोना रहने दो ना।

रहना ही है दूर, तो यूं मुस्का मुस्काकर,

क्यों करती हो जादू टोना? रहने दो ना।

मनमुटाव की फसल उगाते क्यों हो आिखर,

विष के बीज किसलिए बोना? रहने दो ना।

खुद तुमने था उसे बुलाया, विपदा आई,

खेत चुगे पर कैसा रोना? रहने दो ना।

लपटें जब अपने ही घर तक आ पहुंची हैं

अब यूं लंबी तान के सोना, रहने दो ना।

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